स्वमन्तव्यामन्तव्यविषयः
ओ३म् अथ स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाशः सम्पूर्ण सत्यार्थप्रकाश Click now [सर्वतन्त्र-सिद्धान्त की परिभाषा] ‘सर्वतन्त्र सिद्धान्त’ अर्थात् ‘साम्राज्य-सार्वजनिक धर्म’ जिसको सदा से सब मानते आये, मानते हैं और मानेंगे भी। इसीलिये इसको ‘सनातन’=नित्यधर्म कहते हैं कि जिसका विरोधी कोई भी न हो सके। [कौन प्रमाण के योग्य और कौन अयोग्य?] यदि अविद्यायुक्त जन अथवा किसी मत-वाले के भरमाये हुये उसको अन्यथा जानें वा मानें, उसका स्वीकार कोई भी बुद्धिमान् नहीं करते, किन्तु जिसको आप्त अर्थात् सत्यमानी, सत्यवादी, सत्यकारी, परोपकारक, पक्षपातरहित विद्वान् मानते हैं, वही सबको मन्तव्य और जिसको नहीं मानते, वह अमन्तव्य होने से प्रमाण के योग्य नहीं होता। [मेरा अपना मन्तव्य क्या है?] अब जो वेदादि सत्यशास्त्र और ब्रह्मा से लेकर जैमिनि मुनि पर्यन्तों के माने हुए ईश्वरादि पदार्थ, जिनको कि मैं मानता हूँ, सब सज्जन महाशयों के सामने प्रकाशित करता हूँ। मैं अपना मन्तव्य उसी को जानता हूँ कि जो तीन-काल में सबको एक-सा मानने योग्य है। मेरा, कोई नवीन कल्पना वा मतमतान्तर चलाने का लेशमात्र भी अभिप्राय नहीं है, किन्तु जो ...