द्वादशः समुल्लासः
अनुभूमिका (२) जैनमत बहुत प्राचीन नहीं जैनमत शैव-शाक्तादि के बाद का सत्याऽसत्य के निर्णयार्थ लेख इस लेख से अन्य मतस्थों को लाभ जैन अपने ग्रन्थ अन्य मतवाले को नहीं दिखलाते द्वादश-समुल्लास चारवाक मत के प्रमुख सिद्धान्त और उनकी आलोचना जड़ से चेतन की उत्पत्ति नहीं पदार्थों का अभाव नहीं होता जीव शरीर से पृथक् तत्व है प्रत्यक्षकर्त्ता को अपना ऐन्द्रिय प्रत्यक्ष नहीं स्त्री-समागम को ही पुरुषार्थ का फल मानना ठीक नहीं चारवाक मत की कुछ अन्य बातें वेद, ईश्वर, अग्निहोत्रादि की निन्दा धूर्त्त कर्म नरक, मुक्ति की परिभाषा अशुद्ध चारवाक मत की कुछ और सत्यासत्य बातें विना ईश्वर के सृष्टि स्वयं नहीं स्रष्टा के विना सृष्टि नहीं हो सकती विना जीव के सुख-दुःख का भोक्ता कौन ? मृतक श्राद्ध और यज्ञ में पशुहनन का खण्डन ठीक जीव शरीर के साथ नष्ट नहीं होता जीव शरीरान्तर को प्राप्त होता है वेदादि की निन्दा अनुचित चारवाकादि ने वेद न पढ़े, न सुने वेदों में मांसभक्षण का विधान नहीं बौद्ध मत की आलोचना बौद्ध अनुमान प्रमाण भी मानते हैं बौद्धों के चार भेद और सिद्धान्त शिष्यों के...