सरल वैदिक गीता
॥ ओ३म् ॥
॥ ओ३म् ॥
श्रीपरमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता
अथ प्रथमोऽध्यायः
धृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे, समवेता युयुत्सवः ।
मामकाः(फ्) पाण्डवाश्-चैव, किमकुर्वत सञ्जय ॥१॥
धृतराष्ट्र बोले― हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्रमें एकत्रित, युद्धकी इच्छावाले मेरे और पाण्डुके पुत्रोंने क्या किया?
सञ्जय उवाच
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं(व्ँ), व्यूढं(न्) दुर्योधनस्-तदा ।
आचार्य-मुप-सङ्गम्य, राजा वचन-मब्रवीत् ॥२॥
संजय बोले― उस समय राजा दुर्योधनने व्युहरचनायुक्त पाण्डवोंकी सेनाको देख कर और द्रोणाचार्यके पास जाकर यह वचन कहा।
पश्यैतां(म्) पाण्डु-पुत्राणाम्, आचार्य महतीं(ञ्) चमूम् ।
व्यूढां(न्) द्रुपद-पुत्रेण, तव शिष्येण धीमता ॥३॥
हे आचार्य! आपके बुद्धिमान् शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्नद्वारा व्यूहाकार खड़ी की हुई पाण्डुपुत्रोंकी इस बड़ी भारी सेनाको देखिये।
अत्र शूरा महेष्वासा, भीमार्जुन-समा युधि ।
युयुधानो विराटश्-च, द्रुपदश्-च महारथः ॥४॥
धृष्टकेतुश्-चेकितानः(ख्), काशिराजश्-च वीर्यवान् ।
पुरुजित्-कुन्तिभोजश्-च, शैब्यश्-च नरपुङ्गवः ॥५॥
युधामन्युश्-च विक्रान्त, उत्तमौजाश्-च वीर्यवान् ।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्-च, सर्व एव महारथाः ॥६॥
इस सेनामें बड़े-बड़े धनुषोंवाले तथा युद्धमें भीम और अर्जुनके समान शूरवीर सात्यकि और विराट तथा महारथी राजा द्रुपद, धृष्टकेतु और चेकितान तथा बलवान् काशिराज, पुरुजित्, कुन्तिभोज और मनुष्योंमें श्रेष्ठ शैब्य, पराक्रमी युधामन्यु तथा बलवान् उत्तमौजा, सुभद्रापुत्र अभिमन्यु एवं द्रौपदीके पाँचों पुत्र- ये सभी महारथी हैं।
अस्माकं(न्) तु विशिष्टा ये, तान्-निबोध द्विजोत्तम ।
नायका मम सैन्यस्य, सञ्ज्ञार्थं(न्) तान् ब्रवीमि ते ॥७॥
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! अपने पक्षमें भी जो प्रधान हैं, उनको आप समझ लीजिये। आपकी जानकारीके लिये मेरी सेनाके जो-जो सेनापति हैं, उनको बतलाता हूँ।
भवान्-भीष्मश्-च कर्णश्-च, कृपश्-च समितिञ्जयः ।
अश्वत्थामा विकर्णश्-च, सौमदत्तिस्-तथैव च ॥८॥
आप-द्रोणाचार्य और पितामह भीष्म तथा कर्ण और संग्रामविजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्तका पुत्र भूरिश्रवा।
अन्ये च बहवः(श्) शूरा, मदर्थे त्यक्त-जीविताः ।
नाना-शस्त्र-प्रहरणाः(स्), सर्वे युद्ध-विशारदाः ॥९॥
और भी मेरे लिये जीवनकी आशा त्याग देनेवाले बहुत-से शूरवीर अनेक प्रकारके शस्त्रास्त्रोंसे सुसज्जित और सब-के-सब युद्धमें चतुर हैं।
अपर्याप्तं(न्) तदस्माकं(म्), बलं(म्) भीष्माभि-रक्षितम् ।
पर्याप्तं(न्) त्विद-मेतेषां(म्), बलं(म्) भीमाभि-रक्षितम् ॥१०॥
भीष्मपितामहद्वारा रक्षित हमारी वह सेना सब प्रकारसे अजेय है और भीमद्वारा रक्षित इन लोगोंकी यह सेना जीतनेमें सुगम है।
अयनेषु च सर्वेषु, यथा-भाग-मवस्थिताः ।
भीष्म-मेवाभि-रक्षन्तु, भवन्तः(स्) सर्व एव हि ॥११॥
इसलिये सब मोर्चोंपर अपनी-अपनी जगह स्थित रहते हुए आपलोग सभी निःसन्देह भीष्मपितामहकी ही सब ओरसे रक्षा करें।
तस्य सञ्जनयन्-हर्षं(ङ्), कुरु-वृद्धः(फ्) पितामहः ।
सिंहनादं(व्ँ) विनद्योच्चैः(श्), शङ्खं(न्) दध्मौ प्रतापवान् ॥१२॥
कौरवोंमें वृद्ध बड़े प्रतापी पितामह भीष्मने उस दुर्योधनके हृदयमें हर्ष उत्पन्न करते हुए उच्च-स्वरसे सिंहकी दहाड़के समान गरजकर शंख बजाया।
ततः(श्) शङ्खाश्-च भेर्यश्-च, पणवानक-गोमुखाः ।
सहसैवाभ्य-हन्यन्त, स शब्दस्-तुमुलोऽभवत् ॥१३॥
इसके पश्चात् शंख और नगारे तथा ढोल, मृदङ्ग और नरसिंघे आदि बाजे एक साथ ही बज उठे। उनका वह शब्द बड़ा भयंकर हुआ।
ततः(श्) श्वेतैर्-हयैर्-युक्ते, महति स्यन्दने स्थितौ ।
माधवः(फ्) पाण्डवश्-चैव, दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः ॥१४॥
इसके अनन्तर सफेद घोड़ोंसे युक्त उत्तम रथमें बैठे हुए श्रीकृष्ण महाराज और अर्जुनने भी अलौकिक शंख बजाये।
पाञ्चजन्यं(म्) हृषीकेशो, देवदत्तं(न्) धनञ्जयः ।
पौण्ड्रं(न्) दध्मौ महा-शङ्खं(म्), भीमकर्मा वृकोदरः ॥१५॥
श्रीकृष्ण महाराजने पाञ्चजन्यनामक, अर्जुनने देवदत्तनामक और भयानक कर्मवाले भीमसेनने पौण्ड्रनामक महाशंख बजाया।
अनन्त-विजयं(म्) राजा, कुन्ती-पुत्रो युधिष्ठिरः ।
नकुलः(स्) सहदेवश्-च, सुघोष-मणिपुष्पकौ ॥१६॥
कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिरने अनन्तविजयनामक और नकुल तथा सहदेवने सुघोष और मणिपुष्पकनामक शंख बजाये।
काश्यश्-च परमेष्वासः(श्), शिखण्डी च महारथः ।
धृष्टद्युम्नो विराटश्-च, सात्यकिश्-चापराजितः ॥१७॥
द्रुपदो द्रौपदेयाश्-च, सर्वशः(फ्) पृथिवी-पते ।
सौभद्रश्-च महाबाहुः(श्), शङ्खान्-दध्मुः(फ्) पृथक्-पृथक् ॥१८॥
श्रेष्ठ धनुषवाले काशिराज और महारथी शिखण्डी एवं धृष्टद्युम्न तथा राजा विराट और अजेय सात्यकि, राजा द्रुपद एवं द्रौपदीके पाँचों पुत्र और बड़ी भुजावाले सुभद्रापुत्र अभिमन्यु― इन सभीने, हे राजन्! सब ओरसे अलग-अलग शंख बजाये।
स घोषो धार्तराष्ट्राणां(म्), हृदयानि व्यदारयत् ।
नभश्-च पृथिवीं(ञ्) चैव, तुमुलो व्यनु-नादयन् ॥१९॥
और उन भयानक शब्दने आकाश और पृथ्वीको भी गुँजाते हुए धार्तराष्ट्रोंके अर्थात् आपके पक्षवालोंके हृदय विदीर्ण कर दिये।
अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा, धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः ।
प्रवृत्ते शस्त्र-सम्पाते, धनुरुद्यम्य पाण्डवः ॥२०॥
हृषीकेशं(न्) तदा वाक्यम्, इदमाह महीपते ।
अर्जुन उवाच
सेनयो-रुभयोर्-मध्ये, रथं(म्) स्थापय मेऽच्युत ॥२१॥
हे राजन्! इसके बाद कपिध्वज अर्जुनने मोर्चा बाँधकर डटे हुए धृतराष्ट्र-सम्बन्धियोंको देखकर, उस शस्त्र चलनेकी तैयारीके समय धनुष उठाकर हृषीकेश श्रीकृष्ण महाराजसे यह वचन कहा― हे अच्युत! मेरे रथको दोनों सेनाओंके बीचमें खड़ा कीजिये।
यावदेतान्-निरीक्षेऽहं(य्ँ), योद्धु-कामा-नवस्थितान् ।
कैर्मया सह योद्धव्यम्, अस्मिन्-रण-समुद्यमे ॥२२॥
और जबतक कि मैं युद्धक्षेत्रमें डटे हुए युद्धके अभिलाषी इन विपक्षी योद्धाओंको भलीप्रकार देख लूँ कि इस युद्धरूप व्यापारमें मुझे किन-किनके साथ युद्ध करना योग्य है तबतक उसे खड़ा रखिये।
योत्स्य-माना-नवेक्षेऽहं(य्ँ), य एतेऽत्र समागताः ।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्,-युद्धे प्रिय-चिकीर्षवः ॥२३॥
दुर्बुद्धि दुर्योधनका युद्धमें हित चाहनेवाले जो-जो ये राजालोग इस सेनामें आये हैं, इन युद्ध करनेवालोंको मैं देखूँगा।
सञ्जय उवाच
एवमुक्तो हृषीकेशो, गुडाकेशेन भारत ।
सेनयो-रुभयोर्-मध्ये, स्थापयित्वा रथोत्तमम् ॥२४॥
भीष्म-द्रोण-प्रमुखतः(स्), सर्वेषां(ञ्) च महीक्षिताम् ।
उवाच पार्थ पश्यैतान्, समवेतान् कुरूनिति ॥२५॥
संजय बोले― हे धृतराष्ट्र! अर्जुनद्वारा इस प्रकार कहे हुए महाराज श्रीकृष्णचन्द्रने दोनों सेनाओंके बीचमें भीष्म और द्रोणाचार्यके सामने तथा सम्पूर्ण राजाओंके सामने उत्तम रथको खड़ा करके इस प्रकार कहा कि हे पार्थ! युद्धके लिये जुटे हुए इन कौरवोंको देख।
तत्रापश्यत् स्थितान् पार्थः(फ्), पितॄनथ पितामहान् ।
आचार्यान् मातुलान् भ्रातॄन्, पुत्रान् पौत्रान् सखींस्-तथा ॥२६॥
श्वशुरान् सुहृदश्-चैव, सेनयो-रुभयोरपि ।
इसके बाद पृथापुत्र अर्जुनने उन दोनों ही सेनाओंमें स्थित ताऊ-चाचोंको, दादों-परदादोंको, गुरुओंको, मामाओंको, भाइयोंको, पुत्रोंको, पौत्रोंको तथा मित्रोंको, ससुरोंको और सुहृदोंको भी देखा।
तान्-समीक्ष्य स कौन्तेयः(स्), सर्वान् बन्धू-नवस्थितान् ॥२७॥
कृपया परयाविष्टो, विषीदन्-निदमब्रवीत् ।
उन उपस्थित सम्पूर्ण बन्धुओंको देखकर वे कुन्तीपुत्र अर्जुन अत्यन्त करुणासे युक्त होकर शोक करते हुए यह वचन बोले।
अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेमं(म्) स्वजनं(ङ्) कृष्ण, युयुत्सुं(म्) समुपस्थितम् ॥२८॥
सीदन्ति मम गात्राणि, मुखं(ञ्) च परिशुष्यति ।
वेपथुश्-च शरीरे मे, रोमहर्षश्-च जायते ॥२९॥
अर्जुन बोले― हे कृष्ण! युद्धक्षेत्रमें डटे हुए युद्धके अभिलाषी इस स्वजनसमुदायको देखकर मेरे अङ्ग शिथिल हुए जा रहे हैं और मुख सूखा जा रहा है तथा मेरे शरीरमें कम्प एवं रोमांच हो रहा है।
गाण्डीवं(म्) स्रंसते हस्तात्, त्वक्चैव परिदह्यते ।
न च शक्नो-म्यवस्थातुं(म्), भ्रमतीव च मे मनः ॥३०॥
हाथसे गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी बहुत जल रही है तथा मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है; इसलिये मैं खड़ा रहनेको भी समर्थ नहीं हूँ।
निमित्तानि च पश्यामि, विपरीतानि केशव ।
न च श्रेयोऽनु-पश्यामि, हत्वा स्वजन-माहवे ॥३१॥
हे केशव! मैं लक्षणोंको भी विपरीत ही देख रहा हूँ तथा युद्धमें स्वजनसमुदायको मारकर कल्याण भी नहीं देखता।
न काङ्क्षे विजयं(ङ्) कृष्ण, न च राज्यं(म्) सुखानि च ।
किं(न्) नो राज्येन गोविन्द, किं(म्) भोगैर्-जीवितेन वा ॥३२॥
हे कृष्ण! मैं न तो विजय चाहता हूँ और न राज्य तथा सुखोंको ही। हे गोविंद! हमें ऐसे राज्यसे क्या प्रयोजन है अथवा ऐसे भोगोंसे और जीवनसे भी क्या लाभ है?
येषामर्थे काङ्क्षितं(न्) नो, राज्यं(म्) भोगाः(स्) सुखानि च।
त इमेऽवस्थिता युद्धे, प्राणांस्-त्यक्त्वा धनानि च ॥३३॥
हमें जिनके लिये राज्य, भोग और सुखादि अभीष्ट हैं, वे ही ये सब धन और जीवनकी आशाको त्यागकर युद्धमें खड़े हैं।
आचार्याः(फ्) पितरः(फ्) पुत्रास्,-तथैव च पितामहाः ।
मातुलाः(श्) श्वशुराः(फ्) पौत्राः(श्), श्यालाः(स्) सम्बन्धिनस्-तथा ॥३४॥
गुरुजन, ताऊ-चाचे, लड़के और उसी प्रकार दादे, मामे, ससुर, पौत्र, साले तथा और भी सम्बन्धी लोग हैं।
एतान्न हन्तु-मिच्छामि, घ्नतोऽपि मधुसूदन ।
अपि त्रैलोक्य-राज्यस्य, हेतोः(ख्) किं(न्) नु मही-कृते ॥३५॥
हे मधुसूदन! मुझे मारनेपर भी अथवा तीनों लोकोंके राज्यके लिये भी मैं इन सबको मारना नहीं चाहता; फिर पृथ्वीके लिये तो कहना ही क्या है?
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः(ख्), का प्रीतिः(स्) स्याज्-जनार्दन ।
पाप-मेवाश्रये-दस्मान्, हत्वैता-नाततायिनः ॥३६॥
हे जनार्दन! धृतराष्ट्रके पुत्रोंको मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियोंको मारकर तो हमें पाप ही लगेगा।
तस्मान्नार्हा वयं(म्) हन्तुं(न्), धार्तराष्ट्रान् स्व-बान्धवान् ।
स्वजनं(म्) हि कथं(म्) हत्वा, सुखिनः(स्) स्याम माधव ॥३७॥
अतएव हे माधव! अपने ही बान्धव धृतराष्ट्रके पुत्रोंको मारनेके लिये हम योग्य नहीं हैं; क्योंकि अपने ही कुटुम्बको मारकर हम कैसे सुखी होंगे?
यद्यप्येते न पश्यन्ति, लोभोपहत-चेतसः ।
कुल-क्षय-कृतं(न्) दोषं(म्), मित्र-द्रोहे च पातकम् ॥३८॥
कथं(न्) न ज्ञेय-मस्माभिः(फ्), पापा-दस्मान्-निवर्तितुम् ।
कुल-क्षय-कृतं(न्) दोषं(म्), प्रपश्यद्भिर्-जनार्दन ॥३९॥
यद्यपि लोभसे भ्रष्टचित्त हुए ये लोग कुलके नाशसे उत्पन्न दोषको और मित्रोंसे विरोध करनेमें पापको नहीं देखते, तो भी हे जनार्दन! कुलके नाशसे उत्पन्न दोषको जाननेवाले हमलोगोंको इस पापसे हटनेके लिये क्यों नहीं विचार करना चाहिये?
कुल-क्षये प्रणश्यन्ति, कुल-धर्माः(स्) सनातनाः ।
धर्मे नष्टे कुलं(ङ्) कृत्स्न्म्, अधर्मोऽभि-भवत्युत ॥४०॥
कुलके नाशसे सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं, धर्मके नाश हो जानेपर सम्पूर्ण कुलमें पाप भी बहुत फैल जाता है।
अधर्माभि-भवात्-कृष्ण, प्रदुष्यन्ति कुल-स्त्रियः ।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्-ष्णेय, जायते वर्ण-सङ्करः ॥४१॥
हे कृष्ण! पापके अधिक बढ़ जानेसे कुलकी स्त्रियाँ अत्यन्त दूषित हो जाती हैं और हे वार्ष्णेय! स्त्रियोंके दूषित हो जानेपर वर्णसंकर उत्पन्न होता है।
सङ्करो नरकायैव, कुलघ्नानां(ङ्) कुलस्य च ।
पतन्ति पितरो ह्येषां(ल्ँ), लुप्त-पिण्डोदक-क्रियाः ॥४२॥
वर्णसंकर कुलघातियोंको और कुलको नरकमें ले जानेके लिये ही होता है। लुप्त हुई भोजन और जलकी क्रियासे वञ्चित इनके बुज़ुर्गलोग भी अधोगतिको प्राप्त होते हैं।
दोषैरेतैः(ख्) कुलघ्नानां(व्ँ), वर्ण-सङ्कर-कारकैः ।
उत्साद्यन्ते जाति-धर्माः(ख्), कुल-धर्माश्-च शाश्वताः ॥४३॥
इन वर्णसंकरकारक दोषोंसे कुलघातियोंके सनातन कुल-धर्म और जाति-धर्म नष्ट हो जाते हैं।
उत्सन्न-कुल-धर्माणां(म्), मनुष्याणां(ञ्) जनार्दन ।
नरकेऽनियतं(व्ँ) वासो, भवती-त्यनु-शुश्रुम ॥४४॥
हे जनार्दन! जिनका कुलधर्म नष्ट हो गया है, ऐसे मनुष्योंका अनिश्चित कालतक नरकमें वास होता है, ऐसा हम सुनते आये हैं।
अहो बत महत्-पापं(ङ्), कर्तुं(व्ँ) व्यवसिता वयम् ।
यद्-राज्य-सुख-लोभेन, हन्तुं(म्) स्वजन-मुद्यताः ॥४५॥
हा! शोक! हमलोग बुद्धिमान् होकर भी महान् पाप करनेको तैयार हो गये हैं, जो राज्य और सुखके लोभसे स्वजनोंको मारनेके लिये उद्यत हो गये हैं।
यदि मामप्रतीकारम्, अशस्त्रं(म्) शस्त्र-पाणयः ।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्,-तन्मे क्षेमतरं(म्) भवेत् ॥४६॥
यदि मुझ शस्त्ररहित एवं सामना न करनेवालेको शस्त्र हाथमें लिये हुए धृतराष्ट्रके पुत्र रणमें मार डालें तो वह मारना भी मेरे लिये अधिक कल्याणकारक होगा।
सञ्जय उवाच
एव-मुक्त्वार्जुनः(स्) सङ्ख्ये, रथोपस्थ उपाविशत् ।
विसृज्य सशरं(ञ्) चापं(म्), शोक-संविग्न-मानसः ॥४७॥
संजय बोले― रणभूमिमें शोकसे उद्विग्न मनवाले अर्जुन इस प्रकार कहकर, बाणसहित धनुषको त्यागकर रथके पिछले भागमें बैठ गये।
तं(न्) तथा कृपयाविष्टम्, अश्रु-पूर्णा-कुलेक्षणम् ।
विषीदन्त-मिदं(व्ँ) वाक्यम्, उवाच मधुसूदनः ॥४८।२।१॥
उस प्रकार करुणासे व्याप्त और आँसुओंसे पूर्ण तथा व्याकुल नेत्रोंवाले शोकयुक्त उस अर्जुनके प्रति भगवान् मधुसूदनने यह वचन कहा।
श्रीभगवानुवाच
कुतस्त्वा कश्मल-मिदं(व्ँ), विषमे समुपस्थितम् ।
अनार्य-जुष्ट-मस्वर्ग्यम्, अकीर्ति-कर-मर्जुन ॥४९।२।२॥
श्रीभगवान् बोले― हे अर्जुन! तुझे इस असमयमें यह मोह किस हेतुसे प्राप्त हुआ? क्योंकि न तो यह आर्य पुरुषोंद्वारा आचरित है, न स्वर्गको देनेवाला है और न कीर्तिको करनेवाला ही है।
क्लैब्यं(म्) मा स्म गमः(फ्) पार्थ, नैतत्-त्वय्-युप-पद्यते ।
क्षुद्रं(म्) हृदय-दौर्बल्यं(न्), त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्-तप ॥५०।२।३॥
इसलिये हे अर्जुन! नपुंसकताको मत प्राप्त हो, तुझमें यह उचित नहीं जान पड़ती। हे परंतप! हृदयकी तुच्छ दुर्बलताको त्यागकर युद्धके लिये खड़ा हो जा।
अर्जुन उवाच
कथं(म्) भीष्म-महं(म्) सङ्ख्ये, द्रोणं(ञ्) च मधुसूदन ।
इषुभिः(फ्) प्रति योत्स्यामि, पूजार्हा-वरि-सूदन ॥५१।२।४॥
अर्जुन बोले― हे मधुसूदन! मैं रणभूमिमें किस प्रकार बाणोंसे भीष्मपितामह और द्रोणाचार्यके विरुद्ध लड़ूँगा? क्योंकि हे अरिसूदन! वे दोनों ही पूजनीय हैं।
गुरू-नहत्वा हि महानुभावान्
श्रेयो भोक्तुं(म्) भैक्ष्य-मपीह लोके ।
हत्वार्थ-कामांस्तु गुरूनिहैव
भुञ्जीय भोगान्-रुधिर-प्रदिग्धान् ॥५२।२।५॥
इसलिये इन महानुभाव गुरुजनोंको न मारकर मैं इस लोकमें भिक्षाका अन्न भी खाना कल्याणकारक समझता हूँ; क्योंकि गुरुजनोंको मारकर भी इस लोकमें रुधिरसे सने हुए अर्थ और कामरूप भोगोंको ही तो भोगूँगा।
न चैतद्-विद्मः(ख्) कतरन्नो गरीयो-
यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः ।
यानेव हत्वा न जिजीविषामस्-
तेऽवस्थिताः(फ्) प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥५३।२।६॥
हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिये युद्ध करना और न करना― इन दोनोंमेंसे कौन-सा श्रेष्ठ है, अथवा यह भी नहीं जानते कि उन्हें हम जीतेंगे या हमको वे जीतेंगे। और जिनको मारकर हम जीना भी नहीं चाहते, वे ही हमारे आत्मीय धृतराष्ट्रके पुत्र हमारे मुकाबलेमें खड़े हैं।
कार्पण्य-दोषो-पहत-स्वभावः(फ्)
पृच्छामि त्वां(न्) धर्म-सम्मूढ-चेताः ।
यच्छ्रेयः(स्) स्यान्-निश्चितं(म्) ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं(म्) शाधि मां(न्) त्वां(म्) प्रपन्नम् ॥५४।२।७॥
इसलिये कायरतारूप दोषसे उपहत हुए स्वभाववाला तथा धर्मके विषयमें मोहितचित्त हुआ मैं आपसे पूछता हूँ कि जो साधन निश्चित कल्याणकारक हो, वह मेरे लिये कहिये; क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ, इसलिये आपके शरण हुए मुझको शिक्षा दीजिये।
न हि प्रपश्यामि ममा-पनुद्याद्-
यच्छोक-मुच्छोषण-मिन्द्रियाणाम् ।
अवाप्य भूमा-वसपत्न-मृद्धं(म्)
राज्यं(म्) सुराणा-मपि चाधिपत्यम् ॥५५।२।८॥
क्योंकि भूमिमें निष्कण्टक, धन-धान्यसम्पन्न राज्यको और देवताओंके स्वामीपनेको प्राप्त होकर भी मैं उस उपायको नहीं देखता हूँ, जो मेरी इन्द्रियोंके सुखानेवाले शोकको दूर कर सके।
सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वा हृषीकेशं(ङ्), गुडाकेशः(फ्) परन्-तप ।
न योत्स्य इति गोविन्दम्, उक्त्वा तूष्णीं(म्) बभूव ह ॥५६।२।९॥
संजय बोले― हे राजन्! निद्राको जीतनेवाले अर्जुन श्रीकृष्ण महाराजके प्रति इस प्रकार कहकर फिर श्री गोविन्दभगवान्से 'युद्ध नहीं करूँगा' यह स्पष्ट कहकर चुप हो गये।
॥इति श्रीमद्भगवद्गीतायां प्रथमोऽध्यायः॥
॥ ओ३म् ॥
श्रीपरमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता
अथ द्वितीयोऽध्यायः
तमुवाच हृषीकेशः(फ्), प्रहसन्-निव भारत ।
सेनयो-रुभयोर्-मध्ये, विषीदन्त-मिदं(व्ँ) वचः ॥१।२।१०॥
हे भरतवंशी धृतराष्ट्र! श्रीकृष्ण महाराज दोनों सेनाओंके बीचमें शोक करते हुए उस अर्जुनको हँसते हुए-से यह वचन बोले।
श्रीभगवानुवाच
अशोच्या-नन्व-शोचस्-त्वं(म्), प्रज्ञा-वादांश्-च भाषसे ।
गतासू-नगतासूंश्-च, नानु-शोचन्ति पण्डिताः ॥२।२।११॥
श्रीभगवान् बोले― हे अर्जुन! तू न शोक करनेयोग्य मनुष्योंके लिये शोक करता है और पण्डितोंके-से वचनोंको कहता है; परंतु जिनके प्राण चले गये हैं, उनके लिये और जिनके प्राण नहीं गये हैं उनके लिये भी पण्डितजन शोक नहीं करते।
न त्वेवाहं(ञ्) जातु नासं(न्), न त्वं(न्) नेमे जनाधिपाः ।
न चैव न भविष्यामः(स्), सर्वे वयमतः(फ्) परम् ॥३।२।१२॥
न तो ऐसा ही है कि मैं किसी कालमें नहीं था, तू नहीं था अथवा ये राजालोग नहीं थे और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे।
देहिनोऽस्मिन् यथा देहे, कौमारं(य्ँ) यौवनं(ञ्) जरा ।
तथा देहान्तर-प्राप्तिर्, धीरस्-तत्र न मुह्यति ॥४।२।१३॥
जैसे जीवात्माकी इस देहमें बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही अन्य शरीरकी प्राप्ति होती है; उस विषयमें धीर पुरुष मोहित नहीं होता।
मात्रा-स्पर्शास्-तु कौन्तेय, शीतोष्ण-सुख-दुःखदाः ।
आगमा-पायिनोऽनित्यास्, तांस्-तितिक्षस्व भारत ॥५।२।१४॥
हे कुन्तीपुत्र! सर्दी-गर्मी और सुख-दुःखको देनेवाले इन्द्रिय और विषयोंके संयोग तो उत्पत्ति-विनाशशील और अनित्य हैं, इसलिये हे भारत! उनको तू सहन कर।
यं(म्) हि न व्यथयन्त्येते, पुरुषं(म्) पुरुषर्षभ ।
सम-दुःख-सुखं(न्) धीरं(म्), सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥६।२।१५॥
क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ! दुःख-सुखको समान समझनेवाले जिस धीर पुरुषको ये इन्द्रिय और विषयोंके संयोग व्याकुल नहीं करते, वह मोक्षके योग्य होता है।
नासतो विद्यते भावो, नाभावो विद्यते सतः ।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्, त्वनयोस्-तत्त्वदर्शिभिः ॥७।२।१६॥
असत् वस्तुकी तो सत्ता नहीं है और सत्का अभाव नहीं है। इस प्रकार इन दोनोंका ही तत्त्व तत्त्वज्ञानी पुरुषोंद्वारा देखा गया है।
अविनाशि तु तद्-विद्धि, येन सर्वमिदं(न्) ततम् ।
विनाश-मव्ययस्यास्य, न कश्चित् कर्तु-मर्हति ॥८।२।१७॥
नाशरहित तो तू उसको जान, जिससे यह सम्पूर्ण जगत्― दृश्यवर्ग व्याप्त है। इस अविनाशीका विनाश करनेमें कोई भी समर्थ नहीं है।
अन्तवन्त इमे देहा, नित्यस्योक्ताः(श्) शरीरिणः ।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य, तस्माद्-युध्यस्व भारत ॥९।२।१८॥
इस नाशरहित, अप्रमेय, नित्यस्वरूप जीवात्माके ये सब शरीर नाशवान् कहे गये हैं। इसलिये हे भरतवंशी अर्जुन! तू युद्ध कर।
य एनं(व्ँ) वेत्ति हन्तारं(य्ँ), यश्-चैनं(म्) मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो, नायं(म्) हन्ति न हन्यते ॥१०।२।१९॥
जो इस आत्माको मारनेवाला समझता है तथा जो इसको मरा मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते; क्योंकि यह आत्मा वास्तवमें न तो किसीको मारता है और न किसीके द्वारा मारा जाता है।
न जायते म्रियते वा कदाचिन्-
नायं(म्) भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः(श्) शाश्वतोऽयं(म्) पुराणो-
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥११।२।२०॥
यह आत्मा किसी कालमें भी न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होनेवाला ही है; क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है; शरीरके मारे जानेपर भी यह नहीं मारा जाता।
वेदाविनाशिनं(न्) नित्यं(य्ँ), य एन-मज-मव्ययम् ।
कथं(म्) स पुरुषः(फ्) पार्थ, कं(ङ्) घातयति हन्ति कम् ॥१२।२।२१॥
हे पृथापुत्र अर्जुन! जो पुरुष इस आत्माको नाशरहित, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह पुरुष कैसे किसको मरवाता है और कैसे किसको मारता है?
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥१३।२।२२॥
जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रोंको त्यागकर दूसरे नये वस्त्रोंको ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरोंको त्यागकर दूसरे नये शरीरोंको प्राप्त होता है।
नैनं(ञ्) छिन्दन्ति शस्त्राणि, नैनं(न्) दहति पावकः ।
न चैनं(ङ्) क्लेदयन्-त्यापो, न शोषयति मारुतः ॥१४।२।२३॥
इस आत्माको शस्त्र नहीं काट सकते, इसको आग नहीं जला सकती, इसको जल नहीं गला सकता और वायु नहीं सुखा सकता।
अव्यक्तोऽय-मचिन्त्योऽयम्, अविकार्योऽय-मुच्यते ।
तस्मादेवं(व्ँ) विदित्वैनं(न्), नानु-शोचितु-मर्हसि ॥१५।२।२५॥
यह आत्मा अव्यक्त है, यह आत्मा अचिन्त्य है और यह आत्मा विकाररहित कहा जाता है। इससे हे अर्जुन! इस आत्माको उपर्युक्त प्रकारसे जानकर तू शोक करनेको योग्य नहीं है अर्थात् तुझे शोक करना उचित नहीं है।
अथ चैनं(न्) नित्य-जातं(न्), नित्यं(व्ँ) वा मन्यसे मृतम् ।
तथापि त्वं(म्) महाबाहो, नैवं(म्) शोचितु-मर्हसि ॥१६।२।२६॥
किन्तु यदि तू इस आत्माको सदा जन्मनेवाला तथा सदा मरनेवाला मानता हो, तो भी हे महाबाहो! तू इस प्रकार शोक करनेको योग्य नहीं है।
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर,-ध्रुवं(ञ्) जन्म मृतस्य च ।
तस्मा-दपरिहार्येऽर्थे, न त्वं(म्) शोचितु-मर्हसि ॥१७।२।२७॥
क्योंकि इस मान्यताके अनुसार जन्मे हुएकी मृत्यु निश्चित है और मरे हुएका जन्म निश्चित है। इससे भी इस बिना उपायवाले विषयमें तू शोक करनेको योग्य नहीं है।
अव्यक्तादीनि भूतानि, व्यक्त-मध्यानि भारत ।
अव्यक्त-निधनान्येव, तत्र का परिदेवना ॥१८।२।२८॥
हे अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणी जन्मसे पहले अप्रकट थे और मरनेके बाद भी अप्रकट हो जानेवाले हैं, केवल बीचमें ही प्रकट हैं; फिर ऐसी स्थितिमें क्या शोक करना है?
आश्चर्यवत्-पश्यति कश्चिदेनम्-
आश्चर्य-वद्-वदति तथैव चान्यः ।
आश्चर्य-वच्चैन-मन्यः(श्) शृणोति
श्रुत्वा-प्येनं(व्ँ) वेद न चैव कश्चित् ॥१९।२।२९॥
कोई एक महापुरुष ही इस आत्माको आश्चर्यकी भाँति देखता है और वैसे ही दूसरा कोई महापुरुष ही इसके तत्त्वका आश्चर्यकी भाँति वर्णन करता है तथा दूसरा कोई अधिकारी पुरुष ही इसे आश्चर्यकी भाँति सुनता है और कोई-कोई तो सुनकर भी इसको नहीं जानता।
देही नित्य-मवध्योऽयं(न्), देहे सर्वस्य भारत ।
तस्मात्-सर्वाणि भूतानि, न त्वं(म्) शोचितु-मर्हसि ॥२०।२।३०॥
हे अर्जुन! यह आत्मा सबके शरीरोंमें सदा ही अवध्य है। इस कारण सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये तू शोक करनेके योग्य नहीं है।
स्वधर्म-मपि चावेक्ष्य, न विकम्पितु-मर्हसि ।
धर्म्याद्धि युद्धाच्-छ्रेयोऽन्यत्, क्षत्रियस्य न विद्यते ॥२१।२।३१॥
तथा अपने धर्मको देखकर भी तू भय करनेयोग्य नहीं है अर्थात् तुझे भय नहीं करना चाहिये; क्योंकि क्षत्रियके लिये धर्मयुक्त युद्धसे बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है।
यदृच्छया चोपपन्नं(म्), स्वर्ग-द्वार-मपावृतम् ।
सुखिनः क्षत्रियाः(फ्) पार्थ, लभन्ते युद्ध-मीदृशम् ॥२२।२।३२॥
हे पार्थ! अपने-आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्गके द्वाररूप इस प्रकारके युद्धको भाग्यवान् क्षत्रियलोग ही पाते हैं।
अथ चेत्त्व-मिमं(न्) धर्म्यं(म्), सङ्ग्रामं(न्) न करिष्यसि ।
ततः(स्) स्वधर्मं(ङ्) कीर्तिं(ञ्) च, हित्वा पाप-मवाप्स्यसि ॥२३।२।३३॥
किन्तु यदि तू इस धर्मयुक्त युद्धको नहीं करेगा तो स्वधर्म और कीर्तिको खोकर पापको प्राप्त होगा।
अकीर्तिं(ञ्) चापि भूतानि, कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् ।
सम्भावितस्य चाकीर्तिर्,-मरणा-दतिरिच्यते ॥२४।२।३४॥
तथा सब लोग तेरी बहुत कालतक रहनेवाली अपकीर्तिका भी कथन करेंगे और माननीय पुरुषके लिये अपकीर्ति मरणसे भी बढ़कर है।
भयाद्-रणा-दुपरतं(म्), मंस्यन्ते त्वां(म्) महारथाः ।
येषां(ञ्) च त्वं(म्) बहुमतो, भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥२५।२।३५॥
और जिनकी दृष्टिमें तू पहले बहुत सम्मानित होकर अब लघुताको प्राप्त होगा, वे महारथीलोग तुझे भयके कारण युद्धसे हटा हुआ मानेंगे।
अवाच्य-वादांश्-च बहून्, वदिष्यन्ति तवाहिताः ।
निन्दन्तस्-तव सामर्थ्यं(न्), ततो दुःखतरं(न्) नु किम् ॥२६।२।३६॥
तेरे वैरीलोग तेरे सामर्थ्यकी निन्दा करते हुए तुझे बहुत-से न कहने योग्य वचन भी कहेंगे; उससे अधिक दुःख और क्या होगा?
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं(ञ्), जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् ।
तस्मा-दुत्तिष्ठ कौन्तेय, युद्धाय कृत-निश्चयः ॥२७।२।३७॥
या तो तू युद्धमें मारा जाकर स्वर्गको प्राप्त होगा अथवा संग्राममें जीतकर पृथ्वीका राज्य भोगेगा। इस कारण हे अर्जुन! तू युद्धके लिये निश्चय करके खड़ा हो जा।
सुख-दुःखे समे कृत्वा, लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व, नैवं(म्) पाप-मवाप्स्यसि ॥२८।२।३८॥
जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुःखको समान समझकर, उसके बाद युद्धके लिये तैयार हो जा; इस प्रकार युद्ध करनेसे तू पापको नहीं प्राप्त होगा।
॥इति श्रीमद्भगवद्गीतायां द्वितीयोऽध्यायः॥
॥ ओ३म् ॥
श्रीपरमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता
अथ तृतीयोऽध्यायः
एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये, बुद्धिर्-योगे त्विमां(म्) शृणु ।
बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ, कर्म-बन्धं(म्) प्रहास्यसि ॥१।२।३९॥
हे पार्थ! यह बुद्धि तेरे लिये सांख्ययोगके विषयमें कही गयी और अब तू इसको कर्मयोगके विषयमें सुन― जिस बुद्धिसे युक्त हुआ तू कर्मोंके बन्धनको भलीभाँति त्याग देगा अर्थात् सर्वथा नष्ट कर डालेगा।
नेहाभिक्रम-नाशोऽस्ति, प्रत्यवायो न विद्यते ।
स्वल्प-मप्यस्य धर्मस्य, त्रायते महतो भयात् ॥२।२।४०॥
इस कर्मयोगमें आरम्भका अर्थात् बीजका नाश नहीं है और उलटा फलरूप दोष भी नहीं है, बल्कि इस कर्मयोगरूप धर्मका थोड़ा-सा भी साधन जन्म-मृत्युरूप महान् भयसे रक्षा कर लेता है।
व्यवसायात्मिका बुद्धिर्,-एकेह कुरु-नन्दन ।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्-च, बुद्धयोऽव्यव-सायिनाम् ॥३।२।४१॥
हे अर्जुन! इस कर्मयोगमें निश्चयात्मिका बुद्धि एक ही होती है; किन्तु अस्थिर विचारवाले विवेकहीन सकाम मनुष्योंकी बुद्धियाँ निश्चय ही बहुत भेदोंवाली और अनन्त होती हैं।
यामिमां(म्) पुष्पितां(व्ँ) वाचं(म्), प्रवदन्त्य-विपश्चितः ।
वेद-वाद-रताः(फ्) पार्थ, नान्य-दस्तीति वादिनः ॥
कामात्मानः(स्) स्वर्ग-परा, जन्म-कर्म-फल-प्रदाम् ।
क्रिया-विशेष-बहुलां(म्), भोगैश्वर्य-गतिं(म्) प्रति ॥
भोगैश्वर्य-प्रसक्तानां(न्), तयापहृत-चेतसाम् ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः(स्), समाधौ न विधीयते ॥ ४-६।२।४२-४४॥
हे अर्जुन! जो भोगोंमें तन्मय हो रहे हैं, जो कर्मफलके प्रशंसक वेदके वाद-विवादमें रत हैं, जिनकी बुद्धिमें स्वर्ग ही परम प्राप्य वस्तु है और जो स्वर्गसे बढ़कर दूसरी कोई वस्तु ही नहीं है― ऐसा कहनेवाले हैं, वे अविवेकीजन इस प्रकारकी जिस पुष्पित अर्थात् दिखाऊ शोभायुक्त वाणीको कहा करते हैं जो कि जन्मरूप कर्मफल देनेवाली एवं भोग तथा ऐश्वर्यकी प्राप्तिके लिये नाना प्रकारकी बहुत-सी क्रियाओंका वर्णन करनेवाली है, उस वाणीद्वारा जिनका चित्त हर लिया गया है, जो भोग और ऐश्वर्यमें अत्यन्त आसक्त हैं, उन पुरुषोंकी परमात्मामें निश्चियात्मिका बुद्धि नहीं होती।
कर्मण्ये-वाधिकारस्-ते, मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्म-फल-हेतुर्-भूर्,-मा ते सङ्गोऽस्त्व-कर्मणि ॥७।२।४७॥
तेरा कर्म करनेमें ही अधिकार है, उसके फलोंमें कभी नहीं। इसलिये तू कर्मोंके फलका हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करनेमें भी आसक्ति न हो।
योगस्थः(ख्) कुरु कर्माणि, सङ्गं(न्) त्यक्त्वा धनञ्जय ।
सिद्ध्य-सिद्ध्योः(स्) समो भूत्वा, समत्वं(य्ँ) योग उच्यते ॥८।२।४८॥
हे धनंजय! तू आसक्तिको त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धिमें समान बुद्धिवाला होकर योगमें स्थित हुआ कर्तव्यकर्मोंको कर, समत्व ही योग कहलाता है।
दूरेण ह्यवरं(ङ्) कर्म, बुद्धि-योगाद्-धनञ्जय ।
बुद्धौ शरण-मन्विच्छ, कृपणाः(फ्) फल-हेतवः ॥९।२।४९॥
इस समत्वरूप बुद्धियोगसे सकाम कर्म अत्यन्त ही निम्न श्रेणीका है। इसलिये हे धनंजय! तू समबुद्धिमें ही रक्षाका उपाय ढूँढ़ अर्थात् बुद्धियोगका ही आश्रय ग्रहण कर; क्योंकि फलके हेतु बननेवाले अत्यन्त दीन हैं।
बुद्धि-युक्तो जहातीह, उभे सुकृत-दुष्कृते ।
तस्माद्-योगाय युज्यस्व, योगः(ख्) कर्मसु कौशलम् ॥१०।२।५०॥
समबुद्धियुक्त पुरुष पुण्य और पाप दोनोंको इसी लोकमें त्याग देता है अर्थात् उनसे मुक्त हो जाता है। इससे तू समत्वरूप योगमें लग जा; यह समत्वरूप योग ही कर्मोंमें कुशलता है अर्थात् कर्मबन्धनसे छूटनेका उपाय है।
कर्मजं(म्) बुद्धि-युक्ता हि, फलं(न्) त्यक्त्वा मनीषिणः ।
जन्म-बन्ध-विनिर्मुक्ताः(फ्), पदं(ङ्) गच्छन्-त्यनामयम् ॥११।२।५१॥
क्योंकि समबुद्धिसे युक्त ज्ञानीजन कर्मोंसे उत्पन्न होनेवाले फलको त्यागकर जन्मरूप बन्धनसे मुक्त हो निर्विकार परमपदको प्राप्त हो जाते हैं।
यदा ते मोह-कलिलं(म्), बुद्धिर्-व्यति-तरिष्यति ।
तदा गन्तासि निर्वेदं(म्), श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥१२।२।५२॥
जिस कालमें तेरी बुद्धि मोहरूप दलदलको भलीभाँति पार कर जायगी, उस समय तू सुने हुए और सुननेमें आनेवाले इस लोक और परलोकसम्बन्धी सभी भोगोंसे वैराग्यको प्राप्त हो जायगा।
श्रुति-विप्रतिपन्ना ते, यदा स्थास्यति निश्चला ।
समाधा-वचला बुद्धिस्,-तदा योग-मवाप्स्यसि ॥१३।२।५३॥
भाँति-भाँतिके वचनोंको सुननेसे विचलित हुई तेरी बुद्धि जब परमात्मामें अचल और स्थिर ठहर जायगी, तब तू योगको प्राप्त हो जायगा अर्थात् तेरा परमात्मासे नित्य संयोग हो जायगा।
॥इति श्रीमद्भगवद्गीतायां तृतीयोऽध्यायः॥
॥ ओ३म् ॥
श्रीपरमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता
अथ चतुर्थोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
स्थित-प्रज्ञस्य का भाषा, समाधिस्थस्य केशव ।
स्थितधीः(ख्) किं(म्) प्रभाषेत, किमासीत व्रजेत किम् ॥१।२।५४॥
अर्जुन बोले― हे केशव! समाधिमें स्थित परमात्माको प्राप्त हुए स्थिरबुद्धि पुरुषका क्या लक्षण है? वह स्थिरबुद्धि पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?
श्रीभगवानुवाच
प्रजहाति यदा कामान्, सर्वान् पार्थ मनोगतान् ।
आत्मन्ये-वात्मना तुष्टः(स्), स्थित-प्रज्ञस्-तदोच्यते ॥२।२।५५॥
श्रीभगवान् बोले― हे अर्जुन! जिस कालमें यह पुरुष मनमें स्थित सम्पूर्ण कामनाओंको भलीभाँति त्याग देता है और आत्मासे आत्मामें ही संतुष्ट रहता है, उस कालमें वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।
दुःखे-ष्वनुद्विग्न-मनाः(स्), सुखेषु विगत-स्पृहः ।
वीत-राग-भय-क्रोधः(स्), स्थित-धीर्-मुनि-रुच्यते ॥३।२।५६॥
दुःखोंकी प्राप्ति होनेपर जिसके मनमें उद्वेग नहीं होता, सुखोंकी प्राप्तिमें जो सर्वथा निःस्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं, ऐसा मुनि स्थिरबुद्धि कहा जाता है।
यः(स्) सर्वत्रा-नभिस्नेहस्,-तत्-तत्-प्राप्य शुभाशुभम् ।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि, तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥४।२।५७॥
जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित हुआ उस-उस शुभ या अशुभ वस्तुको प्राप्त होकर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है उसकी बुद्धि स्थिर है।
यदा संहरते चायं(ङ्), कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ।
इन्द्रिया-णीन्द्रियार्थेभ्यस्,-तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥५।२।५८॥
और कछुवा सब ओरसे अपने अङ्गोंको जैसे समेट लेता है, वैसे ही जब यह पुरुष इन्द्रियोंके विषयोंसे इन्द्रियोंको सब प्रकारसे हटा लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर है (ऐसा समझना चाहिये)।
विषया विनिवर्तन्ते, निराहारस्य देहिनः ।
रस-वर्जं(म्) रसोऽप्यस्य, परं(न्) दृष्ट्वा निवर्तते ॥६।२।५९॥
इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंको ग्रहण न करनेवाले पुरुषके भी केवल विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, परन्तु उनमें रहनेवाली आसक्ति निवृत्त नहीं होती। इस स्थितप्रज्ञ पुरुषकी तो आसक्ति भी परमात्माका साक्षात्कार करके निवृत्त हो जाती है।
ध्यायतो विषयान् पुंसः(स्), सङ्गस्-तेषूप-जायते ।
सङ्गात्-सञ्जायते कामः(ख्), कामात्-क्रोधोऽभि-जायते ॥७।२।६२॥
विषयोंका चिन्तन करनेवाले पुरुषकी उन विषयोंमें आसक्ति हो जाती है, आसक्तिसे उन विषयोंकी कामना उत्पन्न होती है और कामनामें विघ्न पड़नेसे क्रोध उत्पन्न होता है।
क्रोधाद्-भवति सम्मोहः(स्), सम्मोहात्-स्मृति-विभ्रमः ।
स्मृति-भ्रंशाद् बुद्धि-नाशो, बुद्धि-नाशात्-प्रणश्यति ॥८।२।६३॥
क्रोधसे अत्यन्त मूढ़भाव उत्पन्न हो जाता है, मूढ़भावसे स्मृतिमें भ्रम हो जाता है, स्मृतिमें भ्रम हो जानेसे बुद्धि अर्थात् ज्ञानशक्तिका नाश हो जाता है और बुद्धिका नाश हो जानेसे यह पुरुष अपनी स्थितिसे गिर जाता है।
राग-द्वेष-वियुक्तैस्-तु, विषया-निन्द्रियैश्-चरन् ।
आत्म-वश्यैर्-विधेयात्मा, प्रसाद-मधि-गच्छति ॥९।२।६४॥
परंतु अपने अधीन किये हुए अन्तःकरणवाला साधक अपने वशमें की हुई, राग-द्वेषसे रहित इन्द्रियोंद्वारा विषयोंमें विचरण करता हुआ अन्तःकरणकी प्रसन्नताको प्राप्त होता है।
प्रसादे सर्व-दुःखानां(म्), हानि-रस्योप-जायते ।
प्रसन्न-चेतसो ह्याशु, बुद्धिः(फ्) पर्यव-तिष्ठते ॥१०।२।६५॥
अन्तःकरणकी प्रसन्नता होनेपर इसके सम्पूर्ण दुःखोंका अभाव हो जाता है और उस प्रसन्नचित्त-वाले कर्मयोगीकी बुद्धि शीघ्र ही सब ओरसे हटकर एक परमात्मामें ही भलीभाँति स्थिर हो जाती है।
नास्ति बुद्धि-रयुक्तस्य, न चायुक्तस्य भावना ।
न चाभावयतः(श्) शान्तिर्,-अशान्तस्य कुतः(स्) सुखम् ॥११।२।६६॥
न जीते हुए मन और इन्द्रियोंवाले पुरुषमें निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती और उस अयुक्त मनुष्यके अन्तःकरणमें भावना भी नहीं होती तथा भावनाहीन मनुष्यको शान्ति नहीं मिलती और शान्तिरहित मनुष्यको सुख कैसे मिल सकता है?
आपूर्यमाण-मचल-प्रतिष्ठं(म्)
समुद्र-मापः(फ्) प्रविशन्ति यद्वत् ।
तद्वत् कामा यं(म्) प्रविशन्ति सर्वे
स शान्ति-माप्नोति न काम-कामी ॥१२।२।७०॥
जैसे नाना नदियोंके जल सब ओरसे परिपूर्ण अचल प्रतिष्ठावाले समुद्रमें उसको विचलित न करते हुए ही समा जाते हैं, वैसे ही सब भोग जिस स्थितप्रज्ञ पुरुषमें किसी प्रकारका विकार उत्पन्न किये बिना ही समा जाते हैं, वही पुरुष परमशान्तिको प्राप्त होता है, भोगोंको चाहनेवाला नहीं।
विहाय कामान् यः(स्) सर्वान्, पुमांश्-चरति निःस्पृहः ।
निर्ममो निरहङ्कारः(स्), स शान्ति-मधि-गच्छति ॥१३।२।७१॥
जो पुरुष सम्पूर्ण कामनाओंको त्यागकर ममतारहित, अहंकाररहित और स्पृहारहित हुआ विचरता है, वही शान्तिको प्राप्त होता है अर्थात् वह शान्तिको प्राप्त है।
एषा ब्राह्मी स्थितिः(फ्) पार्थ, नैनां(म्) प्राप्य विमुह्यति ।
स्थित्वास्या-मन्त-कालेऽपि, ब्रह्म-निर्वाण-मृच्छति ॥१४।२।७२॥
हे अर्जुन! यह ब्रह्मको प्राप्त हुए पुरुषकी स्थिति है, इसको प्राप्त होकर योगी कभी मोहित नहीं होता और अन्तकालमें भी इस ब्राह्मी स्थितिमें स्थित होकर ब्रह्मानन्दको प्राप्त हो जाता है।
॥इति श्रीमद्भगवद्गीतायां चतुर्थोऽध्यायः॥
॥ ओ३म् ॥
श्रीपरमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता
अथ पञ्चमोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
ज्यायसी चेत्-कर्मणस्-ते, मता बुद्धिर्-जनार्दन ।
तत्-किं(ङ्) कर्मणि घोरे मां(न्), नियोजयसि केशव ॥१।३।१॥
अर्जुन बोले― हे जनार्दन! यदि आपको कर्मकी अपेक्षा ज्ञान श्रेष्ठ मान्य है तो फिर हे केशव! मुझे भयङ्कर कर्ममें क्यों लगाते हैं?
व्या-मिश्रेणेव वाक्येन, बुद्धिं(म्) मोहयसीव मे ।
तदेकं(व्ँ) वद निश्चित्य, येन श्रेयोऽह-माप्नुयाम् ॥२।३।२॥
आप मिले हुए-से वचनोंसे मेरी बुद्धिको मानो मोहित कर रहे हैं। इसलिये उस एक बातको निश्चित करके कहिये जिससे मैं कल्याणको प्राप्त हो जाऊँ।
श्रीभगवानुवाच
लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा, पुरा प्रोक्ता मयानघ ।
ज्ञान-योगेन साङ्ख्यानां(ङ्), कर्म-योगेन योगिनाम् ॥३।३।३॥
श्रीभगवान् बोले― हे निष्पाप! इस लोकमें दो प्रकारकी निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गयी है। उनमेंसे सांख्ययोगियोंकी निष्ठा तो ज्ञानयोगसे और योगियोंकी निष्ठा कर्मयोगसे होती है।
न कर्मणा-मनारम्भान्,-नैष्कर्म्यं(म्) पुरुषोऽश्नुते ।
न च सन्न्यसना-देव, सिद्धिं(म्) समधि-गच्छति ॥४।३।४॥
मनुष्य न तो कर्मोंका आरम्भ किये बिना निष्कर्मताको यानी योगनिष्ठाको प्राप्त होता है और न कर्मोंके केवल त्यागमात्रसे सिद्धि यानी सांख्यनिष्ठाको ही प्राप्त होता है।
न हि कश्चित् क्षणमपि, जातु तिष्ठ-त्यकर्म-कृत् ।
कार्यते ह्यवशः(ख्) कर्म, सर्वः(फ्) प्रकृतिजैर्-गुणैः ॥५।३।५॥
निःसन्देह कोई भी मनुष्य किसी भी कालमें क्षणमात्र भी बिना कर्म किये नहीं रहता; क्योंकि सारा मनुष्यसमुदाय प्रकृतिजनित गुणोंद्वारा परवश हुआ कर्म करनेके लिये बाध्य किया जाता है।
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य, य आस्ते मनसा स्मरन् ।
इन्द्रियार्थान्-विमूढात्मा, मिथ्याचारः(स्) स उच्यते ॥६।३।६॥
जो मूढ़बुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियोंको हठपूर्वक ऊपरसे रोककर मनसे उन इन्द्रियोंके विषयोंका चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात् दम्भी कहा जाता है।
यस्-त्विन्द्रियाणि मनसा, नियम्या-रभतेऽर्जुन ।
कर्मेन्द्रियैः(ख्) कर्म-योगम्, असक्तः(स्) स विशिष्यते ॥७।३।७॥
किन्तु हे अर्जुन! जो पुरुष मनसे इन्द्रियोंको वशमें करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियोंद्वारा कर्मयोगका आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है।
नियतं(ङ्) कुरु कर्म त्वं(ङ्), कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।
शरीर-यात्रापि च ते, न प्रसिद्ध्ये-दकर्मणः ॥८।३।८॥
तू शास्त्रविहित कर्तव्यकर्म कर; क्योंकि कर्म न करनेकी अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करनेसे तेरा शरीर-निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा।
॥इति श्रीमद्भगवद्गीतायां पञ्चमोऽध्यायः॥
॥ ओ३म् ॥
श्रीपरमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता
अथ षष्ठोऽध्यायः
यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र, लोकोऽयं(ङ्) कर्म-बन्धनः ।
तदर्थं(ङ्) कर्म कौन्तेय, मुक्त-सङ्गः(स्) समाचर ॥१।३।९॥
यज्ञके निमित्त किये जानेवाले कर्मोंसे अतिरिक्त दूसरे कर्मोंमें लगा हुआ ही यह मुनष्यसमुदाय कर्मोंसे बँधता है। इसलिये हे अर्जुन! तू आसक्तिसे रहित होकर उस यज्ञके निमित्त ही भलीभाँति कर्तव्यकर्म कर।
सह-यज्ञाः(फ्) प्रजाः(स्) सृष्ट्वा, पुरोवाच प्रजापतिः ।
अनेन प्रसविष्यध्वम्, एष वोऽस्त्विष्ट-कामधुक् ॥२।३।१०॥
प्रजापति ब्रह्माने कल्पके आदिमें यज्ञसहित प्रजाओंको रचकर उनसे कहा कि तुमलोग इस यज्ञके द्वारा वृद्धिको प्राप्त होओ और यह यज्ञ तुमलोगोंको इच्छित भोग प्रदान करनेवाला हो।
देवान्-भावयतानेन, ते देवा भावयन्तु वः ।
परस्परं(म्) भावयन्तः(श्), श्रेयः(फ्) पर-मवाप्स्यथ ॥३।३।११॥
तुमलोग इस यज्ञके द्वारा देवताओंको उन्नत करो और वे देवता तुमलोगोंको उन्नत करें। इस प्रकार निःस्वार्थभावसे एक-दूसरेको उन्नत करते हुए तुमलोग परम कल्याणको प्राप्त हो जाओगे।
इष्टान्-भोगान्-हि वो देवा, दास्यन्ते यज्ञ-भाविताः ।
तैर्-दत्ता-नप्रदायैभ्यो, यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ॥४।३।१२॥
यज्ञके द्वारा बढ़ाये हुए देवता तुमलोगोंको बिना माँगे ही इच्छित भोग निश्चय ही देते रहेंगे। इस प्रकार उन देवताओंके द्वारा दिये हुए भोगोंको जो पुरुष उनको बिना दिये स्वयं भोगता है, वह चोर ही है।
यज्ञ-शिष्टाशिनः(स्) सन्तो, मुच्यन्ते सर्व-किल्बिषैः ।
भुञ्जते ते त्वघं(म्) पापा, ये पचन्-त्यात्म-कारणात् ॥५।३।१३॥
यज्ञसे बचे हुए अन्नको खानेवाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापोंसे मुक्त हो जाते हैं और जो पापीलोग अपना शरीर-पोषण करनेके लिये ही अन्न पकाते हैं, वे तो पापको ही खाते हैं।
अन्नाद्-भवन्ति भूतानि, पर्जन्या-दन्न-सम्भवः ।
यज्ञाद्-भवति पर्जन्यो, यज्ञः(ख्) कर्म-समुद्भवः ॥
कर्म ब्रह्मोद्-भवं(व्ँ) विद्धि, ब्रह्माक्षर-समुद्-भवम् ।
तस्मात् सर्वगतं(म्) ब्रह्म, नित्यं(य्ँ) यज्ञे प्रतिष्ठितम् ॥६-७।३।१४-१५॥
सम्पूर्ण प्राणी अन्नसे उत्पन्न होते हैं, अन्नकी उत्पत्ति वृष्टिसे होती है, वृष्टि यज्ञसे होती है और यज्ञ विहित कर्मोंसे उत्पन्न होनेवाला है। कर्म-समुदायको तू वेदसे उत्पन्न और वेदको अविनाशी परमात्मासे उत्पन्न हुआ जान। इससे सिद्ध होता है कि सर्वव्यापी परम अक्षर परमात्मा सदा ही यज्ञमें प्रतिष्ठित है।
एवं(म्) प्रवर्तितं(ञ्) चक्रं(न्), नानु-वर्तयतीह यः ।
अघायु-रिन्द्रिया-रामो, मोघं(म्) पार्थ स जीवति ॥८।३ १६॥
हे पार्थ! जो पुरुष इस लोकमें इस प्रकार परम्परासे प्रचलित सृष्टिचक्रके अनुकूल नहीं बरतता अर्थात् अपने कर्तव्यका पालन नहीं करता, वह इन्द्रियोंके द्वारा भोगोंमें रमण करनेवाला पापायु पुरुष व्यर्थ ही जीता है।
॥इति श्रीमद्भगवद्गीतायां षष्ठोऽध्यायः॥
॥ ओ३म् ॥
श्रीपरमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता
अथ सप्तमोऽध्यायः
यस्त्वात्म-रति-रेव स्याद्, आत्म-तृप्तश्-च मानवः ।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्,-तस्य कार्यं(न्) न विद्यते ॥१।३।१७॥
परन्तु जो मनुष्य आत्मामें ही रमण करने-वाला और आत्मामें ही तृप्त तथा आत्मामें ही सन्तुष्ट हो, उसके लिये कोई कर्तव्य नहीं है।
नैव तस्य कृतेनार्थो, नाकृतेनेह कश्चन ।
न चास्य सर्व-भूतेषु, कश्चिदर्थ-व्यपाश्रयः ॥२।३।१८॥
उस महापुरुषका इस विश्वमें न तो कर्म करनेसे कोई प्रयोजन रहता है और न कर्मोंके न करनेसे ही कोई प्रयोजन रहता है। तथा सम्पूर्ण प्राणियोंमें भी इसका किञ्चिन्मात्र भी स्वार्थका सम्बन्ध नहीं रहता।
तस्मा-दसक्तः(स्) सततं(ङ्), कार्यं(ङ्) कर्म समाचर ।
असक्तो ह्याचरन् कर्म, परमाप्नोति पूरुषः ॥३।३।१९॥
इसलिये तू निरन्तर आसक्तिसे रहित होकर सदा कर्तव्यकर्मको भलीभाँति करता रह। क्योंकि आसक्तिसे रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्माको प्राप्त हो जाता है।
कर्मणैव हि संसिद्धिम्, आस्थिता जनकादयः ।
लोक-सङ्ग्रह-मेवापि, सम्पश्यन् कर्तु-मर्हसि ॥४।३।२०॥
जनकादि ज्ञानीजन भी आसक्तिरहित कर्मद्वारा ही परम सिद्धिको प्राप्त हुए थे। इसलिये तथा लोकसंग्रहको देखते हुए भी तू कर्म करनेके ही योग्य है अर्थात् तुझे कर्म करना ही उचित है।
यद्-यदाचरति श्रेष्ठस्,-तत्-तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्-प्रमाणं(ङ्) कुरुते, लोकस्-तदनुवर्तते ॥५।३।२१॥
श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्यसमुदाय उसीके अनुसार बरतने लग जाता है।
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं(न्), त्रिषु लोकेषु किञ्चन ।
नानवाप्त-मवाप्तव्यं(व्ँ), वर्त एव च कर्मणि ॥६।३।२२॥
हे अर्जुन! मुझे इन तीनों लोकोंमें न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई भी प्राप्त करनेयोग्य वस्तु अप्राप्त है, तो भी मैं कर्ममें ही बरतता हूँ।
यदि ह्यहं(न्) न वर्तेयं(ञ्), जातु कर्मण्य-तन्द्रितः ।
मम वर्त्मानु-वर्तन्ते, मनुष्याः(फ्) पार्थ सर्वशः ॥७।३।२३॥
क्योंकि हे पार्थ! यदि कदाचित् मैं सावधान होकर कर्मोंमें न बरतूँ तो बड़ी हानि हो जाय; क्योंकि मनुष्य सब प्रकारसे मेरे ही मार्गका अनुसरण करते हैं।
उत्सीदेयु-रिमे लोका, न कुर्यां(ङ्) कर्म चेदहम् ।
सङ्करस्य च कर्ता स्याम्, उप-हन्या-मिमाः(फ्) प्रजाः ॥८।३।२४॥
इसलिये यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जायँ और मैं संकरताका करनेवाला होऊँ तथा इस समस्त प्रजाको नष्ट करनेवाला बनूँ।
सक्ताः(ख्) कर्मण्य-विद्वांसो, यथा कुर्वन्ति भारत ।
कुर्याद्-विद्वांस्-तथा-सक्तश्,-चिकीर्षुर्-लोक-सङ्ग्रहम् ॥९।३।२५॥
हे भारत! कर्ममें आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार कर्म करते हैं, आसक्तिरहित विद्वान् भी लोकसंग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार कर्म करे।
न बुद्धि-भेदं(ञ्) जनयेद्, अज्ञानां(ङ्) कर्म-सङ्गिनाम् ।
जोषयेत्-सर्व-कर्माणि, विद्वान् युक्तः(स्) समाचरन् ॥१०।३।२६॥
परमात्माके स्वरूपमें अटल स्थित हुए ज्ञानी पुरुषको चाहिये कि वह शास्त्रविहित कर्मोंमें आसक्तिवाले अज्ञानियोंकी बुद्धिमें भ्रम अर्थात् कर्मोंमें अश्रद्धा उत्पन्न न करे। किन्तु स्वयं शास्त्रविहित समस्त कर्म भलीभाँति करता हुआ उनसे भी वैसे ही करवावे।
प्रकृतेः(ख्) क्रियमाणानि, गुणैः(ख्) कर्माणि सर्वशः ।
अहङ्कार-विमूढात्मा, कर्ताह-मिति मन्यते ॥११।३।२७॥
वास्तवमें सम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये जाते हैं तो भी जिसका अन्तःकरण अहङ्कारसे मोहित हो रहा है, ऐसा अज्ञानी 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा मानता है।
तत्त्व-वित्तु महाबाहो, गुण-कर्म-विभागयोः ।
गुणा गुणेषु वर्तन्त, इति मत्वा न सज्जते ॥१२।३।२८॥
परन्तु हे महाबाहो! गुणविभाग और कर्मविभाग के तत्त्व को जाननेवाला ज्ञानयोगी सम्पूर्ण गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं, ऐसा समझकर उनमें आसक्त नहीं होता।
प्रकृतेर्-गुण-सम्मूढाः(स्), सज्जन्ते गुण-कर्मसु ।
तानकृत्स्न-विदो मन्दान्,-कृत्स्न-विन्-न विचालयेत् ॥१३।३।२९॥
प्रकृतिके गुणोंसे अत्यन्त मोहित हुए मनुष्य गुणोंमें और कर्मोंमें आसक्त रहते हैं, उन पूर्णतया न समझनेवाले मन्दबुद्धि अज्ञानियोंको पूर्णतया जाननेवाला ज्ञानी विचलित न करे।
सदृशं(ञ्) चेष्टते स्वस्याः(फ्), प्रकृतेर्-ज्ञानवानपि ।
प्रकृतिं(य्ँ) यान्ति भूतानि, निग्रहः(ख्) किं(ङ्) करिष्यति ॥१४।३।३३॥
सभी प्राणी प्रकृतिको प्राप्त होते हैं अर्थात् अपने स्वभावके परवश हुए कर्म करते हैं। ज्ञानवान् भी अपनी प्रकृतिके अनुसार चेष्टा करता है। फिर इसमें किसीका हठ क्या करेगा?
इन्द्रियस्ये-न्द्रियस्यार्थे, राग-द्वेषौ व्यवस्थितौ ।
तयोर्-न वश-मागच्छेत्, तौ ह्यस्य परि-पन्थिनौ ॥१५।३।३४॥
इन्द्रिय-इन्द्रियके अर्थमें अर्थात् प्रत्येक इन्द्रियके विषयमें राग और द्वेष छिपे हुए स्थित हैं। मनुष्यको उन दोनोंके वशमें नहीं होना चाहिये, क्योंकि वे दोनों ही इसके कल्याणमार्गमें विघ्न करनेवाले महान् शत्रु हैं।
श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः(फ्), पर-धर्मात् स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे निधनं(म्) श्रेयः(फ्), पर-धर्मो भयावहः ॥१६।३।३५॥
अच्छी प्रकार आचरणमें लाये हुए दूसरेके धर्मसे गुणरहित भी अपना धर्म अति उत्तम है। अपने धर्ममें तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरेका धर्म भयको देनेवाला है।
॥इति श्रीमद्भगवद्गीतायां सप्तमोऽध्यायः॥
॥ ओ३म् ॥
श्रीपरमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता
अथाष्टमोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
अथ केन प्रयुक्तोऽयं(म्), पापं(ञ्) चरति पूरुषः ।
अनिच्छन्-नपि वार्ष्णेय, बलादिव नियोजितः ॥१।३।३६॥
अर्जुन बोले― हे कृष्ण! तो फिर यह मनुष्य स्वयं न चाहता हुआ भी बलात् लगाये हुएकी भाँति किससे प्रेरित होकर पापका आचरण करता है?
श्रीभगवानुवाच
काम एष क्रोध एष, रजो-गुण-समुद्भवः ।
महाशनो महा-पाप्मा, विद्ध्येन-मिह वैरिणम् ॥२।३।३७॥
श्रीभगवान् बोले― रजोगुणसे उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है, यह बहुत खानेवाला अर्थात् भोगोंसे कभी न अघानेवाला और बड़ा पापी है, इसको ही तू इस विषयमें वैरी जान।
धूमे-नाव्रियते वह्निर्,-यथादर्शो मलेन च ।
यथोल्बे-नावृतो गर्भस्,-तथा तेनेद-मावृतम् ॥३।३।३८॥
जिस प्रकार धुएँसे अग्नि और मैलसे दर्पण ढका जाता है तथा जिस प्रकार जेरसे गर्भ ढका रहता है, वैसे ही उस कामके द्वारा यह ज्ञान ढका रहता है।
आवृतं(ञ्) ज्ञान-मेतेन, ज्ञानिनो नित्य-वैरिणा ।
काम-रूपेण कौन्तेय, दुष्पूरे-णानलेन च ॥४।३।३९॥
और हे अर्जुन! इस अग्निके समान कभी न पूर्ण होनेवाले कामरूप ज्ञानियोंके नित्य वैरीके द्वारा मनुष्यका ज्ञान ढका हुआ है।
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिर्,-अस्याधिष्ठान-मुच्यते ।
एतैर्-विमोह-यत्येष, ज्ञान-मावृत्य देहिनम् ॥५।३।४०॥
इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि― ये सब इसके वासस्थान कहे जाते हैं। यह काम इन मन, बुद्धि और इन्द्रियोंके द्वारा ही ज्ञानको आच्छादित करके जीवात्माको मोहित करता है।
तस्मात्-त्वमिन्द्रिया-ण्यादौ, नियम्य भरतर्षभ ।
पाप्मानं(म्) प्रजहि ह्येनं(ञ्), ज्ञान-विज्ञान-नाशनम् ॥६।३।४१॥
इसलिये हे अर्जुन ! तू पहले इन्द्रियोंको वशमें करके इस ज्ञान और विज्ञानका नाश करनेवाले महान् पापी कामको अवश्य ही बलपूर्वक मार डाल।
इन्द्रियाणि पराण्याहुर्, इन्द्रियेभ्यः(फ्) परं(म्) मनः ।
मनसस्-तु परा बुद्धिर्,-यो बुद्धेः(फ्) परतस्-तु सः ॥७।३।४२॥
इन्द्रियोंको स्थूल शरीरसे पर यानी श्रेष्ठ, बलवान् और सूक्ष्म कहते हैं; इन इन्द्रियोंसे पर मन है, मनसे भी पर बुद्धि है और जो बुद्धिसे भी अत्यन्त पर है वह आत्मा है।
एवं(म्) बुद्धेः(फ्) परं(म्) बुद्ध्वा, संस्तभ्यात्मान-मात्मना ।
जहि शत्रुं(म्) महाबाहो, काम-रूपं(न्) दुरासदम् ॥८।३।४३॥
इस प्रकार बुद्धिसे पर अर्थात् सूक्ष्म, बलवान् और अत्यन्त श्रेष्ठ आत्माको जानकर और बुद्धिके द्वारा मनको वशमें करके हे महाबाहो! तू इस कामरूप दुर्जय शत्रुको मार डाल।
॥इति श्रीमद्भगवद्गीतायां अष्टमोऽध्यायः॥
॥ ओ३म् ॥
श्रीपरमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता
अथ नवमोऽध्यायः
किं(ङ्) कर्म किम-कर्मेति, कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि, यज्-ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥१।४।१६॥
कर्म क्या है? और अकर्म क्या है?― इस प्रकार इसका निर्णय करनेमें बुद्धिमान् पुरुष भी मोहित हो जाते हैं। इसलिये वह कर्मतत्त्व मैं तुझे भलीभाँति समझाकर कहूँगा, जिसे जानकर तू अशुभसे अर्थात् कर्मबन्धनसे मुक्त हो जायगा।
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं(म्), बोद्धव्यं(ञ्) च विकर्मणः ।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं(ङ्), गहना कर्मणो गतिः ॥२।४।१७॥
कर्मका स्वरूप भी जानना चाहिये और अकर्मका स्वरूप भी जानना चाहिये तथा विकर्मका स्वरूप भी जानना चाहिये; क्योंकि कर्मकी गति गहन है।
कर्मण्यकर्म यः(फ्) पश्येद्, अकर्मणि च कर्म यः ।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु, स युक्तः(ख्) कृत्स्न-कर्म-कृत् ॥३।४।१८॥
जो मनुष्य कर्ममें अकर्म देखता है और जो अकर्ममें कर्म देखता है, वह मनुष्योंमें बुद्धिमान् है और वह योगी समस्त कर्मोंको करनेवाला है।
यस्य सर्वे समारम्भाः(ख्), काम-सङ्कल्प-वर्जिताः ।
ज्ञानाग्नि-दग्ध-कर्माणं(न्), तमाहुः(फ्) पण्डितं(म्) बुधाः ॥४।४।१९॥
जिसके सम्पूर्ण शास्त्रसम्मत कर्म बिना कामना और संकल्पके होते हैं तथा जिसके समस्त कर्म ज्ञानरूप अग्निके द्वारा भस्म हो गये हैं, उस महापुरुषको ज्ञानीजन भी पण्डित कहते हैं।
त्यक्त्वा कर्म-फलासङ्गं(न्), नित्य-तृप्तो निराश्रयः ।
कर्मण्यभि-प्रवृत्तोऽपि, नैव किञ्चित्-करोति सः ॥५।४।२०॥
जो पुरुष समस्त कर्मोंमें और उनके फलमें आसक्तिका सर्वथा त्याग करके संसारके आश्रयसे रहित हो गया है और परमात्मामें नित्य तृप्त है, वह कर्मोंमें भलीभाँति बर्तता हुआ भी वास्तवमें कुछ भी नहीं करता।
निराशीर्-यत-चित्तात्मा, त्यक्त-सर्व-परिग्रहः ।
शारीरं(ङ्) केवलं(ङ्) कर्म, कुर्वन्-नाप्नोति किल्बिषम् ॥६।४।२१॥
जिसका अन्तःकरण और इन्द्रियोंके सहित शरीर जीता हुआ है और जिसने समस्त भोगोंकी सामग्रीका परित्याग कर दिया है, ऐसा आशारहित पुरुष केवल शरीर-सम्बन्धी कर्म करता हुआ भी पापोंको नहीं प्राप्त होता।
यदृच्छा-लाभ-सन्तुष्टो, द्वन्द्वातीतो विमत्सरः ।
समः(स्) सिद्धा-वसिद्धौ च, कृत्वापि न निबध्यते ॥७।४।२२॥
जो बिना इच्छाके अपने-आप प्राप्त हुए पदार्थमें सदा सन्तुष्ट रहता है, जिसमें ईर्ष्याका सर्वथा अभाव हो गया हो, जो हर्ष-शोक आदि द्वन्द्वोंसे सर्वथा अतीत हो गया है― ऐसा सिद्धि और असिद्धिमें सम रहनेवाला कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी उनसे नहीं बँधता।
गत-सङ्गस्य मुक्तस्य, ज्ञाना-वस्थित-चेतसः ।
यज्ञा-याचरतः(ख्) कर्म, समग्रं(म्) प्रविलीयते ॥८।४।२३॥
जिसकी आसक्ति सर्वथा नष्ट हो गयी है, जो देहाभिमान और ममतासे रहित हो गया है, जिसका चित्त निरन्तर परमात्माके ज्ञानमें स्थित रहता है― ऐसा केवल यज्ञसम्पादनके लिये कर्म करनेवाले मनुष्यके सम्पूर्ण कर्म भलीभाँति विलीन हो जाते हैं।
॥इति श्रीमद्भगवद्गीतायां नवमोऽध्यायः॥
॥ ओ३म् ॥
श्रीपरमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता
अथ दशमोऽध्यायः
दैव-मेवापरे यज्ञं(य्ँ), योगिनः(फ्) पर्युपासते ।
ब्रह्माग्ना-वपरे यज्ञं(य्ँ), यज्ञेनैवोप-जुह्वति ॥१।४।२५॥
दूसरे योगीजन देव यज्ञका ही भलीभाँति अनुष्ठान किया करते हैं और अन्य योगीजन परब्रह्म परमात्मारूप अग्निमें अभेददर्शनरूप यज्ञके द्वारा ही आत्मरूप यज्ञका हवन किया करते हैं।
श्रोत्रादी-नीन्द्रिया-ण्यन्ये, संयमाग्निषु जुह्वति ।
शब्दादीन्-विषया-नन्य, इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ॥२।४।२६॥
अन्य योगीजन श्रोत्र आदि समस्त इन्द्रियोंको संयमरूप अग्नियोंमें हवन किया करते हैं और दूसरे योगीलोग शब्दादि समस्त विषयोंको इन्द्रियरूप अग्नियोंमें हवन किया करते हैं।
सर्वाणीन्द्रिय-कर्माणि, प्राण-कर्माणि चापरे ।
आत्म-संयम-योगाग्नौ, जुह्वति ज्ञान-दीपिते ॥३।४।२७॥
दूसरे योगीजन इन्द्रियोंकी सम्पूर्ण क्रियाओंको और प्राणोंकी समस्त क्रियाओंको ज्ञानसे प्रकाशित आत्म-संयमयोगरूप अग्निमें हवन किया करते हैं।
द्रव्य-यज्ञास्-तपो-यज्ञा, योग-यज्ञास्-तथापरे ।
स्वाध्याय-ज्ञान-यज्ञाश्-च, यतयः(स्) संशित-व्रताः ॥४।४।२८॥
कई पुरुष द्रव्यसम्बन्धी यज्ञ करनेवाले हैं, कितने ही तपस्यारूप यज्ञ करनेवाले हैं तथा दूसरे कितने ही योगरूप यज्ञ करनेवाले हैं और कितने ही अहिंसादि तीक्ष्ण व्रतोंसे युक्त यत्नशील पुरुष स्वाध्यायरूप ज्ञानयज्ञ करनेवाले हैं।
अपाने जुह्वति प्राणं(म्), प्राणेऽपानं(न्) तथापरे ।
प्राणापान-गती रुद्ध्वा, प्राणायाम-परायणाः ॥
अपरे नियताहाराः(फ्), प्राणान् प्राणेषु जुह्वति ।
सर्वेऽप्येते यज्ञ-विदो, यज्ञ-क्षपित-कल्मषाः ॥५-६।४।२९-३०॥
दूसरे कितने ही योगीजन अपानवायुमें प्राण-वायुको हवन करते हैं, वैसे ही अन्य योगीजन प्राणवायुमें अपानवायुको हवन करते हैं तथा अन्य कितने ही नियमित आहार करनेवाले प्राणायाम-परायण पुरुष प्राण और अपानकी गतिको रोककर प्राणोंको प्राणोंमें ही हवन किया करते हैं। ये सभी साधक यज्ञोंद्वारा पापोंका नाश कर देनेवाले और यज्ञोंको जाननेवाले हैं।
यज्ञ-शिष्टामृत-भुजो, यान्ति ब्रह्म सनातनम् ।
नायं(ल्ँ) लोकोऽस्त्य-यज्ञस्य, कुतोऽन्यः(ख्) कुरु-सत्तम ॥७।४।३१॥
हे कुरुश्रेष्ठ अर्जुन! यज्ञसे बचे हुए अमृतका अनुभव करनेवाले योगीजन सनातन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होते हैं और यज्ञ न करनेवाले पुरुषके लिये तो यह मनुष्यलोक भी सुखदायक नहीं है, फिर परलोक कैसे सुखदायक हो सकता है?
एवं(म्) बहुविधा यज्ञा, वितता ब्रह्मणो मुखे ।
कर्मजान् विद्धि तान् सर्वान्, एवं(ञ्) ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥८।४।३२॥
इसी प्रकार और भी बहुत तरहके यज्ञ वेदकी वाणीमें विस्तारसे कहे गये हैं। उन सबको तू मन, इन्द्रिय और शरीरकी क्रियाद्वारा सम्पन्न होनेवाले जान, इस प्रकार तत्त्वसे जानकर उनके अनुष्ठानद्वारा तू कर्मबन्धनसे सर्वथा मुक्त हो जायगा।
श्रेयान्-द्रव्य-मयाद्-यज्ञाज्,-ज्ञान-यज्ञः(फ्) परन्-तप ।
सर्वं(ङ्) कर्माखिलं(म्) पार्थ, ज्ञाने परि-समाप्यते ॥९।४।३३॥
हे परंतप अर्जुन! द्रव्यमय यज्ञकी अपेक्षा ज्ञानयज्ञ अत्यन्त श्रेष्ठ है, तथा यावन्मात्र सम्पूर्ण कर्म ज्ञानमें समाप्त हो जाते हैं।
न हि ज्ञानेन सदृशं(म्), पवित्र-मिह विद्यते ।
तत्-स्वयं(य्ँ) योग-संसिद्धः(ख्), काले-नात्मनि विन्दति ॥१०।४।३८॥
इस संसारमें ज्ञानके समान पवित्र करनेवाला निःसंदेह कुछ भी नहीं है। उस ज्ञानको कितने ही कालसे कर्मयोगके द्वारा शुद्धान्तःकरण हुआ मनुष्य अपने-आप ही आत्मामें पा लेता है।
श्रद्धावाँल्-लभते ज्ञानं(न्), तत्परः(स्) संयतेन्द्रियः ।
ज्ञानं(ल्ँ) लब्ध्वा परां(म्) शान्तिम्, अचिरेणाधि-गच्छति ॥११।४।३९॥
जितेन्द्रिय, साधनपरायण और श्रद्धावान् मनुष्य ज्ञानको प्राप्त होता है तथा ज्ञानको प्राप्त होकर वह बिना विलम्बके― तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप परम शान्तिको प्राप्त हो जाता है।
अज्ञश्चा-श्रद्-दधानश्च, संशयात्मा विनश्यति ।
नायं(ल्ँ) लोकोऽस्ति न परो, न सुखं(म्) संशयात्मनः ॥१२।४।४०॥
विवेकहीन और श्रद्धारहित संशययुक्त मनुष्य परमार्थसे अवश्य भ्रष्ट हो जाता है। ऐसे संशययुक्त मनुष्यके लिये न यह लोक है, न परलोक है और न सुख ही है।
योग-सन्न्यस्त-कर्माणं(ञ्), ज्ञान-सञ्छिन्न-संशयम् ।
आत्मवन्तं(न्) न कर्माणि, निबध्नन्ति धनञ्जय ॥१३।४।४१॥
हे धनञ्जय! जिसने कर्मयोगकी विधिसे समस्त कर्मोंका परमात्मामें अर्पण कर दिया है और जिसने विवेकद्वारा समस्त संशयोंका नाश कर दिया है, ऐसे वशमें किये हुए अन्तःकरणवाले पुरुषको कर्म नहीं बाँधते।
तस्मा-दज्ञान-सम्भूतं(म्), हृत्स्थं(ञ्) ज्ञानासि-नात्मनः ।
छित्त्वैनं(म्) संशयं(य्ँ) योगम्, आतिष्ठो-त्तिष्ठ भारत ॥१४।४।४२॥
इसलिये हे भरतवंशी अर्जुन! तू हृदयमें स्थित इस अज्ञानजनित अपने संशयका विवेकज्ञानरूप तलवारद्वारा छेदन करके समत्वरूप कर्मयोगमें स्थित हो जा और युद्धके लिये खड़ा हो जा।
॥इति श्रीमद्भगवद्गीतायां दशमोऽध्यायः॥
॥ ओ३म् ॥
श्रीपरमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता
अथैकादशोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
सन्न्यासं(ङ्) कर्मणां(ङ्) कृष्ण, पुनर्-योगं(ञ्) च शंससि ।
यच्छ्रेय एतयो-रेकं(न्), तन्-मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥१।५।१॥
अर्जुन बोले― हे कृष्ण! आप कर्मोंके संन्यासकी और फिर कर्मयोगकी प्रशंसा करते हैं। इसलिये इन दोनोंमेंसे जो एक मेरे लिये भलीभाँति निश्चित कल्याणकारक साधन हो, उसको कहिये।
श्रीभगवानुवाच
सन्न्यासः(ख्) कर्म-योगश्च, निःश्रेयस-करावुभौ ।
तयोस्तु कर्म-सन्न्यासात्, कर्मयोगो विशिष्यते ॥२।५।२॥
श्रीभगवान् बोले― कर्मसंन्यास और कर्मयोग― ये दोनों ही परम कल्याणके करनेवाले हैं, परन्तु उन दोनोंमें भी कर्मसंन्याससे कर्मयोग साधनमें सुगम होनेसे श्रेष्ठ है।
ज्ञेयः(स्) स नित्य-सन्न्यासी, यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति ।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो, सुखं(म्) बन्धात् प्रमुच्यते ॥३।५।३॥
हे अर्जुन! जो पुरुष न किसीसे द्वेष करता है और न किसीकी आकांक्षा करता है, वह कर्मयोगी सदा संन्यासी ही समझने योग्य है; क्योंकि राग-द्वेषादि द्वन्द्वोंसे रहित पुरुष सुखपूर्वक संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है।
साङ्ख्य-योगौ पृथग्-बालाः(फ्), प्रवदन्ति न पण्डिताः ।
एक-मप्या-स्थितः(स्) सम्यग्, उभयोर्-विन्दते फलम् ॥४।५।४॥
उपर्युक्त संन्यास और कर्मयोगको मूर्खलोग पृथक्-पृथक् फल देनेवाले कहते हैं न कि पण्डितजन; क्योंकि दोनोंमेंसे एकमें भी सम्यक् प्रकारसे स्थित पुरुष दोनोंके फलरूप परमात्माको प्राप्त होता है।
यत्-साङ्ख्यैः(फ्) प्राप्यते स्थानं(न्), तद्योगै-रपि गम्यते ।
एकं(म्) साङ्ख्यं(ञ्) च योगं(ञ्) च, यः(फ्) पश्यति स पश्यति ॥५।५।५॥
ज्ञानयोगियोंद्वारा जो परमधाम प्राप्त किया जाता है; कर्मयोगियोंद्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। इसलिये जो पुरुष ज्ञानयोग और कर्मयोगको फल-रूपमें एक देखता है, वही यथार्थ देखता है।
सन्न्यासस्तु महाबाहो, दुःख-माप्तु-मयोगतः ।
योग-युक्तो मुनिर्-ब्रह्म, नचिरेणाधि-गच्छति ॥६।५।६॥
परन्तु हे अर्जुन! कर्मयोगके बिना संन्यास अर्थात् मन, इन्द्रिय और शरीरद्वारा होनेवाले सम्पूर्ण कर्मोंमें कर्तापनका त्याग प्राप्त होना कठिन है और भगवत्स्वरूपको मनन करनेवाला कर्मयोगी परब्रह्म परमात्माको शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है।
योग-युक्तो विशुद्धात्मा, विजितात्मा जितेन्द्रियः ।
सर्व-भूतात्म-भूतात्मा, कुर्वन्-नपि न लिप्यते ॥७।५।७॥
जिसका मन अपने वशमें है, जो जितेन्द्रिय एवं विशुद्ध अन्तःकरणवाला है और सम्पूर्ण प्राणियोंकी आत्मा ही जिसकी आत्मा है, ऐसा कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता।
नैव किञ्चित् करोमीति, युक्तो मन्येत तत्त्व-वित् ।
पश्यञ्-शृण्वन्-स्पृशञ्-जिघ्रन्,-नश्नन्-गच्छन्-स्वपञ्-श्वसन् ॥
प्रलपन्-विसृजन्-गृह्णन्,-नुन्मिषन्-निमिषन्-नपि ।
इन्द्रिया-णीन्द्रियार्थेषु, वर्तन्त इति धारयन् ॥८-९।५।८-९॥
तत्वको जाननेवाला सांख्ययोगी तो देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूँघता हुआ, भोजन करता हुआ, गमन करता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ, बोलता हुआ, त्यागता हुआ, ग्रहण करता हुआ तथा आँखोंको खोलता और मूँदता हुआ भी सब इन्द्रियाँ अपने-अपने अर्थोंमें बरत रही हैं― इस प्रकार समझकर निःसन्देह ऐसा माने कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ।
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि, सङ्गं(न्) त्यक्त्वा करोति यः ।
लिप्यते न स पापेन, पद्म-पत्र-मिवाम्भसा ॥१०।५।१०॥
जो पुरुष सब कर्मोंको परमात्मामें अर्पण करके और आसक्तिको त्यागकर कर्म करता है, वह पुरुष जलसे कमलके पत्तेकी भाँति पापसे लिप्त नहीं होता।
कायेन मनसा बुद्ध्या, केवलै-रिन्द्रियै-रपि ।
योगिनः(ख्) कर्म कुर्वन्ति, सङ्गं(न्) त्यक्त्वात्म-शुद्धये ॥११।५।११॥
कर्मयोगी ममत्वबुद्धिरहित केवल इन्द्रिय, मन, बुद्धि और शरीरद्वारा भी आसक्तिको त्यागकर अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये कर्म करते हैं।
युक्तः(ख्) कर्म-फलं(न्) त्यक्त्वा,शान्ति-माप्नोति नैष्ठिकीम्।
अयुक्तः(ख्) काम-कारेण, फले सक्तो निबध्यते ॥१२।५।१२॥
कर्मयोगी कर्मोंके फलका त्याग करके भगवत्प्राप्तिरूप शान्तिको प्राप्त होता है और सकामपुरुष कामनाकी प्रेरणासे फलमें आसक्त होकर बँधता है।
अनाश्रितः(ख्) कर्मफलं(ङ्), कार्यं(ङ्) कर्म करोति यः ।
स सन्न्यासी च योगी च, न निरग्निर्-न चाक्रियः ॥१३।६।१॥
जो पुरुष कर्मफलका आश्रय न लेकर करनेयोग्य कर्म करता है, वह संन्यासी तथा योगी है और केवल अग्निका त्याग करनेवाला संन्यासी नहीं है तथा केवल क्रियाओंका त्याग करनेवाला योगी नहीं है।
यं(म्) सन्न्या-समिति प्राहुर्,-योगं(न्) तं(व्ँ) विद्धि पाण्डव ।
न ह्य-सन्न्यस्त-सङ्कल्पो, योगी भवति कश्चन ॥१४।६।२॥
हे अर्जुन! जिसको संन्यास ऐसा कहते हैं, उसीको तू योग जान; क्योंकि संकल्पोंका त्याग न करनेवाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता।
आरुरुक्षोर्-मुनेर्-योगं(ङ्), कर्म कारण-मुच्यते ।
योगारूढस्य तस्यैव, शमः(ख्) कारण-मुच्यते ॥१५।६।३॥
योगमें आरूढ़ होनेकी इच्छावाले मननशील पुरुषके लिये योगकी प्राप्तिमें निष्कामभावसे कर्म करना ही हेतु कहा जाता है और योगारूढ़ हो जानेपर उस योगारूढ़ पुरुषका जो सर्वसंकल्पोंका अभाव है, वही कल्याणमें हेतु कहा जाता है।
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु, न कर्मस्वनु-षज्जते ।
सर्व-सङ्कल्प-सन्न्यासी, योगारूढस्-तदोच्यते ॥१६।६।४॥
जिस कालमें न तो इन्द्रियोंके भोगोंमें और न कर्मोंमें ही आसक्त होता है, उस कालमें सर्वसंकल्पोंका त्यागी पुरुष योगारूढ़ कहा जाता है।
॥इति श्रीमद्भगवद्गीतायां एकादशोऽध्यायः॥
॥ ओ३म् ॥
श्रीपरमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता
अथ द्वादशोऽध्यायः
उद्धरे-दात्म-नात्मानं(न्), नात्मान-मवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुर्, आत्मैव रिपु-रात्मनः ॥१।६।५॥
अपने द्वारा अपना संसार-समुद्रसे उद्धार करे और अपनेको अधोगतिमें न डाले; क्योंकि यह मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है।
बन्धु-रात्मात्मनस्-तस्य, येनात्मै-वात्मना जितः ।
अनात्मनस्-तु शत्रुत्वे, वर्ते-तात्मैव शत्रुवत् ॥२।६।६॥
जिस जीवात्माद्वारा मन और इन्द्रियोंसहित शरीर जीता हुआ है, उस जीवात्माका तो वह आप ही मित्र है और जिसके द्वारा मन तथा इन्द्रियों-सहित शरीर नहीं जीता गया है, उसके लिये वह आप ही शत्रुके सदृश शत्रुतामें बर्तता है।
जितात्मनः(फ्) प्रशान्तस्य, परमात्मा समाहितः ।
शीतोष्ण-सुखदुःखेषु, तथा मानाप-मानयोः ॥३।६।७॥
सरदी-गरमी और सुख-दुःखादिमें तथा मान और अपमानमें जिसके अन्तःकरणकी वृत्तियाँ भलीभाँति शान्त हैं, ऐसे स्वाधीन आत्मावाले पुरुषके ज्ञानमें सच्चिदानन्दघन परमात्मा सम्यक् प्रकारसे स्थित है अर्थात् उसके ज्ञानमें परमात्माके सिवा अन्य कुछ है ही नहीं।
ज्ञान-विज्ञान-तृप्तात्मा, कूटस्थो विजितेन्द्रियः ।
युक्त इत्युच्यते योगी, सम-लोष्टाश्म-काञ्चनः ॥४।६।८॥
जिसका अन्तःकरण ज्ञान-विज्ञानसे तृप्त है, जिसकी स्थिति विकाररहित है, जिसकी इन्द्रियाँ भलीभाँति जीती हुई हैं और जिसके लिये मिट्टी, पत्थर और सुवर्ण समान हैं, वह योगी युक्त अर्थात् भगवत्प्राप्त है, ऐसे कहा जाता है।
सुहृन्-मित्रार्-युदासीन,-मध्यस्थ-द्वेष्य-बन्धुषु ।
साधुष्वपि च पापेषु, सम-बुद्धिर्-विशिष्यते ॥५।६।९॥
सुहृद्, मित्र, वैरी, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष्य और बन्धुगणोंमें, धर्मात्माओंमें और पापियोंमें भी समानभाव रखनेवाला अत्यन्त श्रेष्ठ है।
योगी युञ्जीत सततम्, आत्मानं(म्) रहसि स्थितः ।
एकाकी यत-चित्तात्मा, निराशी-रपरिग्रहः ॥६।६।१०॥
मन और इन्द्रियोंसहित शरीरको वशमें रखने-वाला, आशारहित और संग्रहरहित योगी अकेला ही एकान्त स्थानमें स्थित होकर आत्माको निरन्तर परमात्मामें लगावे।
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य, स्थिर-मासन-मात्मनः ।
नात्युच्छ्रितं(न्) नातिनीचं(ञ्), चैलाजिन-कुशोत्तरम् ॥७।६।११॥
शुद्ध भूमिमें, जिसके ऊपर क्रमशः कुशा, मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं, जो न बहुत ऊँचा है और न बहुत नीचा, ऐसे अपने आसनको स्थिर स्थापन करके―
तत्रैकाग्रं(म्) मनः(ख्) कृत्वा, यत-चित्तेन्द्रिय-क्रियः ।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्,-योग-मात्म-विशुद्धये ॥८।६।१२॥
उस आसनपर बैठकर चित्त और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको वशमें रखते हुए मनको एकाग्र करके अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये योगका अभ्यास करे।
समं(ङ्) काय-शिरो-ग्रीवं(न्), धारयन्-नचलं(म्) स्थिरः ।
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं(म्) स्वं(न्), दिशश्-चा-नवलोकयन् ॥९।६।१३॥
काया, सिर और गलेको समान एवं अचल धारण करके और स्थिर होकर, अपनी नासिकाके अग्रभागपर दृष्टि जमाकर, अन्य दिशाओंको न देखता हुआ―
सङ्कल्प-प्रभवान्-कामांस्,-त्यक्त्वा सर्वा-नशेषतः ।
मनसै-वेन्द्रिय-ग्रामं(व्ँ), विनियम्य समन्ततः ॥१०।६।२४॥
संकल्पसे उत्पन्न होनेवाली सम्पूर्ण कामनाओंको निःशेषरूपसे त्यागकर और मनके द्वारा इन्द्रियोंके समुदायको सभी ओरसे भलीभाँति रोककर―
शनैः(श्) शनै-रुपरमेद,-बुद्ध्या धृति-गृहीतया ।
आत्म-संस्थं(म्) मनः(ख्) कृत्वा, न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥११।६।२५॥
क्रम-क्रमसे अभ्यास करता हुआ उपरतिको प्राप्त हो तथा धैर्ययुक्त बुद्धिके द्वारा मनको परमात्मामें स्थित करके परमात्माके सिवा और कुछ भी चिन्तन न करे।
यतो यतो निश्चरति, मनश्-चञ्चल-मस्थिरम् ।
ततस्-ततो नियम्यैतद्, आत्मन्येव वशं(न्) नयेत् ॥१२।६।२६॥
यह स्थिर न रहनेवाला और चञ्चल मन जिस-जिस शब्दादि विषयके निमित्तसे संसारमें विचरता है, उस-उस विषयसे रोककर यानी हटाकर इसे बार-बार परमात्मामें ही निरुद्ध करे।
युञ्जन्-नेवं(म्) सदात्मानं(य्ँ), योगी विगत-कल्मषः ।
सुखेन ब्रह्म-संस्पर्शम्, अत्यन्तं(म्) सुख-मश्नुते ॥१३।६।२८॥
वह पापरहित योगी इस प्रकार निरन्तर आत्माको परमात्मामें लगाता हुआ सुखपूर्वक परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिरूप अनन्त आनन्दका अनुभव करता है।
सर्व-भूतस्थ-मात्मानं(म्), सर्व-भूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योग-युक्तात्मा, सर्वत्र सम-दर्शनः ॥१४।६।२९॥
सर्वव्यापी अनन्त चेतनमें एकीभावसे स्थितिरूप योगसे युक्त आत्मावाला तथा सबमें समभावसे देखनेवाला योगी आत्माको सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित और सम्पूर्ण भूतोंको आत्मामें देखता है।
आत्मौपम्येन सर्वत्र, समं(म्) पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं(व्ँ) वा यदि वा दुःखं(म्), स योगी परमो मतः ॥१५।६।३२॥
हे अर्जुन! जो योगी अपनी भाँति सम्पूर्ण भूतोंमें सम देखता है और सुख अथवा दुःखको भी सबमें सम देखता है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है।
अर्जुन उवाच
योऽयं(य्ँ) योगस्-त्वया प्रोक्तः(स्), साम्येन मधुसूदन ।
एतस्याहं(न्) न पश्यामि, चञ्चलत्वात् स्थितिं(म्) स्थिराम् ॥१६।६।३३॥
अर्जुन बोले― हे मधुसूदन! जो यह योग आपने समभावसे कहा है, मनके चञ्चल होनेसे मैं इसकी नित्य स्थितिको नहीं देखता हूँ।
चञ्चलं(म्) हि मनः(ख्) कृष्ण, प्रमाथि बलवद्-दृढम् ।
तस्याहं(न्) निग्रहं(म्) मन्ये, वायोरिव सुदुष्करम् ॥१७।६।३४॥
क्योंकि हे श्रीकृष्ण! यह मन बड़ा चञ्चल, प्रमथन स्वभाववाला, बड़ा दृढ़ और बलवान् है। इसलिये उसको वशमें करना मैं वायुको रोकनेकी भाँति अत्यन्त दुष्कर मानता हूँ।
श्रीभगवानुवाच
असंशयं(म्) महाबाहो, मनो दुर्-निग्रहं(ञ्) चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय, वैराग्येण च गृह्यते ॥१८।६।३५॥
श्रीभगवान् बोले― हे महाबाहो! निःसन्देह मन चञ्चल और कठिनतासे वशमें होने वाला है; परन्तु हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! यह अभ्यास और वैराग्यसे वशमें होता है।
असंयतात्मना योगो, दुष्प्राप इति मे मतिः ।
वश्यात्मना तु यतता, शक्योऽवाप्तु-मुपायतः ॥१९।६।३६॥
जिसका मन वशमें किया हुआ नहीं है, ऐसे पुरुषद्वारा योग दुष्प्राप्य है और वशमें किये हुए मनवाले प्रयत्नशील पुरुषद्वारा साधनसे उसका प्राप्त होना सहज है― यह मेरा मत है।
अर्जुन उवाच
अयतिः(श्) श्रद्धयोपेतो, योगाच्-चलित-मानसः ।
अप्राप्य योग-संसिद्धिं(ङ्), कां(ङ्) गतिं(ङ्) कृष्ण गच्छति ॥२०।६।३७॥
अर्जुन बोले― हे श्रीकृष्ण! जो योगमें श्रद्धा रखनेवाला है; किन्तु संयमी नहीं है, इस कारण जिसका मन अन्तकालमें योगसे विचलित हो गया है, ऐसा साधक योगकी सिद्धिको अर्थात् भगवत्साक्षात्कारको न प्राप्त होकर किस गतिको प्राप्त होता है।
कच्चिन्-नोभय-विभ्रष्टश्,-छिन्नाभ्र-मिव नश्यति ।
अप्रतिष्ठो महाबाहो, विमूढो ब्रह्मणः(फ्) पथि ॥२१।६।३८॥
हे महाबाहो! क्या वह भगवत्प्राप्तिके मार्गमें मोहित और आश्रयरहित पुरुष छिन्न-भिन्न बादलकी भाँति दोनों ओरसे भ्रष्ट होकर नष्ट तो नहीं हो जाता?
एतन्-मे संशयं(ङ्) कृष्ण, छेत्तु-मर्हस्य-शेषतः ।
त्वदन्यः(स्) संशयस्यास्य, छेत्ता न ह्युप-पद्यते ॥२२।६।३९॥
हे श्रीकृष्ण! मेरे इस संशयको सम्पूर्णरूपसे छेदन करनेके लिये आप ही योग्य हैं, क्योंकि आपके सिवा दूसरा इस संशयका छेदन करनेवाला मिलना सम्भव नहीं है।
श्रीभगवानुवाच
पार्थ नैवेह नामुत्र, विनाशस्-तस्य विद्यते ।
न हि कल्याण-कृत्-कश्चिद्,-दुर्-गतिं(न्) तात गच्छति ॥२३।६।४०॥
श्रीभगवान् बोले― हे पार्थ! उस पुरुषका न तो इस लोकमें नाश होता है और न परलोकमें ही। क्योंकि हे प्यारे! आत्मोद्धारके लिये अर्थात् भगवत्प्राप्तिके लिये कर्म करनेवाला कोई भी मनुष्य दुर्गतिको प्राप्त नहीं होता।
प्राप्य पुण्य-कृतां(ल्ँ) लोकान्, उषित्वा शाश्वतीः(स्) समाः ।
शुचीनां(म्) श्रीमतां(ङ्) गेहे, योग-भ्रष्टोऽभिजायते ॥२४।६।४१॥
योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यवानोंके लोकोंको प्राप्त होकर, उनमें बहुत वर्षोंतक निवास करके फिर शुद्ध आचरणवाले श्रीमान् पुरुषोंके घरमें जन्म लेता है।
अथवा योगिना-मेव, कुले भवति धीमताम् ।
एतद्धि दुर्लभ-तरं(ल्ँ), लोके जन्म यदी-दृशम् ॥२५।६।४२॥
अथवा वैराग्यवान् पुरुष उन लोकोंमें न जाकर ज्ञानवान् योगियोंके ही कुलमें जन्म लेता है, परन्तु इस प्रकारका जो यह जन्म है, सो संसारमें निःसन्देह अत्यन्त दुर्लभ है।
तत्र तं(म्) बुद्धि-संयोगं(ल्ँ), लभते पौर्व-देहिकम् ।
यतते च ततो भूयः(स्), संसिद्धौ कुरु-नन्दन ॥२६।६।४३॥
वहाँ उस पहले शरीरमें संग्रह किये हुए बुद्धि-संयोगको अर्थात् समबुद्धिरूप योगके संस्कारोंको अनायास ही प्राप्त हो जाता है और हे कुरुनन्दन! उसके प्रभावसे वह फिर परमात्माकी प्राप्तिरूप सिद्धिके लिये पहलेसे भी बढ़कर प्रयत्न करता है।
पूर्वाभ्यासेन तेनैव, ह्रियते ह्यवशोऽपि सः ।
जिज्ञासु-रपि योगस्य, शब्द-ब्रह्माति-वर्तते ॥२७।६।४४॥
वह श्रीमानोंके घरमें जन्म लेनेवाला योगभ्रष्ट पराधीन हुआ भी उस पहलेके अभ्याससे ही निःसन्देह भगवान् की ओर आकर्षित किया जाता है, तथा समबुद्धिरूप योगका जिज्ञासु भी प्रकृतिके बन्धनोंको उल्लङ्घन कर जाता है।
प्रयत्नाद्-यतमानस्-तु, योगी संशुद्ध-किल्बिषः ।
अनेक-जन्म-संसिद्धस्,-ततो याति परां(ङ्) गतिम् ॥२८।६।४५॥
परन्तु प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करनेवाला योगी तो पिछले अनेक जन्मोंके संस्कारबलसे इसी जन्ममें संसिद्ध होकर सम्पूर्ण पापोंसे रहित हो फिर तत्काल ही परमगतिको प्राप्त हो जाता है।
तपस्विभ्योऽधिको योगी, ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः ।
कर्मिभ्यश्-चाधिको योगी, तस्माद्-योगी भवार्जुन ॥२९।६।४६॥
योगी तपस्वियोंसे श्रेष्ठ है, शास्त्रज्ञानियोंसे भी श्रेष्ठ माना गया है और सकाम कर्म करने-वालोंसे भी योगी श्रेष्ठ है; इससे हे अर्जुन! तू योगी हो।
॥इति श्रीमद्भगवद्गीतायां द्वादशोऽध्यायः॥
॥ ओ३म् ॥
श्रीपरमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता
अथ त्रयोदशोऽध्यायः
अभ्यास-योग-युक्तेन, चेतसा नान्य-गामिना ।
परमं(म्) पुरुषं(न्) दिव्यं(य्ँ), याति पार्थानु-चिन्तयन् ॥१।८।८॥
हे पार्थ! यह नियम है कि परमेश्वरके ध्यानके अभ्यासरूप योगसे युक्त, दूसरी ओर न जानेवाले चित्तसे निरन्तर चिन्तन करता हुआ मनुष्य परम दिव्य पुरुषको अर्थात् परमेश्वरको ही प्राप्त होता है।
कविं(म्) पुराण-मनु-शासितारम्-
अणो-रणीयां-समनु-स्मरेद्यः ।
सर्वस्य धातार-मचिन्त्य-रूपम्-
आदित्य-वर्णं(न्) तमसः(फ्) परस्तात् ॥२।८।९॥
जो पुरुष सर्वज्ञ, अनादि, सबके नियन्ता, सूक्ष्मसे भी अति सूक्ष्म, सबके धारण-पोषण करनेवाले अचिन्त्यस्वरूप, सूर्यके सदृश नित्य चेतन प्रकाशरूप और अविद्यासे अति परे, शुद्ध सच्चिदानन्दघन परमेश्वरका स्मरण करता है।
प्रयाण-काले मनसा-चलेन
भक्त्या युक्तो योग-बलेन चैव ।
भ्रुवोर्-मध्ये प्राण-मावेश्य सम्यक्
स तं(म्) परं(म्) पुरुष-मुपैति दिव्यम् ॥३।८।१०॥
वह भक्तियुक्त पुरुष अन्तकालमें भी योगबलसे भृकुटीके मध्यमें प्राणको अच्छी प्रकार स्थापित करके, फिर निश्चल मनसे स्मरण करता हुआ उस दिव्य परम पुरुष परमात्माको ही प्राप्त होता है।
यदक्षरं(व्ँ) वेदविदो वदन्ति
विशन्ति यद्-यतयो वीतरागाः ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं(ञ्) चरन्ति
तत्ते पदं(म्) सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥४।८।११॥
वेदके जाननेवाले विद्वान् जिस सच्चिदानन्दघनरूप परमपदको अविनाशी कहते हैं, आसक्तिरहित यत्नशील संन्यासी महात्माजन, जिसमें प्रवेश करते हैं और जिस परमपदको चाहनेवाले ब्रह्मचारी लोग ब्रह्मचर्यका आचरण करते हैं, उस परमपदको मैं तेरे लिये संक्षेपसे कहूँगा।
पुरुषः(स्) स परः(फ्) पार्थ, भक्त्या लभ्यस्-त्वनन्यया ।
यस्यान्तःस्थानि भूतानि, येन सर्वमिदं(न्) ततम् ॥५।८।२२॥
हे पार्थ! जिस परमात्माके अन्तर्गत सर्वभूत हैं और जिस सच्चिदानन्दघन परमात्मासे यह समस्त जगत् परिपूर्ण है, वह सनातन अव्यक्त परम पुरुष तो अनन्य भक्तिसे ही प्राप्त होने योग्य है।
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव
दानेषु यत् पुण्य-फलं(म्) प्रदिष्टम् ।
अत्येति तत् सर्व-मिदं(व्ँ) विदित्वा
योगी परं(म्) स्थान-मुपैति चाद्यम् ॥६।८।२८॥
योगी पुरुष इस रहस्यको तत्त्वसे जानकर वेदोंके पढ़नेमें तथा यज्ञ, तप और दानादिके करनेमें जो पुण्यफल कहा है, उन सबको निःसन्देह उल्लंघन कर जाता है और सनातन परमपदको प्राप्त होता है।
॥इति श्रीमद्भगवद्गीतायां त्रयोदशोऽध्यायः॥
॥ ओ३म् ॥
श्रीपरमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता
अथ चतुर्दशोऽध्यायः
श्रीभगवानुवाच
इदं(न्) तु ते गुह्यतमं(म्), प्रवक्ष्या-म्यनसूयवे ।
ज्ञानं(व्ँ) विज्ञान-सहितं(य्ँ), यज्-ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥१।९।१॥
श्रीभगवान् बोले― तुझ दोषदृष्टिरहित भक्तके लिये इस परम गोपनीय विज्ञानसहित ज्ञानको पुनः भलीभाँति कहूँगा, जिसको जानकर तू दुःखरूप संसारसे मुक्त हो जायगा।
अमानित्व-मदम्भित्वम्, अहिंसा क्षान्ति-रार्जवम् ।
आचार्यो-पासनं(म्) शौचं(म्), स्थैर्य-मात्म-विनिग्रहः ॥२।१३।७॥
श्रेष्ठताके अभिमानका अभाव, दम्भाचरणका अभाव, किसी भी प्राणीको किसी प्रकार भी न सताना, क्षमाभाव, मन-वाणी आदिकी सरलता, श्रद्धा-भक्तिसहित गुरुकी सेवा, बाहर-भीतरकी शुद्धि, अन्तःकरणकी स्थिरता और मन-इन्द्रियों-सहित शरीरका निग्रह।
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यम्, अनहङ्कार एव च ।
जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधि,-दुःख-दोषानु-दर्शनम् ॥३।१३।८॥
इन्द्रियोंके सम्पूर्ण भोगोंमें आसक्तिका अभाव और अहङ्कारका भी अभाव, जन्म, मृत्यु, जरा और रोग आदिमें दुःख और दोषोंका बार-बार विचार करना।
असक्ति-रनभिष्वङ्गः(फ्), पुत्र-दार-गृहादिषु ।
नित्यं(ञ्) च सम-चित्तत्वम्, इष्टानिष्टो-पपत्तिषु ॥४।१३।९॥
पुत्र, स्त्री, घर और धन आदिमें आसक्ति का अभाव; ममताका न होना तथा प्रिय और अप्रियकी प्राप्तिमें सदा ही चित्तका सम रहना।
अध्यात्म-ज्ञान-नित्यत्वं(न्), तत्त्व-ज्ञानार्थ-दर्शनम् ।
एतज्-ज्ञान-मिति प्रोक्तम्, अज्ञानं(य्ँ) यदतोऽन्यथा ॥५।१३।११॥
अध्यात्मज्ञानमें नित्य स्थिति और तत्वज्ञानके अर्थरूप परमात्माको ही देखना― यह सब ज्ञान है और जो इसके विपरीत है वह अज्ञान है― ऐसा कहा है।
ज्ञेयं(य्ँ) यत्तत्-प्रवक्ष्यामि, यज्-ज्ञात्वा-मृत-मश्नुते ।
अनादिमत्-परं(म्) ब्रह्म, न सत्-तन्ना-सदुच्यते ॥६।१३।१२॥
जो जाननेयोग्य है तथा जिसको जानकर मनुष्य परमानन्दको प्राप्त होता है, उसको भलीभाँति कहूँगा। वह अनादिवाला परमब्रह्म न सत् ही कहा जाता है, न असत् ही।
सर्वतः(फ्)-पाणि-पादं(न्) तत्, सर्वतोऽक्षि-शिरो-मुखम् ।
सर्वतः(श्)-श्रुतिमल्-लोके, सर्व-मावृत्य तिष्ठति ॥७।१३।१३॥
वह सब ओर हाथ-पैरवाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुखवाला तथा सब ओर कानवाला है; क्योंकि वह संसारमें सबको व्याप्त करके स्थित है।
सर्वेन्द्रिय-गुणाभासं(म्), सर्वेन्द्रिय-विवर्जितम् ।
असक्तं(म्) सर्वभृच्-चैव, निर्गुणं(ङ्) गुण-भोक्तृ च ॥८।१३।१४॥
वह सम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषयोंको जाननेवाला है, परन्तु वास्तवमें सब इन्द्रियोंसे रहित है तथा आसक्तिरहित होनेपर भी सबका धारण-पोषण करनेवाला और निर्गुण होनेपर भी गुणोंको भोगनेवाला है।
बहिरन्तश्-च भूतानाम्, अचरं(ञ्) चरमेव च ।
सूक्ष्मत्वात्-तद-विज्ञेयं(न्), दूरस्थं(ञ्) चान्तिके च तत् ॥९।१३।१५॥
वह चराचर सब भूतोंके बाहर-भीतर परिपूर्ण है और चर-अचर भी वही है। और वह सूक्ष्म होनेसे अविज्ञेय है तथा अति समीपमें और दूरमें भी स्थित वही है।
अविभक्तं(ञ्) च भूतेषु, विभक्त-मिव च स्थितम् ।
भूत-भर्तृ च तज्-ज्ञेयं(ङ्), ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥१०।१३।१६॥
वह परमात्मा विभागरहित एक रूपसे आकाशके सदृश परिपूर्ण होनेपर भी चराचर सम्पूर्ण भूतोंमें विभक्त-सा स्थित प्रतीत होता है; तथा वह जाननेयोग्य परमात्मा विष्णुरूपसे भूतोंको धारण-पोषण करनेवाला और रुद्ररूपसे संहार करनेवाला तथा ब्रह्मारूपसे सबको उत्पन्न करनेवाला है।
ज्योतिषा-मपि तज्-ज्योतिस्,-तमसः(फ्) पर-मुच्यते ।
ज्ञानं(ञ्) ज्ञेयं(ञ्) ज्ञान-गम्यं(म्), हृदि सर्वस्य विष्ठितम् ॥११।१३।१७॥
वह परब्रह्म ज्योतियोंका भी ज्योति एवं मायासे अत्यन्त परे कहा जाता है। वह परमात्मा बोधस्वरूप, जाननेके योग्य एवं तत्त्वज्ञानसे प्राप्त करनेयोग्य है और सबके हृदयमें विशेषरूपसे स्थित है।
॥इति श्रीमद्भगवद्गीतायां चतुर्दशोऽध्यायः॥
॥ ओ३म् ॥
श्रीपरमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता
अथ पञ्चदशोऽध्यायः
श्रीभगवानुवाच
परं(म्) भूयः(फ्) प्रवक्ष्यामि, ज्ञानानां(ञ्) ज्ञान-मुत्तमम् ।
यज्-ज्ञात्वा मुनयः(स्) सर्वे, परां(म्) सिद्धि-मितो गताः ॥१।१४।१॥
श्रीभगवान् बोले― ज्ञानोंमें भी अति उत्तम उस परम ज्ञानको मैं फिर कहूँगा, जिसको जानकर सब मुनिजन इस संसारसे मुक्त होकर परम सिद्धिको प्राप्त हो गये हैं।
सत्त्वं(म्) रजस्-तम इति, गुणाः(फ्) प्रकृति-सम्भवाः ।
निबध्नन्ति महाबाहो, देहे देहिन-मव्ययम् ॥२।१४।५॥
हे अर्जुन! सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण― ये प्रकृतिसे उत्पन्न तीनों गुण अविनाशी जीवात्माको शरीरमें बाँधते हैं।
तत्र सत्त्वं(न्) निर्मलत्वात्, प्रकाशक-मनामयम् ।
सुख-सङ्गेन बध्नाति, ज्ञान-सङ्गेन चानघ ॥३।१४।६॥
हे निष्पाप! उन तीनों गुणोंमें सत्त्वगुण तो निर्मल होनेके कारण प्रकाश करनेवाला और विकाररहित है, वह सुखके सम्बन्धसे और ज्ञानके सम्बन्धसे अर्थात् उसके अभिमानसे बाँधता है।
रजो रागात्मकं(व्ँ) विद्धि, तृष्णा-सङ्ग-समुद्भवम् ।
तन्-निबध्नाति कौन्तेय, कर्म-सङ्गेन देहिनम् ॥४।१४।७॥
हे अर्जुन! रागरूप रजोगुणको कामना और आसक्तिसे उत्पन्न जान। वह इस जीवात्माको कर्मोंके और उनके फलके सम्बन्धसे में बाँधता है।
तमस्-त्वज्ञानजं(व्ँ) विद्धि, मोहनं(म्) सर्व-देहिनाम् ।
प्रमादालस्य-निद्राभिस्,-तन्-निबध्नाति भारत ॥५।१४।८॥
हे अर्जुन! सब देहाभिमानियोंको मोहित करने-वाले तमोगुणको तो अज्ञानसे उत्पन्न जान। वह इस जीवात्माको प्रमाद, आलस्य और निद्राके द्वारा बाँधता है।
सत्त्वं(म्) सुखे सञ्जयति, रजः(ख्) कर्मणि भारत ।
ज्ञान-मावृत्य तु तमः(फ्), प्रमादे सञ्जयत्युत ॥६।१४।९॥
हे अर्जुन! सत्त्वगुण सुखमें लगाता है और रजोगुण कर्ममें तथा तमोगुण तो ज्ञानको ढककर प्रमादमें भी लगाता है।
रजस्-तमश्-चाभिभूय, सत्त्वं(म्) भवति भारत ।
रजः(स्) सत्त्वं(न्) तमश्-चैव, तमः(स्) सत्त्वं(म्) रजस्-तथा ॥७।१४।१०॥
हे अर्जुन! रजोगुण और तमोगुणको दबाकर सत्त्वगुण, सत्त्वगुण और तमोगुणको दबाकर रजोगुण, वैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुणको दबाकर तमोगुण होता है अर्थात् बढ़ता है।
सर्व-द्वारेषु देहेऽस्मिन्, प्रकाश उपजायते ।
ज्ञानं(य्ँ) यदा तदा विद्याद्,-विवृद्धं(म्) सत्त्व-मित्युत ॥८।१४।११॥
जिस समय इस देहमें तथा अन्तःकरण और इन्द्रियोंमें चेतनता और विवेकशक्ति उत्पन्न होती है, उस समय ऐसा जानना चाहिये कि सत्त्वगुण बढ़ा है।
लोभः(फ्) प्रवृत्ति-रारम्भः(ख्), कर्मणा-मशमः(स्) स्पृहा ।
रजस्येतानि जायन्ते, विवृद्धे भरतर्षभ ॥९।१४।१२॥
हे अर्जुन! रजोगुणके बढ़नेपर लोभ, प्रवृत्ति, स्वार्थबुद्धिसे कर्मोंका सकामभावसे आरम्भ, अशान्ति और विषयभोगोंकी लालसा― ये सब उत्पन्न होते हैं।
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्-च, प्रमादो मोह एव च ।
तमस्येतानि जायन्ते, विवृद्धे कुरु-नन्दन ॥१०।१४।१३॥
हे अर्जुन! तमोगुणके बढ़नेपर अन्तःकरण और इंन्द्रियोंमें अप्रकाश, कर्तव्य-कर्मोंमें अप्रवृत्ति और प्रमाद अर्थात् व्यर्थ चेष्टा और निद्रादि अन्तःकरणकी मोहिनी वृत्तियाँ― ये सब ही उत्पन्न होते हैं।
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु, प्रलयं(य्ँ) याति देह-भृत् ।
तदोत्तम-विदां(ल्ँ) लोकान्, अमलान् प्रतिपद्यते ॥११।१४।१४॥
जब यह मनुष्य सत्त्वगुणकी वृद्धिमें मृत्युको प्राप्त होता है, तब तो उत्तम कर्म करने-वालों ज्ञानियोंके निर्मल दिव्य स्वर्गादि लोकोंको प्राप्त होता है।
रजसि प्रलयं(ङ्) गत्वा, कर्म-सङ्गिषु जायते ।
तथा प्रलीनस्-तमसि, मूढ-योनिषु जायते ॥१२।१४।१५॥
रजोगुणके बढ़नेपर मृत्युको प्राप्त होकर कर्मोंकी आसक्तिवाले मनुष्योंमें उत्पन्न होता है; तथा तमोगुणके बढ़नेपर मरा हुआ मनुष्य कीट, पशु आदि मूढ़योनियोंमें उत्पन्न होता है।
कर्मणः(स्) सुकृतस्याहुः(स्), सात्त्विकं(न्) निर्मलं(म्) फलम् ।
रजसस्-तु फलं(न्) दुःखम्, अज्ञानं(न्) तमसः(फ्) फलम् ॥१३।१४।१६॥
श्रेष्ठ कर्मका तो सात्त्विक अर्थात् सुख, ज्ञान और वैराग्यादि निर्मल फल कहा है; राजस कर्मका फल दुःख एवं तामस कर्मका फल अज्ञान कहा है।
सत्त्वात् सञ्जायते ज्ञानं(म्), रजसो लोभ एव च ।
प्रमाद-मोहौ तमसो, भवतोऽज्ञान-मेव च ॥१४।१४।१७॥
सत्त्वगुणसे ज्ञान उत्पन्न होता है और रजोगुणसे निस्सन्देह लोभ तथा तमोगुणसे प्रमाद और मोह उत्पन्न होते हैं और अज्ञान भी होता है।
ऊर्ध्वं(ङ्) गच्छन्ति सत्त्वस्था, मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।
जघन्य-गुण-वृत्तिस्था, अधो गच्छन्ति तामसाः ॥१५।१४।१८॥
सत्त्वगुणमें स्थित पुरुष स्वर्गादि उच्चको जाते हैं, रजोगुणमें स्थित राजस पुरुष मध्यमें ही रहते हैं और तमोगुणके कार्यरूप निद्रा, प्रमाद और आलस्यादिमें स्थित तामस पुरुष अधोगतिको प्राप्त होते हैं।
गुणानेता-नतीत्य त्रीन्, देही देह-समुद्भवान् ।
जन्म-मृत्यु-जरा-दुःखैर्,-विमुक्तोऽमृत-मश्नुते ॥१६।१४।२०॥
यह पुरुष शरीरकी उत्पत्तिके कारणरूप इन तीनों गुणोंको उल्लंघन करके जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और सब प्रकारके दुःखोंसे मुक्त हुआ परमानन्दको प्राप्त होता है।
अर्जुन उवाच
कैर्लिङ्गैस्-त्रीन् गुणानेतान्, अतीतो भवति प्रभो ।
किमाचारः(ख्) कथं(ञ्) चैतांस्,-त्रीन् गुणा-नति-वर्तते ॥१७।१४।२१॥
अर्जुन बोले― इन तीनों गुणोंसे अतीत पुरुष किन-किन लक्षणोंसे युक्त होता है और किस प्रकारके आचरणोंवाला होता है; तथा हे प्रभो! मनुष्य किस उपायसे इन तीनों गुणोंसे अतीत होता है?
श्रीभगवानुवाच
प्रकाशं(ञ्) च प्रवृत्तिं(ञ्) च, मोहमेव च पाण्डव ।
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि, न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥१८।१४।२२॥
श्रीभगवान् बोले― हे अर्जुन! जो पुरुष सत्त्वगुणके कार्यरूप प्रकाशको और रजोगुणके कार्यरूप प्रवृत्तिको तथा तमोगुणके कार्यरूप मोहको भी न तो प्रवृत्त होनेपर उनसे द्वेष करता है और न निवृत्त होनेपर उनकी आकांक्षा करता है।
उदासीन-वदासीनो, गुणैर्-यो न विचाल्यते ।
गुणा वर्तन्त इत्येव, योऽव-तिष्ठति नेङ्गते ॥१९।१४।२३॥
जो साक्षीके सदृश स्थित हुआ गुणोंके द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता और गुण ही गुणोंमें बरतते हैं― ऐसा समझता हुआ जो सच्चिदानन्दघन परमात्मामें एकीभावसे स्थित रहता है एवं उस स्थितिसे कभी विचलित नहीं होता।
सम-दुःख-सुखः(स्) स्वस्थः(स्), सम-लोष्टाश्म-काञ्चनः ।
तुल्य-प्रियाप्रियो धीरस्,-तुल्य-निन्दात्म-संस्तुतिः ॥२०।१४।२४॥
जो निरन्तर आत्मभावमें स्थित, दुःख-सुखको समान समझनेवाला, मिट्टी, पत्थर और स्वर्णमें समान भाववाला, ज्ञानी, प्रिय तथा अप्रियको एक-सा माननेवाला और अपनी निन्दा-स्तुतिमें भी समान भाववाला है।
मानाप-मानयोस्-तुल्यस्,-तुल्यो मित्रारि-पक्षयोः ।
सर्वारम्भ-परित्यागी, गुणातीतः(स्) स उच्यते ॥२१।१४।२५॥
जो मान और अपमानमें सम है, मित्र और वैरीके पक्षमें भी सम है एवं सम्पूर्ण आरम्भोंमें कर्तापनके अभिमानसे रहित है, वह पुरुष गुणातीत कहा जाता है।
॥इति श्रीमद्भगवद्गीतायां पञ्चदशोऽध्यायः॥
॥ ओ३म् ॥
श्रीपरमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता
अथ षोडशोऽध्यायः
श्रीभगवानुवाच
अभयं(म्) सत्त्व-संशुद्धिर्,-ज्ञान-योग-व्यवस्थितिः ।
दानं(न्) दमश्-च यज्ञश्-च, स्वाध्यायस्-तप आर्जवम् ॥१।१६।१॥
श्रीभगवान् बोले― भयका सर्वथा अभाव, अन्तःकरणकी पूर्ण निर्मलता, तत्त्वज्ञानके लिये ध्यानयोगमें निरन्तर दृढ़ स्थिति और सात्त्विक दान, इन्द्रियोंका दमन, भगवान्, देवता और गुरुजनोंकी पूजा तथा अग्निहोत्र आदि उत्तम कर्मोंका आचरण एवं वेद-शास्त्रोंका पठन-पाठन तथा भगवान् के नाम और गुणोंका कीर्तन, स्वधर्मपालनके लिये कष्टसहन और शरीर तथा इन्द्रियोंके सहित अन्तःकरणकी सरलता।
अहिंसा सत्य-मक्रोधस्,-त्यागः(श्) शान्ति-रपैशुनम् ।
दया भूतेष्व-लोलुप्त्वं(म्), मार्दवं(म्) ह्री-रचापलम् ॥२।१६।२॥
मन, वाणी और शरीरसे किसी प्रकार भी किसीको कष्ट न देना, यथार्थ और प्रिय भाषण, अपना अपकार करनेवालेपर भी क्रोधका न होना, कर्मोंमें कर्तापनके अभिमानका त्याग, अन्तःकरणकी उपरति अर्थात् चित्तकी चञ्चलताका अभाव, किसीकी भी निन्दादि न करना, सब भूतप्राणियोंमें हेतुरहित दया, इन्द्रियोंका विषयोंके साथ संयोग होनेपर भी उनमें आसक्तिका न होना, कोमलता, लोक और शास्त्रसे विरुद्ध आचरणमें लज्जा और व्यर्थ चेष्टाओं का अभाव।
तेजः क्षमा धृतिः(श्) शौचम्, अद्रोहो नातिमानिता ।
भवन्ति सम्पदं(न्) दैवीम्, अभि-जातस्य भारत ॥३।१६।३॥
तेज, क्षमा, धैर्य, बाहरकी शुद्धि एवं किसीमें भी शत्रुभावका न होना और अपनेमें पूज्यताके अभिमानका अभाव― ये सब तो हे अर्जुन! दैवी सम्पदाको लेकर उत्पन्न हुए पुरुषके लक्षण हैं।
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च, क्रोधः(फ्) पारुष्य-मेव च ।
अज्ञानं(ञ्) चाभि-जातस्य, पार्थ सम्पद-मासुरीम् ॥४।१६।४॥
हे पार्थ! दम्भ, घमण्ड और अभिमान तथा क्रोध, कठोरता और अज्ञान भी― ये सब आसुरी सम्पदाको लेकर उत्पन्न हुए पुरुषके लक्षण हैं।
दैवी सम्पद्-विमोक्षाय, निबन्धा-यासुरी मता ।
मा शुचः(स्) सम्पदं(न्) दैवीम्, अभि-जातोऽसि पाण्डव ॥५।१६।५॥
दैवी सम्पदा मुक्तिके लिये और आसुरी सम्पदा बाँधनेके लिये मानी गयी है। इसलिये हे अर्जुन! तू शोक मत कर, क्योंकि तू दैवी सम्पदाको लेकर उत्पन्न हुआ है।
द्वौ भूत-सर्गौ लोकेऽस्मिन्, दैव आसुर एव च ।
दैवो विस्तरशः(फ्) प्रोक्त, आसुरं(म्) पार्थ मे शृणु ॥६।१६।६॥
हे अर्जुन! इस लोकमें भूतोंकी सृष्टि यानी मनुष्यसमुदाय दो ही प्रकारका है, एक तो दैवी प्रकृतिवाला और दूसरा आसुरी प्रकृतिवाला। उनमेंसे दैवी प्रकृतिवाला तो विस्तारपूर्वक कहा गया, अब तू आसुरी प्रकृतिवाले मनुष्यसमुदायको भी विस्तारपूर्वक मुझसे सुन।
प्रवृत्तिं(ञ्) च निवृत्तिं(ञ्) च, जना न विदु-रासुराः ।
न शौचं(न्) नापि चाचारो, न सत्यं(न्) तेषु विद्यते ॥७।१६।७॥
आसुरस्वभाववाले मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्ति― इन दोनोंको ही नहीं जानते। इसलिये उनमें न तो बाहर-भीतरकी शुद्धि है, न श्रेष्ठ आचरण है और न सत्यभाषण ही है।
असत्य-मप्रतिष्ठं(न्) ते, जगदाहु-रनीश्वरम् ।
अपरस्पर-सम्भूतं(ङ्), किमन्यत्-काम-हैतुकम् ॥८।१६।८॥
वे आसुरी प्रकृतिवाले मनुष्य कहा करते हैं कि जगत् आश्रयरहित, सर्वथा असत्य और बिना ईश्वरके, अपने-आप केवल स्त्री-पुरुषके संयोगसे उत्पन्न है, अतएव केवल काम ही इसका कारण है। इसके सिवा और क्या है?
एतां(न्) दृष्टि-मवष्टभ्य, नष्टात्मानोऽल्प-बुद्धयः ।
प्रभवन्-त्युग्र-कर्माणः(ख्), क्षयाय जगतोऽहिताः ॥९।१६।९॥
इस मिथ्या ज्ञानको अवलम्बन करके― जिनका स्वभाव नष्ट हो गया है तथा जिनकी बुद्धि मन्द है, वे सबका अपकार करनेवाले क्रुरकर्मी मनुष्य केवल जगत्के नाशके लिये ही समर्थ होते हैं।
काम-माश्रित्य दुष्पूरं(न्), दम्भ-मान-मदान्विताः ।
मोहाद्-गृहीत्वा-सद्-ग्राहान्, प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः ॥१०।१६।१०॥
वे दम्भ, मान और मदसे युक्त मनुष्य किसी प्रकार भी पूर्ण न होनेवाली कामनाओंका आश्रय लेकर, अज्ञानसे मिथ्या सिद्धान्तों को ग्रहण करके भ्रष्ट आचरणोंको धारण करके संसारमें विचरते हैं।
चिन्ता-मपरिमेयां(ञ्) च, प्रलयान्ता-मुपाश्रिताः ।
कामोप-भोग-परमा, एतावदिति निश्चिताः ॥११।१६।११॥
तथा वे मृत्युपर्यन्त रहनेवाली असंख्य चिन्ताओंका आश्रय लेनेवाले, विषयभोगोंके भोगनेमें तत्पर रहनेवाले और ‘इतना ही सुख है’ इस प्रकार माननेवाले होते हैं।
आशा-पाश-शतैर्-बद्धाः(ख्), काम-क्रोध-परायणाः ।
ईहन्ते काम-भोगार्थम्, अन्यायेनार्थ-सञ्चयान् ॥१२।१६।१२॥
वे आशाकी सैकड़ों फाँसियोंसे बँधे हुए मनुष्य काम-क्रोधके परायण होकर विषय भोगोंके लिये अन्यायपूर्वक धनादि पदार्थोंका संग्रह करनेकी चेष्टा करते हैं।
इदमद्य मया लब्धम्, इमं(म्) प्राप्स्ये मनोरथम् ।
इदमस्तीद-मपि मे, भविष्यति पुनर्धनम् ॥१३।१६।१३॥
वे सोचा करते हैं कि मैंने आज यह प्राप्त कर लिया है और अब इस मनोरथको प्राप्त कर लूँगा। मेरे पास यह इतना धन है और फिर भी यह हो जायगा।
असौ मया हतः(श्) शत्रुर्,-हनिष्ये चापरानपि ।
ईश्वरोऽह-महं(म्) भोगी, सिद्धोऽहं(म्) बलवान् सुखी ॥१४।१६।१४॥
वह शत्रु मेरेद्वारा मारा गया और उन दूसरे शत्रुओंको भी मैं मार डालूँगा। मैं ईश्वर हूँ, ऐश्र्वर्यको भोगनेवाला हूँ। मै सब सिद्धियोंसे युक्त हूँ और बलवान् तथा सुखी हूँ।
आढ्योऽभि-जनवानस्मि, कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया ।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य, इत्य-ज्ञान-विमोहिताः ॥
अनेक-चित्त-विभ्रान्ता, मोह-जाल-समावृताः ।
प्रसक्ताः(ख्) काम-भोगेषु, पतन्ति नरकेऽशुचौ ॥१५-१६।१६।१५-१६॥
मैं बड़ा धनी और बड़े कुटुम्बवाला हूँ। मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा और आमोद-प्रमोद करूँगा। इस प्रकार अज्ञानसे मोहित रहनेवाला तथा अनेक प्रकारसे भ्रमित चित्तवाले मोहरूप जालसे समावृत और विषयभोगोंमें अत्यन्त आसक्त आसुरलोग महान् अपवित्र नरकमें गिरते हैं।
आत्म-सम्भाविताः(स्) स्तब्धा, धन-मान-मदान्विताः ।
यजन्ते नाम यज्ञैस्-ते, दम्भेनाविधि-पूर्वकम् ॥१७।१६।१७॥
वे अपने-आपको ही श्रेष्ठ माननेवाले घमण्डी पुरुष धन और मानके मदसे युक्त होकर केवल नाममात्रके यज्ञोंद्वारा पाखण्डसे शास्त्रविधिरहित यजन करते हैं।
त्रिविधं(न्) नरकस्येदं(न्), द्वारं(न्) नाशन-मात्मनः ।
कामः(ख्) क्रोधस्-तथा लोभस्,-तस्मा-देतत् त्रयं(न्) त्यजेत् ॥१८।१६।२१॥
काम, क्रोध तथा लोभ― ये तीन प्रकारके नरकके द्वार आत्माका नाश करनेवाले अर्थात् उसको अधोगतिमें ले जानेवाले हैं। अतएव इन तीनोंको त्याग देना चाहिये।
एतैर्-विमुक्तः(ख्) कौन्तेय, तमो-द्वारैस्-त्रिभिर्-नरः ।
आचर-त्यात्मनः(श्) श्रेयस्,-ततो याति परां(ङ्) गतिम् ॥१९।१६।२२॥
हे अर्जुन! इन तीनों नरकके द्वारोंसे मुक्त पुरुष अपने कल्याणका आचरण करता है, इससे वह परमगतिको जाता है।
यः(श्) शास्त्र-विधि-मुत्सृज्य, वर्तते काम-कारतः ।
न स सिद्धि-मवाप्नोति, न सुखं(न्) न परां(ङ्) गतिम् ॥२०।१६।२३॥
जो पुरुष शास्त्रविधिको त्यागकर अपनी इच्छासे मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धिको प्राप्त होता है, न परमगतिको और न सुखको ही।
तस्माच्-छास्त्रं(म्) प्रमाणं(न्) ते, कार्या-कार्य-व्यवस्थितौ ।
ज्ञात्वा शास्त्र-विधानोक्तं(ङ्), कर्म कर्तु-मिहार्हसि ॥२१।१६।२४॥
इससे तेरे लिये इस कर्तव्य और अकर्तव्यकी व्यवस्थामें शास्त्र ही प्रमाण है। ऐसा जानकर तू शास्त्रविधिसे नियत कर्म ही करनेयोग्य है।
॥इति श्रीमद्भगवद्गीतायां षोडशोऽध्यायः॥
॥ ओ३म् ॥
श्रीपरमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता
अथ सप्तदशोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
ये शास्त्र-विधि-मुत्सृज्य, यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेषां(न्) निष्ठा तु का कृष्ण, सत्त्वमाहो रजस्-तमः ॥१।१७।१॥
अर्जुन बोले― हे कृष्ण! जो मनुष्य शास्त्रविधिको त्यागकर श्रद्धासे युक्त हुए उपासनारूप कर्म करते हैं, उनकी स्थिति फिर कौन-सी है? सात्त्विकी है अथवा राजसी किंवा तामसी?
श्रीभगवानुवाच
त्रि-विधा भवति श्रद्धा, देहिनां(म्) सा स्वभावजा ।
सात्त्विकी राजसी चैव, तामसी चेति तां(म्) शृणु ॥२।१७।२॥
श्रीभगवान् बोले― मनुष्योंकी वह शास्त्रीय संस्कारोंसे रहित केवल स्वभावसे उत्पन्न श्रद्धा सात्त्विकी और राजसी तथा तामसी― ऐसे तीनों प्रकारकी ही होती है। उसको तू मुझसे सुन।
सत्त्वानु-रूपा सर्वस्य, श्रद्धा भवति भारत ।
श्रद्धामयोऽयं(म्) पुरुषो, यो यच्छ्रद्धः(स्) स एव सः ॥३।१७।३॥
हे भारत! सभी मनुष्योंकी श्रद्धा उनके अन्तः-करणके अनुरूप होती है। यह पुरुष श्रद्धामय है, इसलिये जो पुरुष जैसी श्रद्धावाला है, वह स्वयं भी वही है।
यजन्ते सात्त्विका देवान्, यक्ष-रक्षांसि राजसाः ।
प्रेतान् भूतगणांश्-चान्ये, यजन्ते तामसा जनाः ॥४।१७।४॥
सात्त्विक पुरुष विद्वानोंको पूजते हैं, राजस पुरुष बलसे प्रतिष्ठित और पापीलोगोंको तथा अन्य जो तामस मनुष्य हैं, वे मृत और अग्न्यादि भूत पदार्थों को पूजते हैं।
आहारस्-त्वपि सर्वस्य, त्रिविधो भवति प्रियः ।
यज्ञस्-तपस्-तथा दानं(न्), तेषां भेद-मिमं(म्) शृणु ॥५।१७।७॥
भोजन भी सबको अपनी-अपनी प्रकृतिके अनुसार तीन प्रकारका प्रिय होता है। और वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी तीन-तीन प्रकारके होते हैं। उनके इस पृथक्-पृथक् भेदको तू मुझसे सुन।
आयुः-सत्त्व-बलारोग्य,-सुख-प्रीति-विवर्धनाः ।
रस्याः(स्) स्निग्धाः(स्) स्थिरा हृद्या, आहाराः(स्) सात्त्विक-प्रियाः ॥६।१७।८॥
आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीतिको बढ़ानेवाले, रसयुक्त, चिकने और स्थिर रहनेवाले तथा स्वभावसे ही मनको प्रिय― ऐसे आहार अर्थात् भोजन करनेके पदार्थ सात्त्विक पुरुषको प्रिय होते हैं।
कट्वम्ल-लवणा-त्युष्ण,-तीक्ष्ण-रूक्ष-विदाहिनः ।
आहारा राजसस्येष्टा, दुःख-शोकामय-प्रदाः ॥७।१७।९॥
कड़वे, खट्टे, लवणयुक्त, बहुत गरम, तीखे, रूखे, दाहकारक और दुःख, चिन्ता तथा रोगोंको उत्पन्न करनेवाले आहार अर्थात् भोजन करनेके पदार्थ राजस पुरुषको प्रिय होते हैं।
यात-यामं(ङ्) गत-रसं(म्), पूति पर्युषितं(ञ्) च यत् ।
उच्छिष्ट-मपि चामेध्यं(म्), भोजनं(न्) तामस-प्रियम् ॥८।१७।१०॥
जो भोजन अधपका, रसरहित, दुर्गन्धयुक्त, बासी और उच्छिष्ट है तथा जो अपवित्र भी है, वह भोजन तामस पुरुषको प्रिय होता है।
अफला-काङ्क्षिभिर्-यज्ञो, विधि-दृष्टो य इज्यते ।
यष्टव्य-मेवेति मनः(स्), समाधाय स सात्त्विकः ॥९।१७।११॥
जो शास्त्रविधिसे नियत, यज्ञ करना ही कर्तव्य है― इस प्रकार मनको समाधान करके, फल न चाहनेवाले पुरुषोंद्वारा किया जाता है, वह सात्त्विक है।
अभि-सन्धाय तु फलं(न्), दम्भार्थ-मपि चैव यत् ।
इज्यते भरत-श्रेष्ठ, तं(य्ँ) यज्ञं(व्ँ) विद्धि राजसम् ॥१०।१७।१२॥
परन्तु हे अर्जुन! केवल दम्भाचरणके लिये अथवा फलको भी दृष्टिमें रखकर जो यज्ञ किया जाता है, उस यज्ञको तू राजस जान।
विधि-हीन-मसृष्टान्नं(म्), मन्त्र-हीन-मदक्षिणम् ।
श्रद्धा-विरहितं(य्ँ) यज्ञं(न्), तामसं(म्) परिचक्षते ॥११।१७।१३॥
शास्त्रविधिसे हीन, अन्नदानसे रहित, बिना मन्त्रोंके, बिना दक्षिणाके और बिना श्रद्धाके किये जानेवाले यज्ञको तामस यज्ञ कहते हैं।
देव-द्विज-गुरु-प्राज्ञ,-पूजनं(म्) शौच-मार्जवम् ।
ब्रह्मचर्य-महिंसा च, शारीरं(न्) तप उच्यते ॥१२।१७।१४॥
देवता, ब्राह्मण, गुरु और ज्ञानीजनोंका पूजन, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा― यह शरीर-सम्बन्धी तप कहा जाता है।
अनुद्वेग-करं(व्ँ) वाक्यं(म्), सत्यं(म्) प्रिय-हितं(ञ्) च यत् ।
स्वाध्याया-भ्यसनं(ञ्) चैव, वाङ्मयं(न्) तप उच्यते ॥१३।१७।१५॥
जो उद्वेग न करनेवाला, प्रिय और हितकारक एवं यथार्थ भाषण है तथा जो वेद-शास्त्रोंके पठनका एवं परमेश्वरके नाम-जपका अभ्यास है― वही वाणी-सम्बन्धी तप कहा जाता है।
मनः(फ्) प्रसादः(स्) सौम्यत्वं(म्), मौनमात्म-विनिग्रहः ।
भाव-संशुद्धि-रित्येतत्, तपो मानस-मुच्यते ॥१४।१७।१६॥
मनकी प्रसन्नता, शान्तभाव, भगवच्चिन्तन करनेका स्वभाव, मनका निग्रह और अन्तःकरणके भावोंकी भलीभाँति पवित्रता― इस प्रकार यह मनसम्बन्धी तप कहा जाता है।
श्रद्धया परया तप्तं(न्), तपस्-तत्-त्रिविधं(न्) नरैः ।
अफला-काङ्क्षिभिर्-युक्तैः(स्), सात्त्विकं(म्) परिचक्षते ॥१५।१७।१७॥
फलको न चाहनेवाले योगी पुरुषोंद्वारा परम श्रद्धासे किये हुए उस पूर्वोक्त तीन प्रकारके तपको सात्त्विक कहते हैं।
सत्कार-मान-पूजार्थं(न्), तपो दम्भेन चैव यत् ।
क्रियते तदिह प्रोक्तं(म्), राजसं(ञ्) चल-मध्रुवम् ॥१६।१७।१८॥
जो तप सत्कार, मान और पूजाके लिये तथा अन्य किसी स्वार्थके लिये भी स्वभावसे या पाखण्डसे किया जाता है, वह अनिश्चित एवं क्षणिक फलवाला तप यहाँ राजस कहा गया है।
मूढग्राहे-णात्मनो यत्, पीडया क्रियते तपः ।
परस्योत्-सादनार्थं(व्ँ) वा, तत्-तामस-मुदाहृतम् ॥१७।१७।१९॥
जो तप मूढ़तापूर्वक हठसे, मन, वाणी और शरीरकी पीड़ाके सहित अथवा दूसरेका अनिष्ट करनेके लिये किया जाता है― वह तप तामस कहा गया है।
दातव्य-मिति यद्दानं(न्), दीयतेऽनुपकारिणे ।
देशे काले च पात्रे च, तद्-दानं(म्) सात्त्विकं(म्) स्मृतम् ॥१८।१७।२०॥
दान देना ही कर्तव्य है― ऐसे भावसे जो दान देश तथा काल और पात्रके प्राप्त होनेपर उपकार न करनेवालेके प्रति दिया जाता है, वह दान सात्त्विक कहा गया है।
यत्-तु प्रत्युप-कारार्थं(म्), फल-मुद्दिश्य वा पुनः ।
दीयते च परि-क्लिष्टं(न्), तद्-दानं(म्) राजसं(म्) स्मृतम् ॥१९।१७।२१॥
किन्तु जो दान क्लेशपूर्वक तथा प्रत्युपकारके प्रयोजनसे अथवा फलको दृष्टिमें रखकर फिर दिया जाता है, वह दान राजस कहा गया है।
अदेश-काले यद्-दानम्, अपात्रेभ्यश्च दीयते ।
असत्-कृत-मवज्ञातं(न्), तत्-तामस-मुदाहृतम् ॥२०।१७।२२॥
जो दान बिना सत्कारके अथवा तिरस्कारपूर्वक अयोग्य देश-कालमें और कुपात्रके प्रति दिया जाता है, वह दान तामस कहा गया है।
ओं तत्-सदिति निर्देशो, ब्रह्मणस्-त्रिविधः(स्) स्मृतः ।
ब्राह्मणास्-तेन वेदाश्-च, यज्ञाश्-च विहिताः(फ्) पुरा ॥२१।१७।२३॥
ओम्, तत्, सत्― ऐसे यह तीन प्रकारका सच्चिदानन्दघन ब्रह्मका नाम कहा है; उसीसे सृष्टिके आदिकालमें वेदवेत्ता और वेद तथा यज्ञादि रचे गये।
तस्मा-दोमित्यु-दाहृत्य, यज्ञ-दान-तपः-क्रियाः ।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः(स्), सततं(म्) ब्रह्म-वादिनाम् ॥२२।१७।२४॥
इसलिये वेद-मन्त्रोंका उच्चारण करनेवाले श्रेष्ठ पुरुषोंकी शास्त्रविधिसे नियत यज्ञ, दान और तपरूप क्रियाएँ सदा ‘ओ३म्’ इस परमात्माके नामको उच्चारण करके ही आरम्भ होती हैं।
तदित्य-नभि-सन्धाय, फलं(य्ँ) यज्ञ-तपः(ख्)-क्रियाः ।
दान-क्रियाश्च विविधाः(ख्), क्रियन्ते मोक्ष-काङ्क्षिभिः ॥२३।१७।२५॥
तत् अर्थात् ‘तत्’ नामसे कहे जानेवाले परमात्माका ही यह सब है― इस भावसे फलको न चाहकर नाना प्रकारकी यज्ञ, तपरूप क्रियाएँ तथा दानरूप क्रियाएँ कल्याणकी इच्छावाले पुरुषोंद्वारा की जाती हैं।
सद्-भावे साधु-भावे च, सदित्येतत्-प्रयुज्यते ।
प्रशस्ते कर्मणि तथा, सच्छब्दः(फ्) पार्थ युज्यते ॥२४।१७।२६॥
‘सत्’― इस प्रकार यह परमात्माका नाम सत्यभावमें और श्रेष्ठभावमें प्रयोग किया जाता है तथा हे पार्थ! उत्तम कर्ममें भी ‘सत्’ शब्दका प्रयोग किया जाता है।
यज्ञे-तपसि दाने च, स्थितिः(स्) सदिति चोच्यते ।
कर्म चैव तदर्थीयं(म्), सदित्येवाभि-धीयते ॥२५।१७।२७॥
तथा यज्ञ, तप और दानमें जो स्थिति है, वह भी ‘सत्’ इस प्रकार कही जाती है और उस परमात्माके लिये किया हुआ कर्म निश्चयपूर्वक सत्― ऐसे कहा जाता है।
अश्रद्धया हुतं(न्) दत्तं(न्), तपस्-तप्तं(ङ्) कृतं(ञ्) च यत् ।
अस-दित्युच्यते पार्थ, न च तत्-प्रेत्य नो इह ॥२६।१७।२८॥
हे अर्जुन! बिना श्रद्धाके किया हुआ हवन, दिया हुआ दान एवं तपा हुआ तप और जो कुछ भी किया हुआ शुभ कर्म है― वह समस्त ‘असत्’― इस प्रकार कहा जाता है; इसलिये वह न तो इस लोकमें लाभदायक है और न मरनेके बाद ही।
॥इति श्रीमद्भगवद्गीतायां सप्तदशोऽध्यायः॥
॥ ओ३म् ॥
श्रीपरमात्मने नमः
श्रीमद्भगवद्गीता
अथाष्टादशोऽध्यायः
अर्जुन उवाच
सन्न्यासस्य महाबाहो, तत्त्व-मिच्छामि वेदितुम् ।
त्यागस्य च हृषीकेश, पृथक्-केशि-निषूदन ॥१।१८।१॥
अर्जुन बोले― हे महाबाहो! हे हृषिकेश! हे केशिनिषूदन! मैं संन्यास और त्यागके तत्त्वको पृथक्-पृथक् जानना चाहता हूँ।
श्रीभगवानुवाच
काम्यानां(ङ्) कर्मणां(न्) न्यासं(म्), सन्न्यासं(ङ्) कवयो विदुः।
सर्व-कर्म-फल-त्यागं(म्), प्राहुस्-त्यागं(व्ँ) विचक्षणाः ॥२।१८।२॥
श्रीभगवान् बोले― कितने ही पण्डितजन तो काम्य कर्मोंके त्यागको संन्यास समझते हैं तथा दूसरे विचारकुशल पुरुष सब कर्मोंके फलके त्यागको त्याग कहते हैं।
त्याज्यं(न्) दोष-वदित्येके, कर्म प्राहुर्-मनीषिणः ।
यज्ञ-दान-तपः-कर्म, न त्याज्य-मिति चापरे ॥३।१८।३॥
कई एक विद्वान् ऐसा कहते हैं कि कर्ममात्र दोषयुक्त हैं, इसलिये त्यागनेके योग्य हैं और दूसरे विद्वान् यह कहते हैं कि यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्यागनेयोग्य नहीं हैं।
निश्चयं(म्) शृणु मे तत्र, त्यागे भरत-सत्तम ।
त्यागो हि पुरुष-व्याघ्र, त्रिविधः(स्) सम्प्रकीर्तितः ॥४।१८।४॥
हे पुरुषश्रेष्ठ अर्जुन ! संन्यास और त्याग, इन दोनोंमेंसे पहले त्यागके विषयमें तू मेरा निश्चय सुन। क्योंकि त्याग सात्त्विक, राजस और तामस भेदसे तीन प्रकारका कहा गया है।
यज्ञ-दान-तपः-कर्म, न त्याज्यं(ङ्) कार्यमेव तत् ।
यज्ञो दानं(न्) तपश्-चैव, पावनानि मनीषिणाम् ॥५।१८।५॥
यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्याग करनेके योग्य नहीं है, बल्कि वह तो अवश्य कर्तव्य है; क्योंकि यज्ञ, दान और तप― ये तीनों ही कर्म बुद्धिमान् पुरुषोंको पवित्र करनेवाले हैं।
एतान्यपि तु कर्माणि, सङ्गं(न्) त्यक्त्वा फलानि च ।
कर्तव्यानीति मे पार्थ, निश्चितं(म्) मत-मुत्तमम् ॥६।१८।६॥
इसलिये हे पार्थ! इन यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंको तथा और भी सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मोंको आसक्ति और फलोंका त्याग करके अवश्य करना चाहिये, यह मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है।
नियतस्य तु सन्न्यासः(ख्), कर्मणो नोपपद्यते ।
मोहात्-तस्य परित्यागस्,-तामसः(फ्) परि-कीर्तितः ॥७।१८।७॥
(निषिद्ध और काम्य कर्मोंका तो स्वरूपसे त्याग करना उचित ही है) परन्तु नियत कर्मका स्वरूपसे त्याग करना उचित नहीं है। इसलिये मोहके कारण उसका त्याग कर देना तामस त्याग कहा गया है।
दुःख-मित्येव यत्-कर्म, काय-क्लेश-भयात्-त्यजेत् ।
स कृत्वा राजसं(न्) त्यागं(न्), नैव त्याग-फलं(ल्ँ) लभेत् ॥८।१८।८॥
जो कुछ कर्म है वह सब दुःखरूप ही है― ऐसा समझकर यदि कोई शारीरिक क्लेशके भयसे कर्तव्यकर्मोंका त्याग कर दे, तो वह ऐसा राजस त्याग करके त्यागके फलको किसी प्रकार भी नहीं पाता।
कार्य-मित्येव यत्-कर्म, नियतं(ङ्) क्रियतेऽर्जुन ।
सङ्गं(न्) त्यक्त्वा फलं(ञ्) चैव, स त्यागः(स्) सात्त्विको मतः ॥९।१८।९॥
हे अर्जुन! जो शास्त्रविहित कर्म करना कर्तव्य है― इसी भावसे आसक्ति और फलका त्याग करके किया जाता है― वही सात्त्विक त्याग माना गया है।
न द्वेष्ट्य-कुशलं(ङ्) कर्म, कुशले नानु-षज्जते ।
त्यागी सत्त्व-समाविष्टो, मेधावी छिन्न-संशयः ॥१०।१८।१०॥
जो मनुष्य अकुशल कर्मसे तो द्वेष नहीं करता और कुशल कर्ममें आसक्त नहीं होता― वह शुद्ध सत्त्वगुणसे युक्त पुरुष संशयरहित, बुद्धिमान् और सच्चा त्यागी है।
न हि देह-भृता शक्यं(न्), त्यक्तुं(ङ्) कर्मा-ण्यशेषतः ।
यस्तु कर्म-फल-त्यागी, स त्यागी-त्यभिधीयते ॥११।१८।११॥
क्योंकि शरीरधारी किसी भी मनुष्यके द्वारा सम्पूर्णतासे सब कर्मोंका त्याग किया जाना शक्य नहीं है; इसलिये जो कर्मफलका त्यागी है, वही त्यागी है― यह कहा जाता है।
अनिष्ट-मिष्टं(म्) मिश्रं(ञ्) च, त्रिविधं(ङ्) कर्मणः(फ्) फलम् ।
भवत्य-त्यागिनां(म्) प्रेत्य, न तु सन्न्यासिनां(ङ्) क्वचित् ॥१२।१८।१२॥
कर्मफलका त्याग न करनेवाले मनुष्योंके कर्मोंका तो अच्छा, बुरा और मिला हुआ― ऐसे तीन प्रकारका फल मरनेके पश्चात् अवश्य होता है, किन्तु कर्मफलका त्याग कर देनेवाले मनुष्योंके कर्मोंका फल किसी कालमें भी नहीं होता।
पञ्चैतानि महाबाहो, कारणानि निबोध मे ।
साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि, सिद्धये सर्व-कर्मणाम् ॥१३।१८।१३॥
हे महाबाहो! सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धिके ये पाँच हेतु कर्मोंका अन्त करनेके लिये उपाय बतलानेवाले साङ्ख्यशास्त्रमें कहे गये हैं, उनको तू मुझसे भलीभाँति जान।
अधिष्ठानं(न्) तथा कर्ता, करणं(ञ्) च पृथग्-विधम् ।
विविधाश्च पृथक्-चेष्टा, दैवं(ञ्) चैवात्र पञ्चमम् ॥१४।१८।१४॥
इस विषयमें अर्थात् कर्मोंकी सिद्धिमें अधिष्ठान और कर्ता तथा भिन्न-भिन्न प्रकारके करण एवं नाना प्रकारकी अलग-अलग चेष्टाएँ और वैसे ही पाँचवाँ हेतु दैव है।
शरीर-वाङ्-मनोभिर्-यत्, कर्म प्रारभते नरः ।
न्याय्यं(व्ँ) वा विपरीतं(व्ँ) वा, पञ्चैते तस्य हेतवः ॥१५।१८।१५॥
मनुष्य मन, वाणी और शरीरसे शास्त्रानुकूल अथवा विपरीत जो कुछ भी कर्म करता है― उसके ये पाँचों कारण हैं।
तत्रैवं(म्) सति कर्तारम्, आत्मानं(ङ्) केवलं(न्) तु यः ।
पश्यत्य-कृत-बुद्धित्वान्,-न स पश्यति दुर्मतिः ॥१६।१८।१६॥
परन्तु ऐसा होनेपर भी जो मनुष्य अशुद्ध बुद्धि होनेके कारण उस विषयमें यानी कर्मोंके होनेमें केवल शुद्धस्वरूप आत्माको कर्ता समझता है, वह मलीन बुद्धिवाला अज्ञानी यथार्थ नहीं समझता।
यस्य नाहङ्-कृतो भावो, बुद्धिर्-यस्य न लिप्यते ।
हत्वाऽपि स इमाँल्-लोकान्, न हन्ति न निबध्यते ॥१७।१८।१७॥
जिस पुरुषके अन्तःकरणमें ‘मैं कर्ता हूँ’ ऐसा भाव नहीं है तथा जिसकी बुद्धि सांसारिक पदार्थोंमें और कर्मोंमें लिपायमान नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकोंको मारकर भी वास्तवमें न तो मरता है और न पापसे बँधता है।
ज्ञानं(ञ्) ज्ञेयं(म्) परिज्ञाता, त्रिविधा कर्म-चोदना ।
करणं(ङ्) कर्म कर्तेति, त्रिविधः(ख्) कर्म-सङ्ग्रहः ॥१८।१८।१८॥
ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय― ये तीन प्रकारकी कर्म-प्रेरणा हैं और कर्ता, करण तथा क्रिया― ये तीन प्रकारका कर्म-संग्रह है।
ज्ञानं(ङ्) कर्म च कर्ता च, त्रिधैव गुण-भेदतः ।
प्रोच्यते गुण-सङ्ख्याने, यथा-वच्छृणु तान्यपि ॥१९।१८।१९॥
गुणोंकी संख्या करनेवाले शास्त्रमें ज्ञान और कर्म तथा कर्ता गुणोंके भेदसे तीन-तीन प्रकारके ही कहे गये हैं; उनको भी तु मुझसे भलीभाँति सुन।
सर्व-भूतेषु येनैकं(म्), भाव-मव्यय-मीक्षते ।
अविभक्तं(व्ँ) विभक्तेषु, तज्ज्ञानं(व्ँ) विद्धि सात्त्विकम् ॥२०।१८।२०॥
जिस ज्ञानसे मनुष्य पृथक्-पृथक् सब भूतोंमें एक अविनाशी परमात्मभावको विभागरहित समभावसे स्थित देखता है, उस ज्ञानको तू सात्त्विक जान।
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं(न्), नाना-भावान्-पृथग्-विधान् ।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु, तज्ज्ञानं(व्ँ) विद्धि राजसम् ॥२१।१८।२१॥
किन्तु जो ज्ञान अर्थात् जिस ज्ञानके द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण भूतोंमें भिन्न-भिन्न प्रकारके नाना भावोंको अलग-अलग जानता है, उस ज्ञानको तू राजस जान।
यत्तु कृत्स्न-वदेकस्मिन्, कार्ये सक्त-महैतुकम् ।
अतत्त्वार्थ-वदल्पं(ञ्) च, तत्-तामस-मुदाहृतम् ॥२२।१८।२२॥
परन्तु जो ज्ञान एक कार्यरूप शरीरमें ही सम्पूर्णके सदृश आसक्त है तथा जो बिना युक्तिवाला, तात्त्विक अर्थसे रहित और तुच्छ है― वह तामस कहा गया है।
नियतं(म्) सङ्ग-रहितम्, अराग-द्वेषतः(ख्) कृतम् ।
अफल-प्रेप्सुना कर्म, यत्तत्-सात्त्विक-मुच्यते ॥२३।१८।२३॥
जो कर्म शास्त्रविधिसे नियत किया हुआ और कर्तापनके अभिमानसे रहित हो तथा फल न चाहनेवाले पुरुषद्वारा बिना राग-द्वेषके किया गया हो― वह सात्त्विक कहा जाता है।
यत्तु कामेप्सुना कर्म, साहङ्कारेण वा पुनः ।
क्रियते बहुलायासं(न्), तद्-राजस-मुदाहृतम् ॥२४।१८।२४॥
परन्तु जो कर्म बहुत परिश्रमसे युक्त होता है तथा भोगोंको चाहनेवाले पुरुषद्वारा या अहंकारयुक्त पुरुषद्वारा किया जाता है, वह कर्म राजस कहा गया है।
अनुबन्धं(ङ्) क्षयं(म्) हिंसाम्, अनवेक्ष्य च पौरुषम् ।
मोहा-दारभ्यते कर्म, यत्तत्-तामस-मुच्यते ॥२५।१८।२५॥
जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्यको न विचारकर केवल अज्ञानसे आरम्भ किया जाता है, वह तामस कहा जाता है।
मुक्त-सङ्गोऽनहं-वादी, धृत्युत्साह-समन्वितः ।
सिद्ध्य-सिद्ध्योर्-निर्विकारः(ख्), कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥२६।१८।२६॥
जो कर्ता संगरहित, अहंकारके वचन न बोलनेवाला, धैर्य और उत्साहसे युक्त तथा कार्यके सिद्ध होने और न होनेमें हर्ष-शोकादि विकारोंसे रहित है― वह सात्त्विक कहा जाता है।
रागी कर्म-फल-प्रेप्सुर्,-लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः ।
हर्ष-शोकान्वितः(ख्) कर्ता, राजसः(फ्) परिकीर्तितः ॥२७।१८।२७॥
जो कर्ता आसक्तिसे युक्त, कर्मोंके फलको चाहनेवाला और लोभी है तथा दूसरोंको कष्ट देनेके स्वभाववाला, अशुद्धाचारी और हर्ष-शोकसे लिप्त है― वह राजस कहा गया है।
अयुक्तः(फ्) प्राकृतः(स्) स्तब्धः(श्), शठोऽनैष्कृतिकोऽलसः ।
विषादी दीर्घ-सूत्री च, कर्ता तामस उच्यते ॥२८।१८।२८॥
जो कर्ता अयुक्त, शिक्षासे रहित घमंडी, धूर्त और दूसरोंकी जीविकाका नाश करनेवाला तथा शोक करनेवाला, आलसी और दीर्घसूत्री है― वह तामस कहा जाता है।
बुद्धेर्-भेदं(न्) धृतेश्-चैव, गुणतस्-त्रिविधं(म्) शृणु ।
प्रोच्यमान-मशेषेण, पृथक्त्वेन धनञ्जय ॥२९।१८।२९॥
हे धनंजय! अब तू बुद्धिका और धृतिका भी गुणोंके अनुसार तीन प्रकारका भेद मेरे द्वारा सम्पूर्णतासे विभागपूर्वक कहा जानेवाला सुन।
प्रवृत्तिं(ञ्) च निवृत्तिं(ञ्) च, कार्याकार्ये भयाभये ।
बन्धं(म्) मोक्षं(ञ्) च या वेत्ति, बुद्धिः(स्) सा पार्थ सात्त्विकी ॥३०।१८।३०॥
हे पार्थ! जो बुद्धि प्रवृत्तिमार्ग और निवृत्ति-मार्गको, कर्तव्य और अकर्तव्यको, भय और अभयको तथा बन्धन और मोक्षको यथार्थ जानती है― वह बुद्धि सात्त्विकी है।
यया धर्म-मधर्मं(ञ्) च, कार्यं(ञ्) चाकार्य-मेव च ।
अयथावत् प्रजानाति, बुद्धिः(स्) सा पार्थ राजसी ॥३१।१८।३१॥
हे पार्थ! मनुष्य जिस बुद्धिके द्वारा धर्म और अधर्मको तथा कर्तव्य और अकर्तव्यको भी यथार्थ नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है।
अधर्मं(न्) धर्म-मिति या, मन्यते तमसावृता ।
सर्वार्थान् विपरीतांश्-च, बुद्धिः(स्) सा पार्थ तामसी ॥३२।१८।३२॥
हे अर्जुन! जो तमोगुणसे घिरी हुई बुद्धि अधर्मको भी ‘यह धर्म है’ ऐसा मान लेती है तथा इसी प्रकार अन्य सम्पूर्ण पदार्थोंको भी विपरीत मान लेती है, वह बुद्धि तामसी है।
धृत्या यया धारयते, मनःप्राणेन्द्रिय-क्रियाः ।
योगेना-व्यभिचारिण्या, धृतिः(स्) सा पार्थ सात्त्विकी ॥३३।१८।३३॥
हे पार्थ! जिस अव्यभिचारिणी धारण-शक्तिसे मनुष्य ध्यानयोगके द्वारा मन, प्राण और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको धारण करता है, वह धृति सात्त्विकी है।
यया तु धर्म-कामार्थान्, धृत्या धारयतेऽर्जुन ।
प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी, धृतिः(स्) सा पार्थ राजसी ॥३४।१८।३४॥
परंतु हे पृथापुत्र अर्जुन! फलकी इच्छावाला मनुष्य जिस धारणशक्तिके द्वारा अत्यन्त आसक्तिसे धर्म, अर्थ और कामोंको धारण करता है, वह धारणशक्ति राजसी है।
यया स्वप्नं(म्) भयं(म्) शोकं(व्ँ), विषादं(म्) मदमेव च ।
न विमुञ्चति दुर्मेधा, धृतिः(स्) सा पार्थ तामसी ॥३५।१८।३५॥
हे पार्थ! दुष्ट बुद्धिवाला मनुष्य जिस धारण-शक्तिके द्वारा निद्रा, भय, चिन्ता और दु:खको तथा उन्मत्तताको भी नहीं छोड़ता अर्थात् धारण किये रहता है― वह धारणशक्ति तामसी है।
सुखं(न्) त्विदानीं(न्) त्रिविधं(म्), शृणु मे भरतर्षभ ।
अभ्यासाद्-रमते यत्र, दुःखान्तं(ञ्) च निगच्छति ॥
यत्तदग्रे विषमिव, परिणामेऽमृतोपमम् ।
तत्सुखं(म्) सात्त्विकं(म्) प्रोक्तम्, आत्म-बुद्धि-प्रसादजम् ॥३६-३७।१८।३६-३७॥
हे भरतश्रेष्ठ! अब तीन प्रकारके सुखको भी तू मुझसे सुन। जिस सुखमें साधक मनुष्य यम-नियमादिके अभ्याससे रमण करता है और जिससे दुःखोंके अन्तको प्राप्त हो जाता है― जो ऐसा सुख है, वह आरम्भकालमें यद्यपि विषके तुल्य प्रतीत होता है, परंतु परिणाममें अमृतके तुल्य है; इसलिये वह परमात्मविषयक बुद्धिके प्रसादसे उत्पन्न होनेवाला सुख सात्त्विक कहा गया है।
विषयेन्द्रिय-संयोगाद्,-यत्तदग्रेऽमृतोपमम् ।
परिणामे विषमिव, तत्सुखं(म्) राजसं(म्) स्मृतम् ॥३८।१८।३८॥
जो सुख विषय और इन्द्रियोंके संयोगसे होता है, वह पहले― भोगकालमें अमृतके तुल्य प्रतीत होनेपर भी परिणाममें विषके तुल्य है; इसलिये वह सुख राजस कहा गया है।
यदग्रे चानुबन्धे च, सुखं(म्) मोहन-मात्मनः ।
निद्रालस्य-प्रमादोत्थं(न्), तत्तामस-मुदाहृतम् ॥३९।१८।३९॥
जो सुख भोगकालमें तथा परिणाममें भी आत्माको मोहित करनेवाला है― वह निद्रा, आलस्य और प्रमादसे उत्पन्न सुख तामस कहा गया है।
न तदस्ति पृथिव्यां(व्ँ) वा, दिवि देवेषु वा पुनः ।
सत्त्वं(म्) प्रकृतिजैर्-मुक्तं(य्ँ), यदेभिः(स्) स्यात्-त्रिभिर्-गुणैः ॥४०।१८।४०॥
पृथ्वीमें या दिव्य-लोकमें अथवा देवताओंमें तथा इनके सिवा और कहीं भी ऐसा कोई भी सत्त्व नहीं है जो प्रकृतिसे उत्पन्न इन तीनों गुणोंसे रहित हो।
ब्राह्मण-क्षत्रिय-विशां(म्), शूद्राणां(ञ्) च परन्-तप ।
कर्माणि प्रविभक्तानि, स्वभाव-प्रभवैर्-गुणैः ॥४१।१८।४१॥
हे परंतप! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंके तथा शूद्रोंके कर्म स्वभावसे उत्पन्न गुणोंद्वारा विभक्त किये गये हैं।
शमो दमस्-तपः(श्) शौचं(ङ्), क्षान्ति-रार्जव-मेव च ।
ज्ञानं(व्ँ) विज्ञान-मास्तिक्यं (म्), ब्रह्म-कर्म स्वभावजम् ॥४२।१८।४२॥
अन्तःकरण का निग्रह करना; इन्द्रियोंका दमन करना; धर्मपालनके लिये कष्ट सहना; बाहर-भीतरसे शुद्ध रहना; शक्ति-सम्पन्न होकर भी सहनशील रहना; मन, इन्द्रिय और शरीरको सरल रखना; वेद, शास्त्र, ईश्वर और परलोक आदिमें श्रद्धा रखना; वेद-शास्त्रोंका अध्ययन-अध्यापन करना और परमात्माके तत्त्वका अनुभव करना― ये सब-के-सब ही ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्म हैं।
शौर्यं(न्) तेजो धृतिर्-दाक्ष्यं(य्ँ), युद्धे चाप्य-पलायनम् ।
दान-मीश्वर-भावश्-च, क्षात्रं(ङ्) कर्म स्वभावजम् ॥४३।१८।४३॥
शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता और युद्धमें न भागना, दान देना और स्वामिभाव― ये सब-के-सब ही क्षत्रियके स्वाभाविक कर्म हैं।
कृषि-गौरक्ष्य-वाणिज्यं(व्ँ), वैश्य-कर्म स्वभावजम् ।
परिचर्यात्मकं(ङ्) कर्म, शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥४४।१८।४४॥
खेती, गोपालन और क्रय-विक्रयरूप सत्य व्यवहार― ये वैश्यके स्वाभाविक कर्म हैं। तथा सब वर्णोंकी सेवा करना शूद्रका भी स्वाभाविक कर्म है।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः(स्), संसिद्धिं(ल्ँ) लभते नरः ।
स्वकर्म-निरतः(स्) सिद्धिं(य्ँ), यथा विन्दति तच्छृणु ॥४५।१८।४५॥
अपने-अपने स्वाभाविक कर्मोंमें तत्परतासे लगा हुआ मनुष्य भगवत्प्राप्तिरूप परम सिद्धिको प्राप्त हो जाता है। अपने स्वाभाविक कर्ममें लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकारसे कर्म करके परम सिद्धिको प्राप्त होता है, उस विधिको तू सुन।
यतः(फ्) प्रवृत्तिर्-भूतानां(य्ँ), येन सर्वमिदं(न्) ततम् ।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य, सिद्धिं(व्ँ) विन्दति मानवः ॥४६।१८।४६॥
जिस परमेश्वरसे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत् व्याप्त है, उस परमेश्वरकी अपने स्वाभाविक कर्मोंद्वारा पूजा करके मनुष्य परमसिद्धिको प्राप्त हो जाता है।
श्रेयान्-स्वधर्मो विगुणः(फ्), परधर्मात् स्वनुष्ठितात् ।
स्वभाव-नियतं(ङ्) कर्म, कुर्वन्-नाप्नोति किल्बिषम् ॥४७।१८।४७॥
अच्छी प्रकार आचरण किये हुए दूसरेके धर्मसे गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है; क्योंकि स्वभावसे नियत किये हुए स्वधर्मरूप कर्मको करता हुआ मनुष्य पापको नहीं प्राप्त होता।
सहजं(ङ्) कर्म कौन्तेय, सदोष-मपि न त्यजेत् ।
सर्वारम्भा हि दोषेण, धूमेनाग्नि-रिवावृताः ॥४८।१८।४८॥
अतएव हे कुन्तीपुत्र! दोषयुक्त होनेपर भी सहज कर्मको नहीं त्यागना चाहिये, क्योंकि धूएँसे अग्निकी भाँति सभी कर्म किसी-न-किसी दोषसे युक्त हैं।
असक्त-बुद्धिः(स्) सर्वत्र, जितात्मा विगत-स्पृहः ।
नैष्कर्म्य-सिद्धिं(म्) परमां(म्), सन्न्यासे-नाधि-गच्छति ॥४९।१८।४९॥
सर्वत्र आसक्तिरहित बुद्धिवाला, स्पृहारहित और जीते हुए अन्तःकरणवाला पुरुष सांख्य-योगके द्वारा उस परम नैष्कर्म्यसिद्धिको प्राप्त होता है।
यदहङ्कार-माश्रित्य, न योत्स्य इति मन्यसे ।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते, प्रकृतिस्-त्वां(न्) नियोक्ष्यति ॥५०।१८।५९॥
जो तू अहंकारका आश्रय लेकर यह मान रहा है कि ‘मैं युद्ध नहीं करूँगा’ तो तेरा यह निश्चय मिथ्या है; क्योंकि तेरा स्वभाव तुझे जबर्दस्ती युद्धमें लगा देगा।
स्वभावजेन कौन्तेय, निबद्धः(स्) स्वेन कर्मणा ।
कर्तुं(न्) नेच्छसि यन्-मोहात्, करिष्यस्य-वशोऽपि तत् ॥५१।१८।६०॥
हे कुन्तीपुत्र! जिस कर्मको तू मोहके कारण करना नहीं चाहता, उसको भी अपने पूर्वकृत स्वाभाविक कर्मसे बँधा हुआ परवश होकर करेगा।
ईश्वरः(स्) सर्व-भूतानां(म्), हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन्-सर्व-भूतानि, यन्त्रा-रूढानि मायया ॥५२।१८।६१॥
हे अर्जुन! शरीररूप यन्त्रमें आरूढ़ हुए सम्पूर्ण प्राणियोंको अन्तर्यामी परमेश्वर अपनी शक्तिसे उनके कर्मोंके अनुसार भ्रमण कराता हुआ सब प्राणियोंके हृदय में स्थित है।
तमेव शरणं(ङ्) गच्छ, सर्व-भावेन भारत ।
तत्-प्रसादात् परां(म्) शान्तिं(म्), स्थानं(म्) प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥५३।१८।६२॥
हे भारत! तू सब प्रकारसे उस परमेश्वरकी ही शरणमें जा। उस परमात्माकी कृपासे ही तू परम शान्तिको तथा सनातन परमधामको प्राप्त होगा।
इति ते ज्ञान-माख्यातं(ङ्), गुह्याद्-गुह्यतरं(म्) मया ।
विमृश्यै-तदशेषेण, यथेच्छसि तथा कुरु ॥५४।१८।६३॥
इस प्रकार यह गोपनीयसे भी अति गोपनीय ज्ञान मैंने तुमसे कह दिया। अब तू इस रहस्ययुक्त ज्ञानको पूर्णतया भलीभाँति विचारकर, जैसे चाहता है वैसे ही कर।
कच्चि-देतच्-छ्रुतं(म्) पार्थ, त्वयैकाग्रेण चेतसा ।
कच्चि-दज्ञान-सम्मोहः(फ्), प्रनष्टस्-ते धनञ्जय ॥५५।१८।७२॥
हे पार्थ! क्या इस (गीताशास्त्र)― को तूने एकाग्रचित्तसे श्रवण किया? और हे धनंजय! क्या तेरा अज्ञानजनित मोह नष्ट हो गया?
अर्जुन उवाच
नष्टो मोहः(स्) स्मृतिर्-लब्धा, त्वत्-प्रसादान्-मयाच्युत ।
स्थितोऽस्मि गत-सन्देहः(ख्), करिष्ये वचनं(न्) तव ॥५६।१८।७३॥
अर्जुन बोले― हे अच्युत! आपकी कृपासे मेरा मोह नष्ट हो गया और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है, अब मैं संशयरहित होकर स्थित हूँ, अतः आपकी आज्ञाका पालन करूँगा।
सञ्जय उवाच
इत्यहं(व्ँ) वासुदेवस्य, पार्थस्य च महात्मनः ।
संवाद-मिम-मश्रौषम्, अद्भुतं(म्) रोम-हर्षणम् ॥५७।१८।७४॥
संजय बोले― इस प्रकार मैंने श्रीवासुदेवके और महात्मा अर्जुनके इस अद्भुत रहस्ययुक्त, रोमाञ्चकारक संवादको सुना।
व्यास-प्रसादाच्-छ्रुतवान्, एतद्-गुह्य-महं(म्) परम् ।
योगं(य्ँ) योगेश्वरात्-कृष्णात्, साक्षात् कथयतः(स्) स्वयम् ॥५८।१८।७५॥
श्रीव्यासजीकी कृपासे मैंने इस परम गोपनीय योगको अर्जुनके प्रति कहते हुए स्वयं योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्णसे प्रत्यक्ष सुना।
यत्र योगेश्वरः(ख्) कृष्णो, यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्-विजयो भूतिर्,-ध्रुवा नीतिर्-मतिर्-मम ॥५९।१८।७८॥
हे राजन्! जहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीव-धनुषधारी अर्जुन हैं, वहींपर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है― ऐसा मेरा मत है।
॥इति श्रीमद्भगवद्गीतायां अथाष्टादशोऽध्यायः॥
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