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विशुद्ध मनुस्मृतिः― एकादश अध्याय

अथ एकादशोऽध्यायः सत्यार्थप्रकाश/विशुद्ध मनुस्मृति/वैदिक गीता Click now (हिन्दीभाष्य-'अनुशीलन'-समीक्षा सहित)  (प्रायश्चित्त-विषय ११.४४ से २६५ तक) [प्रायश्चित्त-सम्बन्धी-विधान] प्रायश्चित्त कब किया जाता है― अकुर्वन्विहितं कर्म निन्दितं च समाचरन्।  प्रसक्तश्चेन्द्रियार्थेषु प्रायश्चित्तीयते नरः॥४४॥ (१) शास्त्र में विहित कर्मों [यज्ञोपवीत संस्कार वेदाभ्यास, संध्योपासन, यज्ञ आदि] को न करने पर, तथा शास्त्र में निन्दित माने गये कार्यों [बुरे कर्मों से धनसंग्रह मद्यपान, हिंसा आदि] को करने पर और इन्द्रिय-विषयों में अत्यन्त आसक्त होने [काम, क्रोध, मोह में आसक्त होने] पर मनुष्य प्रायश्चित्त के योग्य होता है॥४४॥ अकामतः कृते पापे प्रायश्चित्तं विदुर्बुधाः।  कामकारकृतेऽप्याहुरेके श्रुतिनिदर्शनात्॥४५॥ (२) कुछ विद्वान् अज्ञानवश किये गये पाप में प्रायश्चित्त करने को कहते हैं और कुछ विद्वान् वेदों में उल्लेख होने के कारण जानकर किये गये पाप में भी प्रायश्चित्त करने को कहते हैं॥४५॥ अकामतः कृतं पापं वेदाभ्यासेन शुध्यति।  कामतस्तुकृतं मोहात्प्रायश्चित्तैः पृथग्विधैः॥४६॥ (३) अनिच्छाप...