महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के अमर वाक्य

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के 
अमर वाक्य

संकलनकर्ता : - आर्य दीपक टेलर
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भारत के परिवर्तन क्रांति की नींव
रखने वाले
महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के
अमर वाक्य
दयानन्दसरस्वती

॥ ओ३म् ॥

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी 
200
1824-2024 वीं 
जयन्ती 
के अवसर पर सप्रेम भेंट

भारत के परिवर्तन क्रांति की नींव रखने वाले 
महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के 
अमर वाक्य

॥ ओ३म् ॥

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के वे अमर वाक्य,
जिन्होंने आधुनिक भारत के निर्माण एवं हर क्षेत्र में
परिवर्तन क्रान्ति की आधारशिला रखी

भूमिका

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी, भारत की परिवर्तन क्रान्ति के मूल सूत्रधार थे, उन्होंने भारत के अशिक्षा और अंधकार के काल से हमें निकालने का महान कार्य सम्पन्न किया। हमारे भारत के सांस्कृतिक, धार्मिक, सामाजिक और राजनैतिक अंधियारों को चीरकर हमें एक नई सोच प्रदान की।

उनका लिखा एक-एक वाक्य, उनका एक-एक कथन उस काल में भारत की परिवर्तन क्रान्ति का सूत्रधार और आधार वाक्य बन गया।

इस पुस्तक में महर्षि के अमर वाक्यों का संग्रह प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है, उनको धैर्य से पढ़ने का आप कष्ट करें, ऐसा हमारा निवेदन है। आप दयानन्द के अन्दर चल रहे मनोभावों का अनुभव कर सकेंगे। हमें पूर्ण विश्वास है कि महर्षि दयानन्द जी के लिखे, उनके जीवन, उनके कार्यों और उनके द्वारा किए गए परिवर्तन क्रान्ति की गहराई को आप स्वयं अनुभव करेंगे।

हम आशा करते हैं कि महर्षि दयानन्द सरस्वती जी की 200वीं जयन्ती के अवसर पर यह एक विशिष्ट उपहार होगा।

इसमें पांच भाग हैं –

1. महर्षि द्वारा लिखे गए अथवा कहे गए परिवर्तन के सूत्रधार वचन ।

2. महर्षि दयानन्द जी के व्यक्तित्व को प्रदर्शित करते हुए उनके वचन ।

3. महर्षि के जीवन की प्रेरक घटनाओं में कहे गये वचन

4. महर्षि की आदर्श दिनचर्या

5. महर्षि के प्रति कुछ समकालीन लोगों के भाव-विचार

प्रत्येक वाक्य को आप 150 वर्ष पूर्व लिखे वाक्य के रूप में देखेंगे तो आपको महर्षि दयानन्द जी का अदभुत चिंतन दृष्टिगोचर होगा।


“हमारा शरीर बहुत देर तक नहीं रहेगा। 
आप आजीवन हमारी पुस्तकों से उपदेश लेते रहना। 
जहां तक बन पड़े अपने भूले-भटके भाईयों को 
भी सन्मार्ग दिखलाते रहना।”

महर्षि दयानन्द सरस्वती

मान्यवर,

          सादर नमस्ते।

भारत वर्ष का इतिहास विश्वभर में सबसे प्राचीन इतिहास है। सृष्टि की उत्पत्ति, आर्यो का ज्ञान विस्तार, राज्य विस्तार, विश्वगुरु बनना, शक्तिशाली राष्ट्र बनना, सम्पन्नता पूर्ण स्थान होना, वैभवशाली जीवन होना, महाभारत युद्ध होना, विनाश का दौर, भारत का गरीब और गुलाम होना, पराधीनता का लम्बाकाल, फिर से आजाद होना और आज फिर से विश्वगुरु बनने का सपना देखना, लगभग ऐसा ही इतिहास रहा है भारत भूमि का।

लम्बे इतिहास में न जाकर हम गुलाम भारत से, अशिक्षित, गरीब और अंधविश्वासों में घिर चुके भारत तथा महर्षि दयानन्द जी के जीवन और कार्यों का गम्भीरता एवं गहराई से अध्ययन करना होगा। महर्षि आधुनिक भारत के उन महापरुषों में अग्रणी हैं, जिन्होंने भारत के प्राचीन वैभव को और इतिहास को बताते हुए हम भारतवासियों के सोते हुए स्वाभिमान को जगाया तथा पुनः उसी गौरवशाली भारत के निर्माण की इच्छाशक्ति पैदा की। महर्षि ने उस हर विषय को छुआ जिसके कारण हम गुलाम थे, हर उस विषय को बेबाकी से सबके सामने रखा जो हमें पुनः विश्वगुरु बना सकता था। आज हर नौजवान को, जो थोड़ी सी भी इच्छा रखता है भारत के इस परिवर्तन क्रान्ति के इतिहास को जानने के लिए, उसको महर्षि को पढ़ना चाहिए, किन्तु एक छोटी सी बाधा आती है, समय और इच्छाशक्ति की, महर्षि ने छोटे-बड़े ग्रन्थ मिलाकर हजारों पृष्ठों का लेखन किया है। उन सबको पढ़ना अत्यंत कठिन है, अतः उन सब ग्रंथों से कुछ चुने हुए मोती निकालकर एक माला बनाने का प्रयास किया है ताकि महर्षि की सोच, विचार, चिन्ता और चिन्तन क्या था? ये हम सबकी जानकारी में आसानी से आ जाए, उनके कहे गए वाक्यों को पढ़कर आप देखेंगे कि शायद ही कोई विषय ऐसा छूटा हो, जिस पर महर्षि की दृष्टि न गई हो। वास्तव में ये ही वाक्य भारत के परिवर्तन की क्रान्ति की नींव बने। इन वाक्यों को पढ़कर महर्षि के ग्रन्थों को पढ़ने की इच्छा और अधिक प्रबल हो जाए, तब तो ये प्रयास सार्थक होगा। अपनी चर्चा में आप इन वाक्यों का उपयोग करें तो ये बातें सहज ही लाखों लोगों तक पहुंच सकती हैं। यदि हम लाखों लोगों तक महर्षि के विचारों को पहुंचा सके तो हमारा उनका २००वां जयंती वर्ष मनाना सार्थक होगा।

आभार
विनय आर्य
महामंत्री
दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा

नोटः- आप इस ग्रन्थ के वाक्यों को सोशल मीडिया के माध्यम से भी प्रचारित कर सकते हैं।

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी का संक्षिप्त परिचय

जन्म– 12 फरवरी 1824 टंकारा (गुजरात)
पिता का नाम– करसन जी तिवारी
माता का नाम– अमृतबाई
जन्मना कुल– ब्राह्मण
बाल्यकाल का नाम– मूल शंकर
व्यक्तित्व– 6 फुट 9 इंच लंबाई, गौरवर्ण
बोध दिवस– शिवरात्रि पर्व
शिक्षा गुरू– स्वामी विरजानन्द दंडी
शिक्षा स्थली– मथुरा (उत्तर प्रदेश)
निर्वाण– दीपावली 30 अक्तूबर 1883, अजमेर (राजस्थान)

वेद पढ़ने का सबका अधिकार

महर्षि के आने से पूर्व ईश्वरीय वेद को पढ़ने के द्वार नारी, दलित आदि वर्गों के लिए बन्द कर दिए गए थे, महर्षि ने इसको दुर्दशा का बड़ा कारण मानकर स्पष्ट घोषणा की –

“वेदादि शास्त्रों के पढ़ने पढ़ाने, सुनने और सुनाने का अधिकार सब का है। 
क्योंकि, जो ईश्वर की सृष्टि है, उस में किसी का अनधिकार नहीं हो सकता।”

- ऋग्वेदादि अधिकारानधिकारविषयः २५९

आज हर कोई वेद पढ़ सकता है, चाहे नारी हो या किसी भी जन्मना जाति का व्यक्ति।

01

‘स्वदेशी’ राज्य सर्वोपरि और उत्तम

1857 के सैनिक विद्रोह के पश्चात महारानी विक्टोरिया ने भारतीयों के अंग्रेजों के प्रति क्रोध को कम करने के लिए, बिना भेदभाव का शासन देने और माता-पिता समान भारत की प्रजा को सुख देने जैसी घोषणाएं की और पढ़े-लिखे वर्ग की सहानुभूति महारानी के साथ होने लगी, तब प्रवाह को उलट देने वाला महर्षि दयानन्द का क्रान्तिकारी वाक्य :-

“कोई कितना ही करे परन्तु जो स्वदेशीय राज्य होता है, वह सर्वोपरि उत्तम होता है। अथवा मत मतान्तर के आग्रहरहित, अपने और पराये का पक्षपात शून्य, प्रजा पर पिता-माता के समान, न्याय और दया के साथ विदेशियों का राज्य भी पूर्ण सुखदायक नहीं है।”

- सत्यार्थ प्रकाश

02

‘स्वदेशी’ और स्वराज्य

“परदेशी स्वदेश में व्यवहार वा राज्य करें तो बिना 
दारिद्रय और दुःख के दूसरा कुछ भी नहीं हो सकता।”

- सत्यार्थ प्रकाश

इतिहास साक्षी है कि आधुनिक युग में स्वदेशी शब्द का उपयोग इसी वाक्य से आरम्भ हुआ। जिसने आने वाले समय के क्रान्तिकारी आन्दोलन की शानदार नींव रखी। आगे चलकर स्वदेशी और स्वराज के आन्दोलन का जन्म हुआ।

03

मनुष्य सबसे विद्या ग्रहण करे

महर्षि दयानन्द विद्या की प्राप्ति को मनुष्य की सर्वाधिक उन्नति का कारण मानते हैं और कैसे भी कहीं से भी विद्या मिले, ग्रहण करने की आज्ञा देते हैं –

“विष से भी अमृत का ग्रहण करना चाहिए। 
बालक से भी उत्तम वचन को ले लेना चाहिए।”

- संस्कारविधि

04

मानव देह ही सबसे उत्तम है

महर्षि मनुष्य को सबसे उत्तम कहकर अन्यों पर उपकार करने की अपेक्षा करते हैं –

“जितने प्राणी देहधारी जगत् में हैं उनमें से मनुष्य ही उत्तम हैं, 
इससे वे ही उपकार और अनुपकार को जानने के योग्य हैं।”

- ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका

05

विवाह में जन्म कुंडली मिलाना हानिकारक

महर्षि का कहना है कि जन्मपत्री के मिलान से नहीं बल्कि गुण-कर्म-स्वभाव के मिलान से ही विवाह सम्बन्ध का सुख व शान्ति से चलना सम्भव है –

प्रश्न– जो जन्मपत्र देख के विवाह करते हैं सो बात सत्य है वा मिथ्या? 
उत्तर– “यह बात मिथ्या ही है, क्योंकि जन्मपत्र को तो मिलाते हैं 
परन्तु उनके स्वभाव, गुण, आयु और बल को न मिलाने से सदा 
क्लेश ही होता है, इसलिए वह बात मिथ्या ही है। जन्मपत्र मिलाने 
को बुद्धिमान् लोग सत्य कभी न जानें।”

- सत्यार्थ प्रकाश

06

जन्मपत्री/कुण्डली अनुचित है

“सारे महाभारत में एक स्थान पर भी ‘जन्म पत्रिका’ का वर्णन नहीं आया है। इससे सिद्ध होता है कि फलित ज्योतिष की जड़ कहीं भी आर्ष विद्या में नहीं है।”

- सत्यार्थ प्रकाश

07

विवाह करने का नियम

गुण-कर्म और आपस के स्वभाव मिलाकर विवाह करने से ही गृहस्थ सुख है।

“भला जो पुरुष विद्वान् और स्त्री अविदुषी और स्त्री विदुषी और पुरुष 
 अविद्वान् हो तो नित्य प्रति देवासुर संग्राम घर में मचा रहे फिर सुख कहाँ।”

- सत्यार्थ प्रकाश समु० ३

शब्दार्थ : विदुषी - समझदार, पढ़ी-लिखी महिला।

08

कन्या का विवाह कहां करें?

वे कन्याओं को दूर देश – यानि दूरी के स्थान पर विवाह करने के पक्ष में हैं –

“कन्या का नाम दुहिता इस कारण से है कि विवाह दूर देश में होने से हितकारी होता है निकट रहने से नहीं।”

- सत्यार्थ प्रकाश समु० ४

09

विवाह के लिए लड़का-लड़की की प्रसन्नता आवश्यक

आधुनिक सोच का इससे बड़ा प्रमाण कौन सा हो सकता है। वे चाहते हैं जन्मपत्री से नहीं पिता-माता की इच्छामात्र से नहीं किन्तु प्राचीन रीति स्वयंवर जैसी उत्तम रीति से विवाह हो तो गृहस्थ उत्तम हो –

“विवाह करना लड़का, लड़की के आधीन होना उत्तम है। जो माता-पिता विवाह करना कभी विचारें तो भी लड़का लड़की की प्रसन्नता के बिना न होना चाहिये क्योंकि एक दूसरे की प्रसन्नता से विवाह होने में विरोध बहुत कम होता है और संतान उत्तम होते हैं।”

- सत्यार्थ प्रकाश समु० ४

10

सबसे उत्तम आश्रम कौन सा?

संन्यासी लोगों को संसार छोड़ने का उपदेश देते और कई तो गृहस्थ को नर्क का द्वार तक बता देते थे, महर्षि इससे दुखी होकर लिखते हैं –

“जो कोई गृहाश्रम की निंदा करता है वह निन्दनीय है और जो प्रशंसा करता है वही प्रशंसनीय है।”

- (सत्यार्थ प्रकाश समु० ४)

- महर्षि दयानन्द स्वयं संन्यासी थे। फिर भी उन्होंने गृहाश्रम को महान इसलिये बताया था कि वही सब आश्रमों का आधार है

11

गृहस्थों के लिए उपदेश

स्त्री की प्रसन्नता से ही गृहस्थ की सफलता

“हे गृहस्थों! जिस कुल में भार्या से प्रसन्न पति और पति से भार्या सदा प्रसन्न रहती है, उसी कुल में निश्चित कल्याण होता है और दोनों परस्पर अप्रसन्न रहें तो उस कुल में नित्य कलह वास करता है।”

- सत्यार्थ प्रकाश

शब्दार्थ : भार्या - पत्नी

12

पैसे का सदुपयोग किसमें

गृहस्थ व्यक्तियों को धन के सदुपयोग करने का स्पष्ट निर्देश –

“सर्वदा सन्तानों की शिक्षा में धन का व्यय करे, 
किन्तु विवाह, मृत्यु आदि में न करे।”

- पत्र व्यवहार

आज के दिखावे के युग में कितना महत्वपूर्ण है ये।

13

गृहस्थी कभी निराश न हों

आजकल घर-घर में धन को लेकर वैर और क्लेश हो जाते हैं, लोग आत्म हत्याएं तक कर लेते हैं, गृहस्थ धर्म में कभी निराश न होने का महर्षि कितना सुन्दर संदेश दे रहे हैं –

“गृहस्थ लोग कभी प्रथम पुष्कल धनी होके पश्चात् दरिद्र हो जाएं, 
उससे अपने आत्मा का अवमान न करें कि ‘हाय हम निर्धनी हो गए’ 
इत्यादि विलाप न करें, किन्तु मृत्युपर्यन्त लक्ष्मी की उन्नति में 
पुरुषार्थ किया करें और लक्ष्मी को दुर्लभ न समझें।”

- संस्कारविधि

शब्दार्थ : प्रथम - पहले, पुष्कल - पर्याप्त, अवमान - कष्ट, विलाप - दुःखी होना

14

गृहस्थ कैसे सफल हों?

गृहस्थ में दोनों की परस्पर प्रीति को ही सफलता का कारण मानते हैं – दयानन्द

अप्रीति :- परस्पर प्रीति के बिना न गृहाश्रम का निश्चित सुख, न 
उत्तम सन्तान और न प्रतिष्ठा वा लक्ष्मी आदि श्रेष्ठ 
पदार्थों की प्राप्ति कभी होती है।

- महर्षि दयानन्द के पत्र व्यवहार

- ये सुख का सबसे महत्वपूर्ण साधन है।

15

पति पत्नी को दुःख कब होता है?

आत्मवत् :- जैसे किसी की स्त्री दूसरे पुरुष से प्रसिद्ध वा अप्रसिद्ध प्रीति करे तो उसके पति को कितना बड़ा क्लेश होता है। इसी प्रकार पति के पर-स्त्री वा वेश्या गमन से पत्नी को महादुःख होता है।

- ऋषि दयानन्द पत्र विज्ञापन भाग-2

16

समान गोत्र में विवाह करना उचित नहीं?

महर्षि दयानन्द आयुर्वेद (चिकित्सा विज्ञान) के आधार पर कहते हैं 
कि एक ही गोत्र में विवाह नहीं होना चाहिए, उनके शब्दों में देखें –

“अपने सगोत्र में विवाह करने से दोष क्यों है कि इससे शरीर, आत्मा, प्रेम, बल आदि की उन्नति यथावत् नहीं होती, इसीलिए भिन्न-भिन्न गोत्रों में ही विवाह-सम्बन्ध करना उचित है।”

- महर्षि दयानन्द के पत्र व्यवहार

आज का आधुनिक विज्ञान भी इस तथ्य को ज्यों का त्यों स्वीकार करता है।

17

बाल विवाह का प्रबल विरोध

बाल विवाहों का विरोध तो महर्षि के पूर्व भी होता रहा था, किन्तु व्यावहारिक रूप में और धार्मिक आधार देकर आन्दोलन के रूप में ये बात सर्वप्रथम महर्षि ने ही उठाई। इसके पीछे का आधार वेद एवं वेद आधारित ‘मनुस्मृति’ का सन्दर्भ देकर उन्होंने कहा –

“विवाह के समय पुरुष की आयु (कम से कम) 24 वर्ष और स्त्री की आयु (कम से कम) 16 वर्ष होनी चाहिए। विवाह के समय स्त्री-पुरुष इससे कम वय परिमाण के कदापि न हों।

- सर्वश्रेष्ठ प्रवचन

- महर्षि दयानन्द के शिष्य चांदकरण शारदा जी ने ही बाल विवाह को निषेध करने वाला कानून बनवाया जो ‘शारदा एक्ट’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। महिला की न्यूनतम आयु अब बढ़ाकर 18 वर्ष कर दी गई है।

18

स्त्री-पुरुष विवाह किससे और कैसे करें?

महर्षि दयानन्द विवाह को बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं। वे चाहते हैं कि स्त्री और पुरुष परस्पर एक-दूसरे से मिलकर, समझकर ही विवाह को निश्चित करें केवल माता-पिता के कह देने मात्र से नहीं और केवल आकर्षण से नहीं। क्या कभी हमने सोचा है कि दयानन्द इतने आधुनिक हैं? क्या 19वीं सदी में 
ये बात लिख देना सरल था?

“विवाह स्त्री तथा पुरुष को अपनी रुचि के अनुसार करना चाहिए क्योंकि पुरुष को स्त्री से और स्त्री को पुरुष से सारे जीवन भर निभाव करना पड़ता है। जब वे अपनी रुचि के अनुसार एक दूसरे के रूप, आकार, प्रकार और चाल-चलन तथा अन्य विषयों को देख लेंगे तो फिर सम्भव नहीं कि स्त्री और पुरुष में परस्पर झगड़े की कोई अवस्था उत्पन्न हो। नहीं तो (केवल) माता और पिता का पसन्द किया हुआ सम्बन्ध स्त्री तथा पुरुष को कब पसन्द हो सकता है?”

- पत्र-व्यवहार

19

बालविवाह से हानि

लोग १०.१० वर्ष के बालक और बालिकाओं का विवाह कर देते हैं। जो समय उनकी शिक्षा का होता है। वे सदा मूर्ख रहते हैं और जन्मभर अपने माता-पिता को कोसते रहते हैं। ऐसे विवाहित बालकों से क्या उपकार हो सकता है?

- मैं दयानन्द बोल रहा हूं

20

विवाह में स्त्री की पसन्द सर्वोपरी

स्वयंवर का प्रचलन :- प्राचीन आर्य लोगों में स्वयंवर होता था अर्थात् कन्या स्वयं अपना वर पसन्द कर लेती थी। किन्तु इस समय के अनुसार विवाह नहीं होता था।

- पूना. प्रव. उपदेश मंजरी

21

जन्मपत्री का कोई आधार नहीं है

जन्मपत्री बनवाना एक बहुत बड़ी रूढी और अंधविश्वास रहा है, आज 
भी कुछ हद तक तो है किंतु उस काल में इतने बड़े वर्ग के सामने 
इसका स्पष्ट विरोध करना......

“यह जन्मपत्र नहीं प्रत्युत शोकपत्र है। पण्डित सब किसी को खोटी दशा के जप करने के लिए अवश्य कुछ न कुछ बतलाता है। बुद्धिमान् व्यक्ति ऐसी बातों को नहीं माना करते।”

- सर्वश्रेष्ठ प्रवचन

22

जन्मपत्री है या शोकपत्री

“वह जन्म-पत्र नहीं किन्तु उसका नाम ‘शोक-पत्र’ रखना चाहिये क्योंकि 
जब सन्तान का जन्म होता है तब सबको आनन्द होता है। परन्तु वह आनन्द 
तब तक होता है कि जब तक जन्म-पत्र बन के ग्रहों का फल न सुनें।”

- सत्यार्थ प्रकाश

23

एक विवाह करना ही उत्तम

“द्विजो में स्त्री और पुरुष का एक ही बार विवाह होना वेदादि शास्त्रों 
में लिखा है, द्वितीय बार नहीं।”

- (सत्यार्थ प्रकाश समु० ४)

24

विधवा विवाह का समर्थन एवं बहुपत्नी का विरोध

विधवा विवाह के लिए समाज में बात करना भी एक बड़े साहस का काम था और बहुपत्नी प्रथा समाज के उच्च वर्ग में आम सी हो रही थी, महर्षि ने इन दोनों के विरुद्ध अपनी स्पष्ट और मजबूत बात रखी –

“विधवा स्त्री का पुनर्विवाह होना चाहिए और पुरुष अपनी स्त्री के जीवित रहते हुए दूसरे विवाह का पात्र नहीं, परन्तु उसकी मृत्यु के पश्चात् उसका अधिकार है कि वह पुनः विवाह चाहे करे व न करे। ऐसा ही अधिकार विधवा स्त्री को भी होना चाहिए।”

- श्रीमद्दयानन्द प्रकाश

25

पुनर्विवाह क्या स्त्री भी करे?

विधवाओं की अवस्था पर दुःखी दयानन्द पुनर्विवाह की व्यवस्था की मजबूत वकालत करते हुए, समाधान भी तर्क के साथ देते हैं –

स्त्रियों का पुनर्विवाह :- ईश्वर के समीप स्त्री-पुरुष दोनों बराबर हैं। क्योंकि वह न्यायकारी है, उसमें पक्षपात का लेश नहीं है। जब पुरुषों को पुनर्विवाह करने की आज्ञा दी जावे तो स्त्रियों को क्यों रोका जावे?

- पूना प्रव. (उपदेश मंजरी)

- महर्षि की बात पर आगे चलकर विधवा विवाह का 
जो सामजिक आन्दोलन उनके हजारों शिष्यों ने चलाया वो 
अपने आप में एक मिसाल बन गया। ये भारत के ग्रामीण एवं 
शहरी सामाजिक ढ़ांचे में क्रान्तिकारी परिवर्तन करने में अग्रणी रहा।

26

पर्दा प्रथा के सर्वथा विरोधी दयानन्द

पर्दा प्रथा से स्त्रियों का जीवन कैसा होता होगा, एक बार सहसा कल्पना करें, क्या इन रूढ़ियों को तोड़ना आसान था? पर दयानन्द ने इसके कारणों को बताकर, आज भी इसको मानने वालों पर गहरी चोट करते हुए लिखा –

“स्त्रियों को परदे में रखना आजन्म कारागार में डालना है। जब उनको विद्या होगी वह स्वयं अपनी विद्या के द्वारा बुद्धिमती होकर प्रत्येक प्रकार के दोषों से रहित और पवित्र रह सकती हैं। परदे में रहने से सतीत्वरक्षा नहीं कर सकतीं और न बिना विद्या प्राप्ति के बुद्धिमती हो सकती हैं। और परदे में रखने की यह प्रथा इस प्रकार प्रचलित हुई कि इस देश के शासक मुसलमान हुए तो उन्होंने शासन की शक्ति से जिस किसी की बहू-बेटी को अच्छी रूपवती देखा उसको अपने शासनाधिकार से बलात् छीन लिया और दासी बना लिया। उस समय हिन्दू विवश थे, इस कारण उनमें सामना करने की सामर्थ्य न थी। इसलिए अपने सम्मान की रक्षा के लिए उन्होंने अपनी स्त्रियों और बहू-बेटियों को घर से बाहर जाने का निषेध कर दिया। सो मूर्खों ने उसको पूर्वजों का आचार समझ लिया।” 

- महर्षि दयानन्द के पत्र व्यवहार

- आज यह प्रथा कम से कम हिन्दू समाज में तो समाप्त प्राय है। 
बाकी समुदाय भी इस पर विचार करें।

शब्दार्थ : आचार - आचरण

27

स्त्री सम्मान से ही कल्याण

जिस काल में महिलाओं को निम्न स्तर का मानकर पीटा जाना, पर्दे में रखना और सती करके जला देने को धर्म का भाग माना जा रहा था, 
तब महर्षि लिखते हैं :-

“पिता, भ्राता, पति और देवर को योग्य है कि अपनी कन्या, बहिन, स्त्री और भौजाई आदि स्त्रियों की सदा पूजा करें, अर्थात् यथायोग्य मधुर भाषण, भोजन, वस्त्र, आभूषण आदि से प्रसन्न रखें, जिनको कल्याण की इच्छा हो, वे स्त्रियों को क्लेश कभी न देवें।”

- संस्कारविधि

शब्दार्थ : भौजाई - भाभी, क्लेश - दुःख

28

यज्ञ क्या है?

“जो अग्निहोत्र से लेकर अश्वमेध पर्यन्त जो शिल्प व्यवहार पदार्थ विज्ञान सब जगत् के उपकार के लिये किया जाता है, विद्वानों का सत्संग, सत्कार तथा प्रत्येक परोपकारी श्रेष्ठ कर्म यज्ञ कहाता है।”

- सत्यार्थ प्रकाश विमर्श

29

पर्यावरण शुद्धि हेतु यज्ञ

महर्षि दयानन्द, पर्यावरण चक्र के सुन्दर संचालन के लिए यज्ञ को महत्वपूर्ण और विज्ञान सम्मत मानकर लिखते हैं –

“जो वायु सुगन्ध्यादि द्रव्य के परमाणुओं से युक्त होम द्वारा आकाश में चढ़ के वृष्टिजल को शुद्ध कर देता है और उससे वृष्टि भी अधिक होती है, क्योंकि होम करके नीचे गर्मी अधिक होने से जल भी ऊपर अधिक चढ़ता है। शुद्ध जल और वायु के द्वारा अन्नादि औषध भी अत्यन्त शुद्ध होती हैं।”

- सत्यार्थ प्रकाश

30

पर्यावरण शुद्धि हेतु यज्ञ का विज्ञान

पूर्व के काल में यज्ञ (हवन) को एक तान्त्रिक प्रक्रिया मात्र ही मान लिया गया था, किन्तु महर्षि दयानन्द ने यज्ञ (हवन) के विज्ञान को विस्तार से बताकर हर मनुष्य का आवश्यक कर्म बताया –

“जो सुगन्ध आदि युक्त द्रव्य अग्नि में डाला जाता है, उसके अणु अलग-अलग होके आकाश में रहते ही हैं, क्योंकि किसी द्रव्य का वस्तुता से अभाव नहीं होता। इस से वह द्रव्य दुर्गन्धादि दोषों का निवारण करने वाला अवश्य होता है। फिर उस से वायु और वृष्टिजल की शुद्धि के होने से जगत् का बड़ा उपकार और सुख अवश्य होता है। इस कारण से यज्ञ को करना ही चाहिए।”

- सत्यार्थ प्रकाश

- आज अनेक शोधों में यह सिद्ध हो चुका है कि यज्ञ पर्यावरण 
शुद्धि के लिए बेहद उपयोगी है।

शब्दार्थ : द्रव्य - सामग्री, घी, इत्यादि।

31

यज्ञ से वर्षा होने के विज्ञान को पूर्ण रूप से स्वीकार करते हैं - महर्षि

उचित वर्षा राज्य की हर प्रकार की उन्नति के लिए आवश्यक है। अतः वे राजाओं को टोने-टोटके करने की बजाय विज्ञान सम्मत यज्ञ करने की प्रेरणा दे रहे हैं ताकि समय से वर्षा हो और राज्य की उन्नति –

“आरोग्य और अधिक वर्षा होने के लिए एक वर्ष में (10000) दश हजार रूपये के घृतादि का जिस रीति से होम हुआ था उसी रीति से प्रतिवर्ष होम कराइए। परन्तु उनमें से 5000 पांच हजार रूपयों के सुगन्धित घृत मोहन भोग का होम वर्षा ही में कि जिस दिन वर्षा का आर्द्रा नक्षत्र लगे उस दिन से लेके विजय दशमी तक चारों वेदों के ब्राह्मणों का वरण करा एक सुपरीक्षित धार्मिक पुरुष उन पर रख के होम कराइयेगा।” 

- पत्र व्यवहार

- आज अनेक अनुसंधानों से यज्ञ से वर्षा होना सिद्ध हुआ है।

32

बलिप्रथा के निवारण हेतु राजा से निवेदन

बलिप्रथा उस जमाने में चरम पर थी। महर्षि उसको समाप्त करने के पक्ष में थे। वे राजा से कानून बनवाना चाहते थे और उनके समक्ष वे 
एक याचक की भूमिका में आते हुए कहते हैं -

“आप राजा हैं, न्यायासन पर विराजमान हैं। मैं निर्दोष पशुओं का वकील बनकर आपके समक्ष अभियोग लेकर उपस्थित हुआ हूँ। देवता के नाम पर इन मूक पशुओं को मारने का क्या औचित्य है?”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-२)

33

समुद्र व अन्तरिक्षय वायुयान निर्माण प्रेरणा

एक सौ पचास वर्ष पूर्व प्राचीन काल के वैभवशाली भारत के विज्ञान को पुनः भारत में लाने की इच्छा से वेद के ज्ञान या विद्या के विज्ञान को आगे बढ़ाने हेतु महर्षि दयानन्द की सोच :-

“जिन यानों में बैठ के समुद्र और अन्तरिक्ष में निरन्तर स्वस्ति अर्थात् नित्य सुख बढ़ता है……… वैश्य लोग तथा शिल्पविद्या का स्वामी इस को अवश्य ग्रहण करे, क्योंकि इन यानों के बिना दीपान्तर में जाना आना कठिन हैं। यह यान किस प्रकार का बनाना चाहिए कि जिस में तीन पहिये हों, जिन से वह जल और पृथिवी के ऊपर चलाया जाय।”

- ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका

- जब विमानों की दूर-दूर तक कल्पना नहीं थी तब विमान का उपयोग, आवश्यकता और निर्माण का इतना सटीक सूत्र बता देना ही वैज्ञनिकता का प्रतीक है। - उन्हीं के शिष्य शिकर बापू तलपदे ने विश्व में पहली बार तीन पहिए का विमान बनाकर 1875 में उसका परिक्षण भी किया, जो प्रथम आर्यसमाज काकड़वाड़ी मुम्बई के सदस्य थे।

शब्दार्थ : शिल्प विद्या - इंजीनियरिंग

34

समुद्र यात्रा के निषेध का खंडन

उस काल में समुद्र यात्रा करना धर्म विरुद्ध मान लिया गया था, जिसके कारण हमारे व्यापार उद्योग समाप्त हो गए थे और सात समुद्र पार करके अन्य देशों में जाने वालों को जाति और धर्म से बहिष्कृत कर दिया जाता था। महर्षि ने समुद्र यात्रा के निषेध का स्पष्ट खण्डन किया –

“हे मनुष्यों, आओ, आपस में मिल के इस प्रकार के यानों को रचें, जिन से सब देश देशान्तर में हमारा जाना आना बने।”

- ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका

35

अन्त्येष्टि कर्म

मृत्यु के पश्चात् के क्रियाकर्मों को धर्म के नाम पर एक बड़े व्यवसाय का रूप दे दिया गया था, जिसके कारण गरीब आदमी अपनी जमीन जायदाद बेचकर, गिरवी रखकर भी जैसे-तैसे उसे निभाता था, परन्तु महर्षि दयानन्द मानव शरीर का अन्तिम संस्कार अग्नि समर्पण ही मानते हैं, उसके पश्चात् किए गए श्राद्ध आदि कर्म केवल दिखावा मात्र हैं।

“अन्त्येष्टि कर्म उस को कहते हैं कि जो शरीर के अन्त का संस्कार है, जिस के आगे उस शरीर के लिए कोई भी अन्य संस्कार नहीं है। इसी को नरमेध, पुरुषमेध, नरयाग, पुरुषयाग भी कहते हैं....... इस शरीर का संस्कार भस्म करने पर्यन्त है। शरीर का आरम्भ ऋतुदान और अन्त में शमशान अर्थात् मृतक कर्म है।”

- संस्कार विधि

36

देश का राजा कैसा हो?

राजे-रजवाड़ों के युग में राजा अपने को शासक और प्रजा के धन से सुख भोगने वाला मान बैठे थे। महर्षि दयानन्द के अनुसार राजा के कर्तव्य :-

“राजा उसी को कहते हैं जो शुभ गुण, कर्म, स्वभाव से प्रकाशमान, पक्षपात रहित, न्यायधर्म का सेवी, प्रजाओं में पितृवत् वर्ते और उनको पुत्रवत मान के उन की उन्नति और सुख को बढ़ाने में सदा यत्न करे।”

- स्वमन्तव्यामंतव्य प्रकाश

37

पारम्परिक धर्म को मानने वालों के लिए महर्षि की दो टूक

सामाजिक परिवर्तन और सुधारों की कड़ी में महर्षि झूठी 
परम्पराओं को धर्म नहीं मानते –

“धर्म के विषय में लोग परम्परा की बड़ी प्रतिष्ठा करते हैं, परन्तु क्या सांसारिक विषयों में भी ऐसा ही है? क्या यदि बाप दरिद्र हो तो परम्परा के अभिमान से बेटा भी दरिद्र होगा? यदि बाप अंधा हो तो क्या बेटे को भी परम्परा के लिए आंखें फोड लेनी चाहिएं?”

- पूना प्रवचन

38

नवीन विज्ञान मनुष्य का धर्म

महर्षि ज्ञान-विज्ञान की सीमा स्वीकार नहीं करते, उनका मानना है नित्य शोध से ज्ञान के नए आयाम खुलते हैं और निरन्तर ज्ञान की उन्नति करने को वे 
मनुष्य का धर्म मानते हुए लिखते हैं –

“हम मनुष्यों को उचित है कि प्रतिदिन नवीन-नवीन 
ज्ञान वा क्रिया की वृद्धि करते रहें।”

- यजुर्वेद भाष्य

39

अंग्रेजी शासन में लोकतन्त्र का उदघोष - राजा का चुनाव प्रजा द्वारा हो

जिस युग में लोकतन्त्र कहीं नहीं था- भारत में राजा-रजवाडे पैतृक परम्परा से चले आते थे - अंग्रेज महारानी भी पैतृक परम्परा से ही बनती थी उस समय महर्षि दयानन्द लोकतन्त्र की इतनी जबरदस्त वकालत करते हैं –

१. “वही राजा होने योग्य है जिसको समस्त प्रजाजन स्वीकार करें।”

- ऋग्वेद भाष्य

२. “प्रजाजनों को यह उचित है कि आपस में सम्मति कर किसी उत्कृष्ट, गुणयुक्त सभापति को राजा मान कर राज्य-पालन के लिये ‘कर’ देकर न्याय को प्राप्त हों।”

- यजुर्वेद भाष्य

शब्दार्थ : ‘कर’- टैक्स।

40

अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार से स्वदेश की उन्नति

जब सारा धर्मतन्त्र समुद्र यात्रा करने वाले को ही धर्मभ्रष्ट घोषित कर देता था, उस समय महर्षि दयानन्द अपने देश की उन्नति के लिए विदेशों से 
व्यापार करने की बात रखते हैं :-

“क्या बिना देश-देशान्तर और द्वीप-दीपान्तर में राज्य वा व्यापार किए स्वदेश की उन्नति कभी हो सकती है। जब स्वदेश ही में स्वदेशी लोग व्यवहार करते और परदेशी स्वदेश में व्यवहार वा राज्य करें तो बिना दारिद्रय और दुःख के दूसरा कुछ भी नहीं हो सकता।”

- सत्यार्थप्रकाश

संक्षेप : दयानन्द कहना चाहते हैं - हम केवल अपने ही देश में व्यापार करते हैं और परदेशी हमारे देश में आकर व्यापार और राज्य दोनों करें तो दुःख और गरीबी आएगी ही।

शब्दार्थ : दारिद्रय - गरीबी, व्यवहार - कामकाज-व्यापार

41

पशु धन के द्वारा राज्य की उन्नति

“राजपुरुषों को चाहिए कि गौ, घोड़े आदि वीर, उपकारी जीवों की कभी हत्या न करें.. गौ आदि पशु दूध आदि पदार्थों को देने से जो सबका उपकार करते हैं उससे उनकी सदैव वृद्धि करें।”

- यजुर्वेद भाष्य

42

भारत में पशु गणना सर्वप्रथम महर्षि की ही सोच थी

हमारे देश में कभी पशु गिनती नहीं होती थी। आधुनिक युग में पहली बार देश में पशुओं की जनसंख्या गिनती का निर्देश देने वाले महर्षि दयानन्द पशुधन को राज्य की उन्नति का बड़ा सहायक मानते थे, उन्होंने राजाओं को लिखे 
अपने पत्र में लिखा :-

“राज्य की सब गायों आदि की गणना करा दी जाए। प्रत्येक नया पशु जो पैदा हो (व मरे) उसकी सूचना इस कार्य के लिए नियुक्त कर्मचारी के पास भेज दी जाए। यह गणना प्रति 6 मास 7 मास बाद होनी चाहिए। इसका कारण यह है कि रात्रि आदि में असंभव नहीं कि पशु चुरा लिए जाएं।”

- पत्र व्यवहार

वर्ष 1920 में पहली बार ब्रिटिश सरकार ने भारत में पशुओं की गिनती की शुरुआत की और अब हर 5 वर्ष बाद होती है।

43

गौरक्षा अभियान के जनक दयानन्द

गौहत्या को महर्षि दयानन्द देश की अवनति का बड़ा कारण मानते थे। कहीं पुस्तक लेखन, कहीं भाषण, कहीं गौशाला खुलवाना, कहीं अंग्रेज आफिसर से अनुरोध, यहां तक कि इंग्लैंड की महारानी को भारत से दो करोड़ हस्ताक्षर करवाकर भेजने के लिए निरन्तर प्रयास कर रहे हैं। एक पत्र में वे लिखते हैं –

“गौओं का मामला बड़ी तेजी से और सबलता से आगे बढ़ रहा है। यहां बम्बई में दो हजार हस्ताक्षर गोवध-निषेध के विषय में करवाये जा रहे हैं। हम न केवल देशी राज्यों में ही गौवध बन्द कराना चाहते हैं, अपितु इस कार्य के लिए पार्लियामेण्ट से भी निवेदन करना चाहते हैं। इस कार्य के लिए हम दो करोड़ आदमियों के हस्ताक्षर चाहते हैं। मुझे यह आशा है कि राजा लोग परस्पर एक दूसरे को सम्मति देंगे।”

- पत्र व्यवहार

- दुख है असमय मृत्यु के कारण इस कार्य को वे पूर्ण नहीं कर सके, किन्तु गौ रक्षा का कार्य हजारों लोगों ने अपने हाथ में लिया। 
- एक ओर दुःख आज भी ये कार्य अधूरा है। 

44

कृषि और किसानों का देश की उन्नति में महत्व

महर्षि दयानन्द ने कृषि को राज्य (देश) की उन्नति का कारण बताया और किसान को राजाओं का भी राजा बताकर सम्बोधित किया, क्योंकि वे मानते थे कि अगर किसान समृद्ध होगा तो हम सब पृथिवी पर राज्य कर सकते हैं –

“यह बात ठीक है कि ‘राजाओं के राजा किसान’ आदि परिश्रम करने वाले हैं और राजा उनका रक्षक है।”

- सत्यार्थ प्रकाश

“जो जन भूमि के गुणों को जानने वालों की विद्या को जानके उससे उपयोग करना जानते हैं वे अत्यन्त बल को पाकर सब पृथिवी का राज्य कर सकते हैं।”

- ऋग्वेद भाष्य

- आज सब मानते हैं कि कृषि की उन्नति से ही देश की 
वास्तविक उन्नति सम्भव है।

45

निर्यातकों की रक्षा करना राजा (सरकार) का कर्तव्य

महर्षि दयानन्द देश की उन्नति में विदेश व्यापार को महत्व देते हुए राजा को व्यापारियों की सब प्रकार की सुविधा व सुरक्षा का ध्यान रखने का निर्देश देते हैं –

“जो सभा और सेना के अधिपति वाणिजों की भली भाँति रक्षा कर रथ आदि यानों में बैठाकर द्वीप-द्वीपान्तर में पहुँचातें वे बहुत धनयुक्त होकर निरन्तर सुखी होते हैं।”

- ऋग्वेद भाष्य

शब्दार्थ : वणिजों - व्यापारियों

46

निर्यातक देश-देशान्तर की भाषा सीखकर व्यापार से देश की समृद्धि बढ़ाएं

महर्षि दयानन्द देश के निर्यातकों को जो विदेश से धन भारत लाते हैं उनका सम्मान करने का निर्देश राजाओं (सरकारों) को देते हैं –

“जो विद्वान् मनुष्य वा विदुषी पण्डिता स्त्री लड़के-लड़कियों को शीघ्र विद्वान और विदुषी करते वा जो बणिये सब देशों की भाषाओं को जान के देश-देशान्तर और द्वीप - द्वीपान्तर से धन को ला ऐश्वर्ययुक्त होते हैं वे सबको सब प्रकारों से सत्कार करने योग्य हैं।”

- महर्षि दयानन्द का अर्थिक चिन्तन

- आज सरकारें बेहतर निर्यातकों को हर वर्ष सम्मानित करती हैं।

शब्दार्थ : बणिये - व्यापारी

47

सरकार कर (Tax) व्यवस्था

महर्षि दयानन्द राज्य व्यवस्था में कर प्रणाली पर अपनी बेहतर सोच प्रदान करते हुए लिखते हैं – उनकी सोच है कि ‘कर’ इतना हो जो देने वाले को कमजोर न करे और इसके लिए उनके लिखे दो उत्कृष्ट वाक्यों को देखें –

“जैसे राजा और कर्मों का कर्त्ता राजपुरुष वा प्रजाजन सुखरूप फल से युक्त होवें, वैसे विचार करके राजा तथा राजसभा राज्य में ‘कर’ स्थापन करे।”

“जैसे जोंक, बछड़ा और भ्रमरा थोड़े-थोड़े भोग्य पदार्थ को ग्रहण करते हैं, वैसे राजा प्रजा से थोड़ा-थोड़ा वार्षिक कर लेवे।”

- महर्षि दयानन्द का अर्थिक चिन्तन

48

राजा (सरकार) के लिए गुप्तचरी आवश्यक

- महर्षि, राजा (सरकार) के लिए गुप्तचरी व्यवस्था को कितना आवश्यक और महत्वपूर्ण समझते हैं उनके द्वारा सत्यार्थ प्रकाश में अंकित इन वाक्यों को देखिए :-

“कदापि किसी के साथ छल से न वर्ते किन्तु निष्कपट होकर सबसे वर्ताव रक्खे और नित्यप्रति अपनी रक्षा करके शत्रु के किये हुए छल को जानके निवृत्त करे।”

“कोई शत्रु अपने छिद्र अर्थात् निर्बलता को न जान सके और स्वयं शत्रु के छिद्रों को जानता रहे, जैसे कछुआ अपने अंगों को गुप्त रखता है, वैसे शत्रु के प्रवेश करने के छिद्र को गुप्त रखे।”

- सत्यार्थ प्रकाश

शब्दार्थ : छल - धोखा, छिद्र - कमजोरी, निवृत्त - समाप्त

49

राजा शत्रु पर विजय कैसे प्राप्त करे?

देश की सुरक्षा का उपदेश और शत्रु पर विजय पाने के गुर, साम, दाम, दण्ड, भेद के उपयोग और प्रजा की सुरक्षा का उपदेश करते निम्न वाक्य महर्षि की कूटनीतिक सोच को उजागर करते हैं –

“शत्रु को जीतने के लिये सिंह के समान पराक्रम करे, चीता के समान छिप कर शत्रुओं को पकड़े और समीप में आये बलवान् शत्रुओं से सस्सा (खरगोश) के समान दूर भाग जाय और पश्चात् उनको छल से पकड़े।”

“इस प्रकार विजय करनेवाले सभापति के राज्य में जो परिपन्थी अर्थात् डाकू-लुटेरे हों, उनको - (साम) अर्थात् मिला लेना, (दाम) कुछ देकर (भेद) फोड़-तोड़ करके वश में करें। “और जो इनसे वश में न हो तो अतिकठिन दण्ड से वश में करे।”

- सत्यार्थ प्रकाश

50

राजा डाकूओं से कैसे बचाए प्रजा को?

“जैसे धान्य का निकालने वाला छिलकों को अलगकर धान्य की रक्षा करता अर्थात् टूटने नहीं देता है, वैसे राजा, डाकू चोरों को मारे और राज्य की रक्षा करे।”

- सत्यार्थ प्रकाश

शब्दार्थ : धान्य - धान, जिस छिलके में चावल होता है।

51

राष्ट्र की उन्नति के लिए अर्थ संग्रह

राज्य (देश) की उन्नति के लिए धन सबसे अधिक आवश्यक है और राजा उसका कैसे चिन्तन करे, उसका उपदेश महर्षि की निम्न पंक्तियों में अनुभव करें –

“जैसे बगुला मच्छी पकड़ने को ध्यानावस्थित होकर ताकता है, वैसे अर्थसंग्रह का विचार किया करे, जिससे द्रव्य और बल की वृद्धि हो।”

- सत्यार्थ प्रकाश

शब्दार्थ : ताकना - गौर से देखना, अर्थ - धन, द्रव्य - धन

52

ब्रिटिश सरकार द्वारा लगाये नमक कर का सबसे पहला सार्वजनिक विरोध

भारत की गरीबी को देखकर दयानन्द अत्यन्त व्यथित थे, उन्होंने सत्यार्थ प्रकाश में नमक पर और रोटी पर कर लगाने का स्पष्ट विरोध किया- ताकि गरीब व्यक्ति अपना पेट भरने का आवश्यक कार्य निर्बाध कर सके –

“एक तो यह बात है कि नोन और पौन (रोटी) में जो कर लिया जाता है वह मुझ को अच्छा नहीं मालूम देता। क्योंकि नोन के बिना दरिद्र का भी निर्वाह नहीं होता, किन्तु सबको नोन का आवश्यक होता है और वे मजूरी मेहनत से जैसे तैसे निर्वाह करते हैं उनके ऊपर भी यह नोन का (कर) दण्ड तुल्य रहता है। गाँजा, भांग इनके ऊपर दुगुना चौगुना कर स्थापन होगा तो अच्छी बात है और लवणादि पर नहीं होना चाहिए।”

सत्यार्थप्रकाश के प्रथम संस्करण, सन 1870

महात्मा गांधी ने बहुत वर्षों बाद 1930 में नमक पर कर लगाने के विरोध स्वरूप दांडी नमक आन्दोलन किया।

- सत्यार्थ प्रकाश तत्कालीन सर्वप्रथम जागृति ग्रन्थ था।

शब्दार्थ - कर - टैक्स, नौन - नमक

53

प्राचीन राष्ट्रीय गौरव को बताते महर्षि के शानदार भाव

हम अपने प्राचीन भारत के गौरव को भुला चुके थे, जिस आर्यावर्त (भारत) को कभी सोने की चिड़िया कहा जाता था- उसकी वर्तमान दशा पर दुखी होकर दयानन्द हमें भारत के प्राचीन गौरव को स्मरण करवाते समय कितने भावपूर्ण शब्दों का उपयोग करते हैं। विदेशियों के लिखे इतिहास ने हमें अनपढ़, गंवार, बाहर से आया हुआ, यहां के सीनीय लोगों को मारने वाला बताया। दयानन्द के हमारी प्राचीन गौरवशाली इतिहास के उद्घोष से हम भारतीयों का स्वाभिमान जागा और हम सब भारत को पुनः वो सम्मान दिलवाने के युद्ध में कूद पड़े- वाक्यों की गहराई को जानें… धन्य दयानन्द।

“यह आर्यावर्त देश ऐसा है जिसके सदृश भूगोल (विश्व) में दूसरा कोई देश नहीं है। इसलिए इस भूमि का नाम सुवर्ण भूमि है, क्योंकि यही सुवर्ण आदि रत्नों को उत्पन्न करती है...जितने भूगोल में देश हैं वे सब इसी देश की प्रशंसा करते हैं और आशा रखते हैं। पारसमणि पत्थर सुना जाता है, वह बात तो झूठी है, परन्तु आर्यावर्त देश ही सच्चा पारसमणि है जिसको लोहेरूप दरिद्र विदेशी छूने के साथ ही सुवर्ण अर्थात् धनाढ्य हो जाते हैं।”

- मैं दयानन्द बोल रहा हूं (पुस्तक से)

54

सब भाषाओं की जननी संस्कृत

महर्षि दयानन्द सब भाषाओं की मूल जननी भाषा संस्कृत को ही मानते हैं और वे तर्क के साथ अपनी बात रखते हैं –

(प्रश्न) भिन्न भिन्न सब देश भाषा कैसे बन गई और किससे बनीं! 
(उत्तर)- सब देश भाषाओं का मूल संस्कृत है। संस्कृत जब बिगड़ती है। तब अपभ्रंश कहाता है। फिर अपभ्रंश से देश भाषाएं होती हैं। जैसे कि ‘घट’ शब्द से घड़ा, ‘घृत’ शब्द से घी, ‘दुग्ध’ शब्द से दूध, ‘नवीन’ शब्द से नैनू, ‘अक्षि’ शब्द से आंख, ‘कर्ण’ शब्द से कान, ‘नासिका’ शब्द से नाक, ‘जिहवा’ शब्द से जीभ, ‘मातर’ शब्द से मदर, ‘यूयं’ शब्द से यू (You) ‘वयं’ शब्द से वी (We) ‘गूढ़’ शब्द से गौड (God) इत्यादिक जान लेना।

- सत्यार्थ प्रकाश

- भाषा विज्ञानी इस बात से पूरी तरह सहमत हैं। इस विषय पर अनुसंधान भी यही परिणाम देते हैं।

55

एक भाषा हिन्दी के प्रबल समर्थक दयानन्द

उनकी यह मान्यता थी कि जो इस देश आर्यावर्त में जन्म लेकर अपनी भाषा को सीखने का परिश्रम नहीं कर सकता है, तो उससे और 
क्या आशा की जा सकती है।

भाई मेरी आँखें तो उस दिन को तरस रही हैं, जब कश्मीर से कन्याकुमारी तक सब भारतीय एक भाषा (हिंदी) को बोलने और समझने लगेंगे..... अनुवाद तो विदेशियों के लिए हुआ करता है।

- (स्वामी दयानन्द का राजनीतिक दर्शन)

56

स्वभाषा का विदेश में प्रचार के विषय में

वे राज्य में स्वभाषा के समर्थक हैं। किन्तु दुनिया के अन्य देशों से व्यवहार करने के लिए जितने रूप में अन्य भाषा सीखना आवश्यक हो, उतना जरूर सीखें पर उतने पर ही सीमित रखें –

“सदा सनातन वेद शास्त्र आर्य राज राजपुरुषों को नीति पर निश्चित रहकर इनकी उन्नति तन-मन-धन से सदा किया करें। इनसे विरुद्ध भाषाओं की प्रवृत्ति वा उन्नति न करे वा करावे। किन्तु जितना दूसरे राज्य के सम्बन्ध में यदि वे इस भाषा को न समझ सकें उतने ही के लिए उन भाषाओं का यत्न रखे, जो वह प्रबल राज्य हो।”

- पत्र व्यवहार

यहां अन्तिम पंक्ति ध्यान देने योग्य है “जो वह प्रबल राज्य हो” यानि मजबूत राज्य से ही व्यापार करने के लिए वहां की भाषा सीखें, अन्य कमजोर देशों में तो अपनी भाषा में ही बात करें। यानि उनको आपकी भाषा सीखने पर मजबूर करें।

57

हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए प्रयासरत दयानन्द –

“अबकी बार भी वेद-भाष्य के लिफाफे के ऊपर देवनागरी नहीं लिखी गई।... इसलिये तुम बाबू हरिश्चन्द्र चिन्तामणि जी से कहो कि अभी इसी पत्र को देते ही देवनागरी जानने वाला मुन्शी रख लेवें कि जो काम ठीक ठाक हो, नहीं तो वेद-भाष्य के लिफाफों पर किसी से रजिस्टर के अनुसार ग्राहकों का पता किसी देवनागरी वाले से नागरी में लिखाकर टपास लिया करें। पता हिन्दी में लिखा होगा तो डाकघरों में उसे पढ़ने वाले भी रखने पड़ेंगे।”

- (सत्यार्थ प्रकाश विमर्श)

- महर्षि की दूरगामी सोच देखिए - वे हिन्दी के प्रचार के लिए किस हद तक सोच रह हैं कि ‘यदि हम हिन्दी में पते लिखेंगे तो डाक विभाग को हिन्दी जानने वाले कर्मचारी भी रखने पड़ेंगे.” तभी हिन्दी का प्रचार आगे बढ़ेगा। 
- ऋषि दयानन्द दूर तक देख रहे थे। लोकभाषा को राजभाषा बनाने का मार्ग प्रशस्त किया जा रहा था।”

58

न्याय हर किसी के लिए होना चाहिए

स्टेम्प डयूटी बढ़ाने पर स्वामी जी का मत 

जब अंग्रेज सरकार ने न्यायालय में न्याय पाने हेतु भरे जाने वाली स्टाम्प ड्यूटी बढ़ा दी थी तब पुनः दयानन्द गरीब व्यक्ति के बड़े सहायक की भूमिका में लिखते हैं...

“सरकार कागद (स्टाम्प) बेचती है। और बहुत सा कागजों पर धन बढ़ा दिया है इससे गरीब लोगों को बहुत क्लेश पहुंचता है। सो यह बात राजा को करनी उचित नहीं क्योंकि इसके होने से बहुत गरीब लोग दुःख पाकर बैठे रहते हैं। कचहरी में बिना धन के कोई बात होती नहीं। इससे कागजों के पर जो बहुत धन लगाना है सो मुझ को अच्छा मालूम नहीं देता। इसको छोड़ने से ही प्रजा में आनन्द होता है।”

- सत्यार्थ प्रकाश

शब्दार्थ - कचहरी - न्यायालय, क्लेश - दुःख

59

महर्षि द्वारा देश प्रेम की शिक्षा

महर्षि के प्रत्येक लेखन और प्रवचन में राष्ट्र सर्वप्रथम का ही भाव रहता था, इन छोटे-छोटे से वाक्यों में उनके भीतर के प्रगाढ देश प्रेम को देखें –

“जिस देश के पदार्थों से अपना शरीर बना, अब भी पालन होता है, 
आगे होगा, उसकी उन्नति तन-मन-धन से सब जने मिलकर प्रीति से करें।”

- सत्यार्थ प्रकाश

60

शासन में एकाधिकार (तानाशाही) घातक

दयानन्द राज्य व्यवस्था में एकाधिकार के पक्षधर न होकर राजा के ऊपर एक सभा को जरूरी मानते हुए लिखते हैं –

“जो प्रजा से स्वतन्त्र स्वाधीन राजवर्ग रहे तो राजपुरुष (राष्ट्रमेव विश्याहन्ति) राज्य में प्रवेश करके प्रजा का नाश किया करें। जिस लिए अकेला राजा स्वाधीन वा उन्मत्त होके (राष्ट्री विशं घातकः) प्रजा का नाशक होता है, इसीलिए किसी एक को राज्य में स्वाधीन न करना चाहिए। जैसे- सिंह वा मांसाहारी पुष्ट पशु को मारकर खा लेते हैं, वैसे (राष्ट्रीविशमत्ति) स्वतन्त्र राजा प्रजा का नाश करता है, अर्थात् किसी को अपने से अधिक न होने देता। श्रीमान् को लूट, अन्याय से दण्ड देके अपना प्रयोजन सिद्ध करेगा।”

- सत्यार्थ प्रकाश

वर्तमान की लोकसभा-राज्यसभा, मन्त्री परिषद आदि इसके उदाहरण हैं। यानि आज लगभग ऐसी ही व्यवस्था लागू है।

61

महाभियोग की व्यवस्था

राजाओं और न्यायधीशों को भी दण्ड देने की व्यवस्था के पक्षधर हैं - 
महर्षि दयानन्द

प्रश्न- “जो राजा वा रानी अथवा न्यायाधीश व उसकी स्त्री व्यभिचारादि कुकर्म करे तो उसको कौन दण्ड देवे।

उत्तर- “सभा अर्थात् उनको तो प्रजा-पुरुषों से भी अधिक दण्ड होना चाहिए।

- सत्यार्थ प्रकाश

शब्दार्थ : सभा - आज की लोकसभा/राज्यसभा/विधानसभा

62

आर्यावर्त की (भारत की प्राचीन सीमा) बताने वाले आधुनिक युग में सर्वप्रथम दयानन्द ही थे

जब भारत का अपना विराट स्वरूप समाप्त हो चुका था और अनेक राज्य बनकर हमारा नक्शा छोटा और उसमें भी 550 रियासतों की सत्ता ने हमारी विराटता को छिन्न-भिन्न कर दिया था। तब हमारा (भारतीयो) के स्वाभिमान को जगाने और उनके प्राचीन गौरव की बात कह कर हमारे आर्यावर्त का विशाल नक्शा प्रस्तुत करने वाले आधुनिक काल के प्रथम उद्घोषक महापुरुष महर्षि दयानन्द ही थे। धन्य है, तुम्हारी सोच दयानन्द –

“उत्तर में हिमालय, दक्षिण में विन्ध्याचल, पूर्व और पश्चिम में समुद्र तथा सरस्वती पश्चिम में ‘अटक’ नदी और पूर्व में ‘दृषद्धती’ जो नेपाल के पूर्व भाग पहाड़ से निकल के बंगाल के आसाम के पूर्व और ब्रह्मा के पश्चिम ओर होकर दक्षिण के समुद्र में मिली है जिसको ‘ब्रह्मपुत्र’ कहते हैं, और जो उत्तर के पहाड़ों से निकल के दक्षिण के समुद्र की खाड़ी में अटक मिली है। हिमालय की मध्य रेखा से दक्षिण और पहाड़ों के भीतर और रामेश्वर-पर्यन्त विन्ध्याचल के भीतर जितने देश हैं, उन सबको आर्यावर्त्त कहते हैं। यह देश देवनिर्मित आर्यावर्त्त इसलिए कहाता है कि ‘देव’ नाम वि‌द्वानों ने बसाया और आर्यजनों के निवास करने से ‘आर्यावर्त्त’ कहाया है ॥१॥

- सत्यार्थ प्रकाश

- ये ही तो वाक्य थे जिन्हें पढ़कर हमारे देशवासियों का स्वाभिमान जागा, समाज में चर्चा शुरू हुई और भारतवासियों को एकता का सूत्र मिला, अन्यथा कोई जयपुर, कोई अपने को पटियाला और कोई ग्वालियर का निवासी बताता था। यहां से हमें लगा कि ये देश तो एक था, अखण्ड था और 
हम सब उसी देश के वासी हैं।

63

विदेशियों के राज्य के कारण दुःखी दयानन्द

यह सर्वविदित है कि महर्षि दयानन्द प्रखर राष्ट्रवादी हैं, वे भारत का खोया हुआ प्राचीन वैभव वापस चाहते हैं और उसके लिए वे भारतवासियों का ध्यान गुलामी के लिए जिम्मेदार कारणों की ओर दिलवाना चाहते हैं :-

“विदेशियों के आर्यावर्त्त में राज्य होने के कारण- आपस की फूट, मतभेद, ब्रह्मचर्य का सेवन न करना, विद्या न पढ़नी-पढ़ानी, बाल्यावस्था में अस्वयंवर विवाह, विषयासक्ति, मिथ्याभाषणादि, कुलक्षण, वेदविद्या का अप्रचार आदि कुकर्म हैं। जब आपस में भाई-भाई लड़ते हैं, तभी तीसरा विदेशी आकर पंच बन बैठता है। क्या तुम लोग महाभारत की बातें जो पांच सहस्त्र वर्ष के पहले हुई थी, उनको भी भूल गए?”

- सत्यार्थ प्रकाश

- महर्षि दयानन्द महाभारत के युद्ध को वैभवशाली भारत के विनाश का कारण मानते हैं और उससे आज सीख लेने की जरुरत समझते हैं।

64

विश्वगुरु भारत क्यों?

वे आर्यावर्त (भारत) को प्राचीनतम विद्याओं का जनक और प्रचारक मानते हैं – उनका मानना है कि समस्त विश्व में ज्ञान और विज्ञान यहीं से फैला- वे पुनः भारत को विश्वगुरु बनाने की कल्पना की भूमिका तैयार करते हुए लिखते हैं –

“जितनी विद्या भूगोल में फैली है, वह सब आर्यावर्त्त देश से मिश्रवालों, उनसे यूनानी, उनसे रोम और उनसे यूरोप देश में, उनसे अमेरिका आदि में फैली है। अब तक जितना प्रचार संस्कृत में विद्या का आर्यावर्त्त देश में है उतना किसी अन्य देश में नहीं। जो लोग कहते हैं कि जर्मन देश में संस्कृत विद्या का बहुत प्रचार है और जितना संस्कृत मोक्षमूलर साहब पढ़े हैं उतना कोई नहीं पढ़ा, यह बात कहने मात्र है। क्योंकि ‘यस्मिन्देशे द्रुमो नास्ति तत्रौरण्डोऽपि दुमायते’ अर्थात् जिस देश में कोई वृक्ष नहीं होता उस देश में एरण्ड ही को बड़ा वृक्ष मान लेते हैं। वैसे ही यूरोप देश में संस्कृत विद्या का प्रचार न होने से जर्मन और मोक्षमूलर साहब ने थोड़ा सा पढ़ा, वही उस देश के लिए अधिक है। परन्तु आर्यावर्त्त देश की ओर देखें तो उनकी बहुत न्यून गणना है।”

- सत्यार्थ प्रकाश एकादश समु०

शब्दार्थ : एरण्ड - एक छोटे पौधे का नाम। मोक्षमूलर - जर्मन विद्वान मैक्समूलर, महर्षि उनको मोक्षमूलर कहकर लिखते हैं।

65

भाग्य बड़ा या कर्म

महर्षि हमेशा कर्म को प्रधानता (प्रमुखता) देते हैं। वे मानते हैं कि भाग्य भी तो कर्म से ही बनता है, जिनके कर्मों का भाग एक जन्म में नहीं हो पाता और उनके फलों को लेकर मनुष्य नया जन्म लेता है तो उसी को भाग्य कहते हैं।

‘पुरुषार्थ प्रारब्ध से बड़ा’ इसलिए है कि जिससे संचित प्रारब्ध बनते, जिसके सुधरने से सब सुधरते और जिसके बिगड़ने से सब बिगड़ते हैं। इसी से प्रारब्ध की अपेक्षा पुरुषार्थ बड़ा है।

- सत्यार्थ० स्वमन्तव्य०

प्रारब्ध का अर्थ भाग्य एवं पिछले कर्म फल हम लेकर पैदा हुए और 
पुरुषार्थ जो अब कर्म कर रहे हैं

66

दुख का मूल पाप

“जैसे मूल कट जाने से वृक्ष नष्ट होता है वैसे पाप को 
छोड़ने से दुख नष्ट होता है।”

- सत्यार्थ प्रकाश

- यानि दुःखों का मूल पाप ही है, यानि बुरे कर्म

67

तीर्थों में पाप-पुण्य किसी का नहीं छूटता

क्या तीर्थों में जाकर सारे पाप धुल जाते हैं, महर्षि का उत्तर स्पष्ट हैं – 
नहीं, वे कर्मफल व्यवस्था को ही अटल मानते हैं –

“प्रश्न- जो-जो तीर्थ व नाम का महात्म्य अर्थात जैसे ‘अन्य क्षेत्रकृतं पापं काशीक्षेत्रे विनश्यति’ इत्यादि बात सच्ची है व नहीं? 
उत्तर- “नहीं क्योंकि जो पाप छूट जाते हों तो दरिद्रों को धन, राज, अन्धे को आंख मिलती। कोढ़ियों का कोढ़ आदि रोग छूट जाता, ऐसा नहीं होता। इसलिए पाप व पुण्य किसी का नहीं छूटता।”

- सत्यार्थ प्रकाश

- महर्षि केवल कर्म को महत्व देते हैं, जो भी फल है वह केवल कर्म का ही है, अन्य किसी बात का नहीं। तीर्थ (जिनको लौकिक भाषा में तीर्थ कहा) कुछ ज्ञान सीखने के स्थान तो हो सकते हैं, परन्तु पाप वहां जाकर खत्म हो जाएंगे, ऐसा स्वीकार करने को दयानन्द तैयार नहीं, वे इसको पाप के 
बढ़ने का कारण मानते हैं।

68

कर्मशीलता ही मनुष्यत्व

कुछ विचारधाराओं में ब्रहृसत्य - जगत मिथ्या आदि की कल्पनाएं हैं। दयानन्द जीवन की सफलता कर्मशीलता पर विश्वास करते हैं –

“तुम्हारा लोगों को यह उपदेश करना कि संसार के सभी कामों को वे त्याग दें, निरर्थक है। शुभ कामों को छोड़ने का कोई औचित्य नहीं है। मनुष्य सब कामों को छोड़ भी कैसे सकता है? क्या भोजनादि कार्य, जो जीवन-निर्वाहार्थ किये जाते हैं, छोड़े जा सकते हैं?”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-१)

- इसके लिए उन्होंने एक पुस्तक भी प्रकाशित की - अद्वैतमत खण्डन।

69

कर्म फल व्यवस्था अमिट है

महर्षि कर्म फल व्यवस्था को अमिट मानते हुए कहते हैं कि जरूरी नहीं गलत कर्म का फल तुरन्त मिले पर चाहे इस जन्म में, चाहे अगले जन्म में, 
मिलेगा जरुर –

“किया हुआ अधर्म निष्फल कभी नहीं होता परन्तु जिस समय अधर्म करता है, उसी समय फल भी नहीं होता, इसलिए अज्ञानी लोग अधर्माचरण से नहीं डरते। परन्तु निश्चय जानो कि वह अधर्माचरण धीरे-धीरे तुम्हारे सुख के मूलों को काटता चला जाता है।”

- सत्यार्थ प्रकाश

70

आत्महत्या पापों से मुक्ति का समाधान नहीं

ऋषि ने हर विषय पर अपनी बात वेद के आधार पर रखी। लोग आत्महत्या करके पापों (दुःखो) से मुक्त होना चाहते हैं, पर दयानन्द कहते हैं जो किया है उसका भुगतान किए बिना मुक्त होना सम्भव नहीं। इसलिए कर्म करना चाहिए, आत्महत्या कदापि नहीं।

“आत्मघात करने से पाप ही होता है, और भोगे बिना पापाचरण के 
फल के पापों से मुक्त कोई भी नहीं हो सकता।”

- महर्षि दयानन्द के पत्र व्यवहार

71

ज्ञान का महत्व आयु का नहीं

महर्षि सम्मान की दृष्टि से आयु को नहीं ज्ञान को ही महत्व देने के पक्षधर हैं :-

“क्योंकि चाहै सौ वर्ष का भी हो परन्तु जो विद्या, विज्ञान रहित है, वह बालक और विद्या, विज्ञान का दाता है उस बालक को भी वृद्ध मानना चाहिए। क्योंकि सब शास्त्र आप्त विद्वान्, अज्ञानी को ‘बालक’ और ज्ञानी को ‘पिता’ कहते हैं।

- सत्यार्थ प्रकाश

72

वासना पर नियन्त्रण

महर्षि दयानन्द वासना की सीमा चाहते हैं, वे इसके माध्यम से इसको रोकने के मार्ग को गलत कहते हुए लिखते हैं –

“यह निश्चय है कि जैसे अग्नि में ईंधन और घी डालने से बढ़ता जाता है, वैसे ही कामों के उपभोग से काम, शान्त कभी नहीं होता किन्तु बढ़ता ही जाता है, इसलिए विषयासक्त मनुष्य को कभी न होना चाहिए।”

- सत्यार्थ प्रकाश

73

वासना कैसे मिटेगी

ओंकार जाप से लाभ

“जब शय्याशायी होने लगो तो प्रणव पवित्र का जप किया करो। जब तक नींद न आए पाठ करते रहो, यहाँ तक कि उसी नाम स्मरण में ही सो जाओ। इससे उत्तमोत्तम लाभ होते हैं। वासनामय देह बदल जाती है।”

- श्रीमद्दयानन्द प्रकाश

74

क्या खाने योग्य है, क्या नहीं?

महर्षि अच्छे विचारों के लिए शुद्ध और सात्विक भोजन को महत्व देते हैं इसीलिए वे क्या खाना चाहिए और क्या नहीं इसके लिए लिखते हैं

“जितना हिंसा और चोरी, विश्वासघात, छल आदि पदार्थों को प्राप्त होकर भोग करना ‘अभक्ष्य’ और अहिंसा धर्मादि कर्मों से प्राप्त होकर भोजनादि करना ‘भक्ष्य’ है। जिन पदार्थों से स्वास्थ्य, रोगनाश, बुद्धि, बल, पराकम और आयु की वृद्धि होवे, उन तण्डुल, गोधूम, फूल, मूल, कन्द, दूध, घी, मिष्ठादि पदार्थों का सेवन प्रजाजनों द्वारा यथायोग्य पाक मेल करके यथोचित समय पर मिताहार भोजन करना सब ‘भक्ष्य’ कहाता है।”

- सत्यार्थ प्रकाश

शब्दार्थ : तण्डुल - पान, गोधूम, अभक्ष्य - न खाने योग्य, भक्ष्य - खाने योग्य, पाक मेल - भोजन तैयार करना, मिताहार - अधिक न खाना

75

मांसाहार का विरोध

मांसाहार को वे मनुष्य के लिए निषेध मानते हैं, इसका दोष वे वाममार्गी लोगों द्वारा लिखे गए ग्रन्थों को देते हुए लिखते हैं –

“मांस खाने में पाप है। वेदों तथा आप्त ग्रन्थों में कहीं भी यज्ञ आदि के लिए पशुहिंसा करना नहीं लिखा है। गो, अश्व, अजमेध के अर्थ वामियों ने बिगाड़ दिए हैं।”

- महर्षि दयानन्द के पत्र व्यवहार

76

मनुष्य की आदर्श दिनचर्या

मनुष्य की आदर्श दिनचर्या लिखते हुए दयानन्द मार्गदर्शन करते हैं –

“सब मनुष्यों को यह व्यवहार करना उचित है कि पहररात्रि रहे तब उठे। उठ के शौचादिक किया करे। फिर कुछ भ्रमण शुद्ध देश में करे। जहां-जहां शुद्ध वायु को एकान्त में जा के गायत्री मन्त्रादिकों के अर्थ से परमेश्वर की स्तुति करे। फिर प्रार्थना करे कि- हे परमेश्वर आपकी कृपा से हम पवित्र हो के और धर्म में तथा अच्छे गुण ग्रहणों में तत्पर होवें। परन्तु आपकी कृपा से ही जो अच्छा होता है सो होता है। सो आप ऐसे सब जीवों पर कृपा कीजिए कि सब जीव आपकी आज्ञा सद्‌गुण-ग्रहण और आपके स्वरूप में ही विश्वादि गुणयुक्त होके स्थिर होवें। फिर उपासना करे कि सब इन्द्रिय प्राण और जीवात्मा को एकत्र स्थिर करके परमेश्वर में स्थिर समाधिस्थ हो के अनन्त जो परमेश्वर का आनन्द उसमें मग्न हो जाए। फिर चिरकाल ऐसे परमेश्वर का ध्यान करें।”

- (म. द. पत्र व्यवहार सा. साप्ताहिक)

77

व्यायाम की शिक्षा

महर्षि, मनुष्य की शारीरिक उन्नति को बहुत महत्व देते थे, और वे प्रत्येक युवा से निरन्तर व्यायाम करने का उपदेश देते थे, उनका स्वयं का शरीर वज्र सा था, छह फिट नौ इन्च का गौरवर्ण गठे हुए शरीर वाले महर्षि के विशाल व्यक्तित्व द्वारा कही गई बातों का असर तो होगा ही....

जब सोलह वर्ष का पुरुष होय तब से लेके जब तक वृद्धावस्था न आवे तब तक व्यायाम करे। बहुत न करे किन्तु ४० बैठक करे और ३० वा ४० दण्ड करे। कुछ भीत खम्भे वा पुरुष से बल करे, फिर लोट करे। उस को भोजन से एक घन्टा पहिले करे, सब अभ्यास जब कर चुके उस से एक घन्टा पीछे भोजन करे। परन्तु दूध जो पीना होय तो अभ्यास से पीछे शीघ्र ही पीवे। उस से शरीर में रोग न होगा, जो कुछ खाया वा पिया सो सब परिपक्व हो जायगा, सब धातुओं की वृद्धि होगी तथा वीर्य की भी अत्यन्त वृद्धि होती है, शरीर दृढ़ हो जाता है और हडियां बड़ी पुष्ट हो जाती हैं। जठराग्नि शुद्ध प्रदीप्त रहता है और सन्धि से सन्धि हाड़ों की मिली रहती है अर्थात सब अंग सुन्दर रहते हैं। परन्तु अधिक न करना।

शब्दार्थ : भीत - दीवार, खम्बे - पिलर, लोट - लेटकर, सन्धि - जोड (ज्वाइंट्स)

- जो स्वयं करके लाभ प्राप्त करता है, वो ही इसे कहने की इच्छा रखेगा।

78

सत्य-असत्य के निर्णय के लिए क्या करना चाहिए?

महर्षि दयानन्द जीवन की उन्नति का मूल केवल सत्य को कहते हैं और उसी को सदैव स्वीकार करने की प्रेरणा देते हैं –

“मनुष्य को स्वमत के विषय में सहज ही दुराग्रह उत्पन्न होता है, यह मनुष्य का स्वभाव है, मनुष्य सुज्ञ पुरुषों को उचित है कि दुराग्रह को परे फेंक सत्य की परीक्षा करें। यही उनका भूषण है।”

- सर्वश्रेष्ठ प्रवचन

“सत्य के ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिए।”

79

आर्यावर्त देश का नाम

“आर्य अर्थात् श्रेष्ठ अथवा अभिज्ञात इत्यादि और आर्यावर्त कहने से ऐसों का देश, ऐसा अर्थ होता है। सो भाई, ऐसे श्रेष्ठ नाम को तुम क्यों स्वीकार नहीं करते? क्या तुम अपना मूल का नाम भी भूल गए? गुण भ्रष्ट हम लोग हुए तो हुए, परन्तु नाम भ्रष्ट तो हमें न होना चाहिए।”

- सर्वश्रेष्ठ प्रवचन

- महर्षि कहते हैं कि किसी देश का नाम वहां रहने वालों की व्याख्या करता है। अगर किन्हीं कारणों से हमारे गुण समाप्त हुए तो नाम तो बचाकर रखें, ताकि उसको स्मरण कर हम पुनः उसी वैभव को प्राप्त करने का प्रयास करें।

80

स्त्री शिक्षा के प्रबल समर्थक दयानन्द

आज आपको हैरानी नहीं होगी किंतु 19वीं शताब्दी का वह काल जब बहुसंख्यक भारतीयों में यह धारणा बुरी तरह घर कर गई थी कि महिलाओं को पढ़ाना पाप है, धन्य दयानन्द जो तुमने इतने बड़े गतिरोध को तोड़ दिया –

“स्त्रियों को विद्या अवश्य पढ़ानी चाहिए क्योंकि बिना विद्या के मनुष्य की बुद्धि पशु की बुद्धि के तुल्य है।”

- पत्र व्यवहार

- अनेक विरोधों के बावजूद स्त्रियों के गुरुकुल, विद्यालय, हॉस्टल का खोलना आरंभ हुआ और भारत में एक नई शिक्षा क्रांति का सूत्रपात हुआ।

81

माता-पिता-आचार्य की महिमा

महर्षि जी ने माता-पिता के तीन गुण लिखे हैं- माता-पिता प्रशस्त गुणों वाले हों अर्थात् माता-पिता के गुण प्रशंसनीय हों। उठना-बैठना, खाना-पीना, लोगों से मिलना-जुलना सभी इतने सभ्यता और सुशीलता से परिपूर्ण हों कि समाज के लोग बच्चों की प्रशंसा करें। केवल व्यवहार ही नहीं, अन्य गुण भी प्रसंनीय हों।

मातृमान् पितृमानाचार्यवान् पुरुषो वेद।

“वस्तुतः जब तीन उत्तम शिक्षक अर्थात् एक माता, दूसरा पिता और तीसरा आचार्य होवे तभी मनुष्य ज्ञानवान् होता है। वह कुल धन्य! वह सन्तान बड़ा भाग्यवान् जिसके माता और पिता धार्मिक और विद्वान् हों। जितना माता से सन्तानों को उपदेश और उपकार पहुँचता है, उतना किसी से नहीं। जैसे माता सन्तानों पर प्रेम, उनका हित करना चाहती है उतना अन्य कोई नहीं कर सकता, इसीलिए (मातृमान्) अर्थात् ‘प्रशस्ता धार्मिकी विदुषी माता विद्यते यस्यस मातृमान्’। धन्य वह माता है कि जो गर्भाधान से लेकर जब तक पूरी विद्या न हो, तब तक सुशीलता का उपदेश करे।”

- सत्यार्थ प्रकाश द्वितीय समु०

82

सन्तानों में उत्तम संस्कारों हेतु स्वयं चरित्रवान बनें

“जब जब मैं किसी के मुख से अथवा समाचार पत्रों में आप लोगों की निन्दा सुनता वा देखता हूं तब-तब मुझको बड़ा शोक होता है। यदि आप लोग ऐसे निन्दा के काम न करें तो क्यों निन्दा होवे। हम लोगों को अंग्रेज आदि के सामने शर्मिन्दा क्यों होना पड़े।” बड़े महाराज जो कि श्रीमानों के पिता जी थे, यदि वे बहुविवाह पासवान् और वेश्या आदि को न रखते तो आप लोग भी कभी ऐसा काम न करते। ऐसे ही जैसे आप लोगों का व्यवहार महाराजकुमार आदि देखेंगे इन्हीं में झुकेंगे। क्योंकि मनुष्य को दूसरे का गुण लेना कठिन और दोष लेना सहज है।

- पत्र व्यवहार

जब महर्षि ने महाराजा का चरित्र सम्बन्धी दोष देखा, तब महाराजा को पत्र लिखकर ऐसे कठोर शब्दों का प्रयोग किया, एक महाराजा को, ऐसे शब्द, केवल अत्यन्त साहसी और निस्वार्थ हितैषी ही कह सकता है।

83

कन्या शिक्षा अनिवार्य

कन्या शिक्षा का हरदम विरोध होता है। अतः कन्या शिक्षा को तर्कपूर्ण समर्थन देते हुए दयानन्द स्थान-स्थान पर लिखते हैं, स्थान-स्थान पर बोलते हैं –

“जैसे लड़के लोग ब्रह्मचर्य करते हैं वैसे कन्या लोग ब्रह्मचर्य करके वर्णोच्चारण से लेकर वेदपर्यन्त शास्त्रों को पढ़कर प्रसन्न करके स्वेच्छा से पूर्ण युवावस्था वाले विद्वान् पति को वेदोक्त रीति से ग्रहण करें।”

- व्यवहारभानु

84

स्त्रियों को शिक्षा का अधिकार

“आजकल स्त्री को विद्या पढ़ने का अधिकार नहीं है। वह शूद्र के समान कही जाती हैं। यदि स्त्रियाँ पढ़ी-लिखीं होती तो इन पण्डितों की गड़बड़ाहट का खण्डन करके एक घड़ी में इनका मुँह बन्द कर देतीं।”

(पूना प्रव. (उपदेश मंजरी))

85

सन्तान को अशिक्षित रखने वाले माता-पिता दण्ड के भागी

दयानन्द वेदादि शास्त्रों से शिक्षा की अनिवार्यता सिद्ध करते हैं –

कौषीतकीय ब्राह्मण में लिखा है कि सब पुत्र वा पुत्रियां पांच वर्ष की अवस्था में पाठशाला को भेजे जाते थे। यह एक सामाजिक नियम था। परन्तु माता-पिता उस सामाजिक नियम को तोड़ते तो राजसभा से उनको दण्ड मिलता था।

(पूना प्र. (उपदेश मंजरी))

- आज के स्किल इण्डिया अभियान के आरम्भिक सूत्र के आधार इन वाक्यों को कहा जा सकता है।

86

गर्भपात-महापाप

महर्षि की दृष्टि हर उस बात पर गई जो समाज के ताने-बाने को नष्ट कर रहा था।

गर्भपात रोकने सम्बन्ध में :- मैं विचार करता हूं कि हजारों बालकों के जीवन बचाए जायेंगे यदि गर्भपातन बन्द या कम हो जाएगा, इस प्रकार नियोग या विधवाओं का पुर्नविवाह अन्ततः प्रचलित होगा...।

(ऋ. द. स. प. वि. भाग. १)

भ्रूणहत्या निषेध - अब इस समय में नियोग और पुर्नविवाह दोनों के बन्द होने से आजकल के आर्य लोगों में जो-जो भ्रष्टाचार फैला हुआ है, वह आप लोग देख ही रहे हैं। हजारों गर्भ गिराये जाते हैं। भ्रूणहत्याएँ होती हैं। एक गर्भ गिराने से एक ब्रह्म हत्या का पाप होता है। सोचो कि इस देश में कितनी ब्रह्महत्यारों प्रतिदिन होती हैं।

(पूना प्र. (उपदेश मंजरी))

- हमारे लिए विचारणीय है कि क्या आज गर्भपात बन्द हो गए हैं?

87

माता-पिता और अध्यापक का बालक से व्यवहार

ताड़न द्वेषयुक्त न हो :- माता-पिता तथा अध्यापक लोग ईर्ष्या-द्वेष से ताड़न न करें किन्तु ऊपर से भय प्रदान और भीतर से कृपा दृष्टि रखें।

- सत्यार्थ प्रकाश

88

क्या सन्तानों का ताड़न (फटकारना) जरूरी है?

“जो माता-पिता और आचार्य सन्तान और शिष्यों का ताड़न करते है वे जानो अपने सन्तान और शिष्यों को अपने हाथ से अमृत पिला रहे हैं और जो सन्तानों वा शिष्यों का लाड़न करते हैं वे अपने सन्तानों और शिष्यों को विष पिला कर नष्ट भ्रष्ट कर देते हैं।”

- सत्यार्थ प्रकाश समु० २

89

माता-पिता आदि का सन्तानों के प्रति धर्म

“यही माता-पिता का कर्त्तव्य कर्म, परम धर्म और कीर्ति का काम है जो अपने सन्तान को तन, मन, से विद्या धर्म, सभ्यता और उत्तम शिक्षायुक्त करना।”

- सत्यार्थ प्रकाश समु० २

“सन्तानों को उत्तम विद्या शिक्षा, गुण कर्म और स्वभाव रूप आभूषणों का धारण कराना माता, पिता, आचार्य और सम्बन्धियों का मुख्य कर्म है।”

- सत्यार्थ प्रकाश समु० २

90

सबको एक समान शिक्षा के समर्थक दयानन्द

दयानन्द सारी प्रजा के बच्चों को एक समान शिक्षा एवं कड़े अनुशासन में शिक्षा के प्रबल पक्षधर हैं –

“सबको तुल्य वस्त्र, खान-पान, आसन दिये जाएँ। चाहे वह राजकुमार 
वा राजकुमारी हो, चाहे दरिद्र के सन्तान हों।... उनके माता-पिता अपने 
सन्तानों से वा सन्तान अपने माता-पिताओं से न मिल सकें, न किसी 
प्रकार का पत्रव्यवहार एक-दूसरे से कर सकें।”

- (सत्यार्थ प्रकाश विमर्श)

- आज की व्यवस्था को ध्यान से देखें तो क्या यह सच्चाई नहीं कि समाज में ऊंच-नीच 
की नींव तो हम अलग-अलग तरह की शिक्षा व्यवस्था (विद्यालय बनाकर) ही कर देते 
हैं और उसके परिणाम हमारे सामने हैं।

91

पुत्रों के समान ही कन्याओं की शिक्षा

पाठशाला में पुत्र और कन्याओं का अच्छी रीति से 
पढ़ने-पढ़ाने का प्रचार सदा बढ़ाते जाना चाहिए।

- (ऋ. भा. भू.)

92

कन्याओं को यज्ञोपवीत पहनने का अधिकार

कन्याओं की पढ़ाई के प्राचीन इतिहास का उदाहरण देकर दयानन्द पुष्ट करते हैं –

“साधारण स्त्रियों के भी उपनयन और गुरु गृह में वास इत्यादि संस्कार 
होते थे, यह सबको विदित ही है। गार्गी, सुलभा, मैत्रेयी, कात्यायनी आदि 
बड़ी-बड़ी सुशिक्षित स्त्रियां होकर बड़े-बड़े ऋषि मुनियों की शंकाओं का 
समाधान करती थीं।”

- (ऋ. भा. भू.)

93

अन्य देशवासियों से सम्बन्ध के पक्षधर महर्षि दयानन्द

महर्षि दयानन्द 5000 वर्ष पूर्व भी अमरीका और भारत का सम्बन्ध मानते हैं, इसलिए वे लिखते हैं 
महर्षि दयानन्द से बात करने की इच्छा अमेरिका के कर्नल अल्काट ने पत्र लिखकर प्रकट की थी, दयानन्द ने 
इस पर प्रसन्नता पूर्वक उत्तर देते हुए उनको भारत और अमेरिका के 5000 साल पहले के संबंधों 
को याद दिलाई है। महर्षि की स्पष्ट मान्यता थी कि 5000 साल यानी महाभारत काल में हमारे 
(भारत) सारी दुनिया से हर प्रकार से पूर्ण संबंध थे। –

“जगदीश्वर को असंख्य धन्यवाद है कि उसकी कृपा से लगभग पांच हजार 
वर्ष के पश्चात्, महाभाग्य के उदय होने से, हमारे प्रिय पातालदेश निवासी आपका (जिनका आपसी व्यवहार छूटा हुआ था), और हम आर्यावर्त निवासियों 
के फिर से आपसी प्रीति, उपकार, पत्रव्यवहार और प्रश्नोत्तर करने का समय 
आ गया। मैं आपसे बड़े प्रेम से पत्र व्यवहार करना स्वीकार करता हूं।”

- महर्षि दयानन्द के पत्र व्यवहार

94

कौशल विकास-शिल्प कला सीखने के प्रति प्रतिबद्ध दयानन्द

भारत की उन्नति को लेकर दयानन्द लगातार चिंतित हैं वह चाहते हैं कि चाहे बाहर देश 
से ट्रेनिंग दिलवानी पड़े पर (स्किल) कौशल की ट्रेनिंग भारतीय युवा को दिलवानी 
चाहिए और लम्बा पत्र व्यवहार ‘श्रीमती के श्री जी वाइस’ के साथ उनका चलता है –

“मेरा विचार है कुछ पुरुष कला कौशल सीखने के लिए जर्मनी भेज दिए जाएं।
परन्तु यदि यहीं आर्यावर्त में ऐसा सिखाने वाले पुरुष मिल जाएं तो बाहर जर्मनी 
को आदमी भेजने की कोई आवश्यकता नहीं।”

- महर्षि दयानन्द के पत्र व्यवहार

- आज के स्किल इण्डिया अभियान के आरम्भिक सूत्र के आधार इन वाक्यों को कहा 
जा सकता है।

95

स्किल (कौशल) विकास देश की उन्नति का साधन

“बहुत से पढ़े लिखे लोगों को भी नौकरी नहीं मिलती, व वे जीवन निर्वाह का 
प्रबन्ध नहीं कर सकते। ऐसी अवस्था देखकर मैं एक कला कौशल के स्कूल की 
आवश्यकता विचारता हूं। प्रत्येक पुरुष को अपनी आय का १००वां भाग प्रस्तावित 
संस्था को देना चाहिए। उस धन से चाहे तो विद्यार्थी कला कौशल सीखने जर्मनी 
भेजे जावें व वहां से अध्यापक यहां बुलाए जाएं। जो कोई इस फण्ड के व्यय पर 
इन धंधों को सीखे, उसे प्रतिज्ञा करनी होगी कि स्वशिक्षा समाप्त करने पर सभा 
व फण्ड की वह १२ वर्ष तक सेवा करेगा।”

- महर्षि दयानन्द के पत्र व्यवहार

96

विधवाओं की अवस्था को देख दयानन्द बहुत दुखी थे वे उसके लिए कानून बनाने की तैयारी कर रहे थे

विधवाओं की दशा सुधारने को इच्छुक महर्षि दयानन्द 
विधवाओं की अवस्था पर दयानन्द कानून बनवाने की तैयारी में हैं ताकि उनकी पैदा सन्तानों 
को भी कानूनी अधिकार प्राप्त हो सके –

“इसके लिए मैंने अब एक कानूनी मसौदा एक विधवा की दुःखित अवस्था को दूर करने 
के लिए बनाया है। मैं वही एक व दो दिन में आपको आवश्यक शुद्वियों के लिए भेज 
दूंगा। १. इसका प्रयोजन नियोग होगा। २. विधवा की सन्तान मृत पति की सम्पत्ति की 
दायभागी होगी। ३. उन्हें हरामी व जाति से बाहर न समझा जाय। ४. विधवा की जाति 
के लोग उसे किसी प्रकार तंग न करें। ५. कानून से सैकड़ों बालकों के जीवन बच जाएंगे।”

- महर्षि दयानन्द के पत्र व्यवहार

- आप स्थान-स्थान पर देखेंगे कि महर्षि हर समस्या का समाधान देने की तैयारी कर रहे हैं।

97

श्राद्ध वास्तविकता में क्या है?

जीवित माता-पिता की सेवा ही श्राद्ध है,

श्रद्धा शब्द की व्याख्या करते हुए महर्षि दयानन्द ने इस शब्द की जीवित माता-पिता की सेवा 
रूप में व्याख्या की है और उनकी तृप्ति करना ही तर्पण कहा है, अब यह दोनों काम मृत्यु के बाद कैसे होंगे?

“जीते पितरों की श्रद्धा से सेवा, पुरुषार्थ और पदार्थों से तृप्ति करना श्राद्ध और 
तर्पण कहलाता है। यह तर्पण वेदादि शास्त्रोक्त है। भोजन भट्ट अर्थात् स्वार्थियों 
का लड्डू आदि से पेट भरना श्राद्ध और तर्पण शास्त्रोक्त तो नहीं किन्तु पापों 
का अनर्थकारक आडम्बर है। जो-जो मनु आदिक ग्रन्थों में लेख हैं सो वेदानुकूल 
होने से माननीय हैं, अन्य कोई नहीं।”

- महर्षि दयानन्द के पत्र व्यवहार

शब्दार्थ : भोजनभट्ट - पेटू

98

अधिकारियों (आफिसरों) पर सीधी नजर रखें

(मॉनिटरिंग सिस्टम)

राजा के लिए मानो आज के मुख्य सरकारी अधिकारियों और राजनेताओं के लिए कितने 
आवश्यक निर्देश महर्षि दयानन्द लिख रहे हैं, एक अत्यन्त महत्वपूर्ण है –

“कभी बिना विचारे, लिखे, नियत काल के आज्ञा न देवे। पश्चात् जैसी जितने 
समय में कार्यसिद्धि करने की आज्ञा दी हो वह यथावत् समय में पूरी हुई वा 
नहीं उस पर ध्यान सदा रखे।”

- महर्षि दयानन्द के पत्र व्यवहार

- आज बेहतर मॉनिटरिंग सिस्टम लगाए गए हैं ओर हर कार्य के लिए टाइम-लाइन भी बनाई गई है।

99

कर्मचारियों को पुरस्कार और दण्ड का निर्देश

“जो यथोक्त समय में आज्ञा को यथावत् प्रीति से पूरी करे, उसका सत्कार 
करना पारितोषिक देना और उसकी उन्नति करना अति योग्य है। और जो 
यथोचित न करे उसका अपमान दण्ड और हास किए बिना कभी न छोड़ें”

- महर्षि दयानन्द के पत्र व्यवहार

आज की सरकारों द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में पुरस्कार स्थापित किए गए हैं। वे इसी उद्देश्य 
की पूर्ति करते हैं।

शब्दार्थ : यथोक्त - तय किए हुए समय में

100

राज्य के अधिकारियों में कार्य वितरण के आधार

राज्य के अधिकारी बनाने का आधार योग्यता रहे, मित्रता और रिश्तेदारी नहीं।

“बिना योग्यता वा परीक्षा के किसी को बड़ा वा छोटा अधिकार न देवे। किन्तु 
जो धर्मात्मता से उस कार्य के करने में समर्थ हो उसी के आधीन वह कार्य 
सिद्ध करे वा करावे, दरिद्र वा लोभी को प्रारम्भ में बड़ा अधिकार भी न देवे। 
और एक कुटुम्ब, सम्बन्धी, परस्पर मित्रों को भी एक अधिकार में न रखें।”

- महर्षि दयानन्द के पत्र व्यवहार

आज सिविल सर्विसिज के लिए बहुत बड़ी परीक्षा उपरान्त ही राज्य की बागडोर 
ऑफिसरों को दी जाती है।

101

राज कर्मचारियों की पेन्शन व्यवस्था

ये व्यवस्था विशेष ही लिखी है - ऋषि दयानन्द की हर क्षेत्र में पैनी दृष्टि है।

“जो प्रीतिपूर्वक धर्मात्मता से ३० वर्ष तक राजकार्य करे उनको आधी नौकरी 
जब तक वे जीवें देवे। यदि संग्रामादि में जिसका मृत्यु हुआ हो उसकी स्त्री 
पुत्रों को भी उसी प्रकार देवे। यावत् उनके पुत्र समर्थ न हों। जब समर्थ हों 
तब उनके पुत्रों को यथायोग्य अधिकार देवें। परन्तु उसकी स्त्री को योग 
क्षेमार्थ यथोचित जब तक वह जिए सदा दिया करे। यदि वह पांच रूपये 
मासिक पाता हो पूरा देवें। पुत्रों के समर्थ हुए पर स्त्री को आधा देवें।”

- पत्र व्यवहार

शब्दार्थ - योगक्षेमार्थ - जरूरत पूरी करने के लिए 
- आप देखेंगे कि आज ठीक ऐसी ही व्यवस्था है।

102

स्वदेशी व्यापारियों को सहयोग करने का आह्वान

दयानन्द स्वदेश उन्नति चाहते थे, वे चाहते थे कि हमारे नौ जवानों को ऋण आदि देकर व्यापार भी 
मजबूत किया जाए, पर वे दुखी हैं कि भारतीय भारत वालों को ही ऋण देने में कतराते थे –

“साथ ही यह भी कहा कि इस देश के सेठ-साहूकार व्यापारार्थ आये हुए 
विदेशियों को तो करोड़ों का ऋण दे देते हैं, किन्तु अपने स्वदेशी भाइयों का 
अप्रामाणिक वर्तन देखकर उन्हें एक फूटी कौड़ी भी ऋण नहीं देते।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-2)

भारतीय स्वदेशी पूंजी का पहला पंजाब नैशनल बैंक, आर्य समाज लाहौर ने ही बनवाया, ये इसी वाक्य 
की प्रेरणा का प्रतिफल था।

103

राजा की जिम्मेदारी

राजा को स्पष्ट निर्देश देते हुए लिखते हैं –

“अपने अंश को न छोड़े और पराये अंश का स्वीकार कभी न करे।”

- पत्र व्यवहार

104

अपने राज्य की सीमाओं की रक्षा करें

“जितनी पृथ्वी स्वराज्य की दूसरे राज्य में दबी है, 
उसके लिए अपील शीघ्र अवश्य होनी चाहिए।”

- पत्र व्यवहार

105

शत्रु के साथ बर्ताव का निर्देश

“युद्ध में जो शत्रु घायल हो उसकी रक्षा, ओषधी अवश्य करे। स्त्री, 
बालक, वृद्ध, आतुर, भीरू, शरणागत पर शस्त्र कभी न चलावे।”

- पत्र व्यवहार

106

राजपुरुषों को सामान्य से अधिक दण्ड

महर्षि दयानन्द मनुष्यों की समाज में जिम्मेदारी और अधिकार साथ-साथ लेकर चलने के पक्षधर हैं, 
वे राजा के अधिक सम्मान और अधिकार देने के तो गलत कार्यों पर दण्ड भी अधिक देने के पक्षधर हैं –

“अपराध में प्रजा से राजपुरुषों पर अधिक दण्ड होना चाहिए। क्योंकि बकरी 
के प्रमाद रोकने से सिंह का प्रमाद रोकने में अधिक प्रयत्न होना उचित है।”

- पत्र व्यवहार

“जिस अपराध में साधारण मनुष्य पर एक पैसा दण्ड हो तो उसी अपराध में राजा 
को सहस्र पैसा दण्ड होना चाहिए। जैसा अनपढ़ पर एक पैसा तो अति शिक्षित पर 
सौ या एक सौ अठ्‌ठाईस गुणा अर्थात् १२८ पैसा दण्ड होना चाहिए।”

- पत्र व्यवहार

- आज देश में व्याप्त दुःख के पीछे का बड़ा कारण एक ही है कि गरीब जेलों में बन्द हैं और 
सम्पन्न और प्रभावशाली लोग दण्डित ही नहीं हो पाते।

शब्दार्थ : प्रमाद - गलत कार्य

107

राज्य के लिए आवश्यक

कूटनीति के उपयोग में दण्ड को अन्तिम स्थान पर रखते हैं दयानन्द।

“जहां (साम) मेल, (दाम) कुछ दे, (भेद) तोड़ फोड़ से 
शत्रु वश में न आवें वहीं दण्ड प्रचारित करना चाहिए।”

- पत्र व्यवहार

108

न्यायाधीश को हटाने के लिए महाभियोग

न्यायाधीश के लिए भी महाभियोग जैसी व्यवस्था बनाने के पक्ष में हैं 
दयानन्द, ताकि वो निरंकुश न हो सके –

“यदि न्यायाधीश ही प्रमादी होकर अन्याय किया चाहे तो उनको राज्य 
और प्रजा के धार्मिक प्रधान पुरुष समझावें कि आप अन्याय मत कीजिये। 
यदि न मानें तो उसको पदच्युत करके जो उसी के कुल में निकट सम्बन्ध 
से न्यायास्पद के योग्य पुरुष हो उसको न्यायाधिकारी करे। परन्तु यह काम 
पक्षपात रहितता से होना उचित है। क्योंकि राज्य और विद्या, तथा धर्म की वृद्धि 
और अधर्म की हानि के लिए सब प्रतिष्ठा है, प्रमाद के अर्थ नहीं।”

 - पत्र व्यवहार

- आज की न्याय व्यवस्था को चिन्तनीय

109

परमेश्वर के पश्चात् राजाज्ञा सर्वोपरि

केवल राजा के लिए ही निर्देश नहीं है, प्रजा के कर्त्तव्य बताते हुए दयानन्द, परमेश्वर 
के पश्चात् राजा की आज्ञ को ही सर्वोपरि मानने का निर्देश करते हैं –

“जो राजासन पर नियत हो उसका किचित् भी अपमान कोई मन, कर्म, वचन 
से न करे। किन्तु जो जिस पर प्रधान हो चाहे उससे अप्रधान किसी गुण में 
अधिक भी क्यों न हो तथापि परमेश्वर से द्वितीय स्थान में माननीय राजा 
और स्वामीवत् माननीय अपने-अपने प्रधान को मानें।”

- पत्र व्यवहार

- आज का लोकतन्त्र राजा की अच्छी छवि बनने ही नहीं देता, जिससे प्रजा की सद्भावना 
प्रधानमन्त्री आदि के प्रति पूर्ण रूप से नही हो पाती।

110

भाई-भतीजावाद का स्पष्ट खण्डन

राजाज्ञा को सर्वप्रथम स्थान पर रखने का निर्देश, चाहे मित्र भी हो तो 
भी राजाज्ञा भंग करने में दण्ड का पात्र है –

“अधिष्ठाता लोग राजाज्ञा को अपने प्राण से भी अधिक मानें, चाहे कोई कैसा 
ही सम्बन्धी वा मित्र क्यों न हो। परन्तु जब राजाज्ञा भंग वा उसमें आलस्य करे 
तब वह शत्रुवत् दण्डनीय हो जावे।”

- पत्र व्यवहार

- अनुशासित राज्य ही कल्याणकारी हो सकता है।

शब्दार्थ : अधिष्ठाता - आफिसर

111

प्रजा, राजा के आचरण का अनुसरण करती है

प्रजा राजा के आचरण से सीखती है अतः राजा से उत्तम आचरण की उम्मीद करते हुए दयानन्द 
लिखते हैं यदि राजाओं में दोष है तो प्रजा को गलत कार्यों के प्रति जिम्मेदार नहीं माना जा सकता –

“यह निश्चय है कि जैसा शील आचरण, उत्साह और पुरुषार्थ प्रधान पुरुष करता है 
वैसा ही इतरजन वर्तते हैं। इसलिए प्रधान पुरुषों को आवश्यक है कि सदा अधर्मयुक्त 
कर्मों को छोड़ कर न्याय रूप धर्मकृत्यों में वर्त्ता करें। क्योंकि जो जो धर्म वा अधर्म 
प्रधान पुरुष दृष्टान्त से इतर जनों में प्रवर्तमान होता है उसका मुख्यनिमित्त प्रधान 
होकर फलभागी होता है। इसलिए मुख्य पुरुषों को बहुत विचार से वर्तना चाहिए।”

- पत्र व्यवहार

112

“नमस्ते” का प्रचार

आधुनिक काल में ‘नमस्ते’ जैसा सर्वकालिक आचरण महर्षि दयानन्द
ने ही आरम्भ किया –

“नमस्ते शब्द सब आपस में बोलें। छोटा प्रथम बोले बड़ा पीछे बोले।”
“नमस्ते का अर्थ पाँव पकड़ना नहीं है, उसका अर्थ है 
सम्मान, सत्कार। सभी ऊँच-नीच और छोटे-बड़े मेल-मिलाप में सम्मान सत्कार के भागी हैं।”

श्रीमद्दयानन्द प्रकाश

- ‘नमस्ते’ का अभिवादन आज देश-विदेश में भारत की एक शानदार पहचान है।

113

परमात्मा की शक्ति कब मिलती है?

महर्षि दयानन्द का पूरा जीवन सत्य को समर्पित रहा और शायद 
वे इसी शक्ति से इतना बड़ा कार्य कर सके

“जब तक मनुष्य स्वयं झूठी बातों का त्याग करके सत्य बातों में निश्चित 
प्रवृत्त नहीं होता, तब तक वह अलौकिक शक्ति परमात्मा की ओर से नहीं 
मिलती। और न दृढोत्साही वह हो सकता है।”

- पत्र व्यवहार

महर्षि दयानन्द के हर वाक्य, हर कार्य, हर लेखन का अधार ‘सत्य’ ही है।

114

राजा की प्रथम जिम्मेदारी क्या है?

महर्षि न्याय को इतनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी बताते हैं की उस कार्य के लिए भोजन करने 
से भी उठकर न्याय करे। यानि सबसे महत्वपूर्ण कार्य न्याय करना ही है। महर्षि गरीब 
और निर्बल के आसुओं को राज्य के लिए श्राप मानते हैं –

“सदा बलवान् और राजपुरुषों से सताए हुओं की पुकार यदि भोजन पर भी बैठे 
हो तो भोजन को भी छोड़ के उनकी बात सुननी और यथोचित उनका न्याय 
करना। ऐसा न होवे कि निर्बल, अनाथ लोग बलवान् और राजपुरुषों से पीड़ित 
होके रुदन करें और अश्रुपात भूमी पर गिरे कि जिससे सर्वनाश हो जावे। और 
इनकी रक्षा से सब प्रकार की उन्नति अर्थात् शरीरारोग्य, आयु वृद्धि, धनवृद्धि, 
राजवृद्धि, धर्मवृद्धि और प्रतापवृद्धि को सदा करते रहिए।”

- पत्र व्यवहार

115

राज्य संचालन में दण्ड और पुरस्कार दोनों आवश्यक

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी राज्य के श्रेष्ठ संचालन के लिए सभी गुण राजाओं को बताना 
चाहते हैं, ताकि हमारा देश उनके माध्यम से उन्नति को प्राप्त हो सके –

“स्वराज्य और परराज्य का जो चिकीर्षित और अच्छे बुरे काम होते हैं 
उनको दूत द्वारा यथावत् जानकर दुष्ट कार्यकर्ताओं को दण्ड और उत्तम 
कार्य करनेहारों का सत्कार यथायोग्य कीजिए, जिससे उत्तम कार्य बढ़ें
और दुष्ट कर्म घट जायें।”

“जो जितना अपराध करे, उसको उतना दण्ड और जो जितना अच्छा 
काम करे, उसको उतना ही पारितोषिक देना, अधिक वा न्यून नहीं,
चाहे माता-पिता भी क्यों न हों।”

- पत्र व्यवहार

दण्ड व्यवस्था और पद्म - सम्मान इसी परम्परा का निर्वहन है।

116

बलि प्रथा का विरोध

धर्म की गलत व्याख्याओं ने पशुओं की बलि को भी धर्म का अंग बना दिया था। महर्षि दयानन्द एक 
और वेद की गलत व्याख्या को ठीक करने का भागीरथ प्रयत्न कर रहे हैं, दूसरी ओर इन कुप्रथाओं 
के दाग देश से मिटाने का प्रयत्न वे राजाओं को पत्र लिखकर करते हैं –

“अब दशहरा निकट आया। उसमें अनपराधी भैंसे, बकरों का प्राण न लेकर उसके 
स्थान में सिरनी मिठाई मोहन भोग लापसी आदि बलि प्रदान कीजिए और क्षत्रियों 
को जो कि शस्त्र चलाना जानते हैं उनके उत्साह शौर्य, धैर्य, बल और पराकम की 
परीक्षा करने के लिए जंगली सुअरों को वा सिंह को प्रथम पकड़ा रख के उस दिन 
मैदान में छोड़ शस्त्र प्रहार करने की आज्ञा दीजिए इनको विदित तो होवे कि शस्त्र 
चलाना ऐसा होता है।”

- पत्र व्यवहार

- अर्थात् वे कहते हैं कि एक बार जंगली सुअर और सिंह आदि को बलि लेने वाले मनुष्यों के बीच छोड़कर देखें, तो जाने 
कि '‘हां हम बहादुर हैं’ यों नीरिह पशु को बांधकर मारने में कैसी वीरता। ये तो अपराध है, वो भी धर्म के नाम पर।
- आज इसके विरुद्ध कानून बन चुके हैं, परन्तु जागरुकता की अभी भी आवश्यकता है।

117

न्याय में लोभ कभी न करें

न्याय करना राज्य की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। अतः इसके 
लिए कभी किसी से पैसे लेकर न्याय न करें, हो सकता है वह न्याय 
न होकर अन्याय हो –

“कभी अर्थी प्रत्यर्थी से लोभादि में फंस कर अन्याय न करे न करावे। 
यदि जिसका सत्य न्याय हो वह बिना प्रसंग भेंट करे तो भी उनसे कहे 
कि न्याय करना निज काम है।”

- पत्र व्यवहार

- आज की न्याय प्रणाली को इस विषय में विचारना चाहिए। 

शब्दार्थ : अर्थी - वादी, प्रत्यर्थी - प्रतिवादी, प्रसंग - मकसद, निजकाम - जिम्मेदारी

118

शानदार न्याय प्रणाली

हर किसी अर्जी पर फैसला अवश्य करना चाहिए, उसे व्यर्थ नहीं 
मानना चाहिए –

“किसी की अर्जी सुनकर निष्फल न करनी, किन्तु उसका 
यथावत् विचार करके जीत हार तय करना ही चाहिए।”

- पत्र व्यवहार

- आज की न्याय व्यवस्था के लिए अवश्य विचारणीय

119

राज्य के अधिकारी की योग्यता

किसी देश के अधिकारी कैसे हों और कैसे न हों का उपदेश और राजा 
(प्रधानमन्त्री या मुख्यमन्त्री) अपने परिवार के और मित्रजनों 
को अधिकारी न बनाएं, ऐसी दूरदृष्टि थी दयानन्द की –

“विद्यावान, बुद्धिमान, धर्मात्मा जितेन्द्रिय सब के हितकारी, सब दुष्ट व्यसन रहित 
और पक्षपात रहित पुरुष जिस देश में अधिकारी होते हैं, उस देश में सदा सुख 
और सब श्रेष्ठ व्यवहारों की उन्नति होती जाती है।”

“दरिद्र व लोभी को (राजा) प्रारम्भ में बड़ा अधिकार भी न देवें।”

- महर्षि दयानन्द के पत्र व्यवहार

120

अन्न का अपमान सहन नहीं

अन्न को महान बताते हुए उसकी बर्बादी के निषेध का उपदेश –

“अन्न का नाश :- थाली में जूठन छोड़ना बहुत बुरा है। इसमें एक तो खाद्य 
वस्तु का व्यर्थ में नाश होता है और दूसरे यदि किसी को दिया भी जाय तो 
बिगाड़ कर देना विवर्जित है। जूठा अन्न किसी मनुष्यों को भी नहीं देना चाहिए।”

- श्रीमद्दयानन्द प्रकाश

- महर्षि की दृष्टि बड़ी और छोटी, हर जरुरी बात पर गई है।

121

सत्य ग्रहण करने का उपदेश

“सत्य को ग्रहण और असत्य को छोड़ने में सर्वदा उद्यत 
रहना चाहिए”

- ऋषि दयानन्द पत्र विज्ञापन भाग-2

122

असत्य बोलने वाले की स्थिति

“असत्यभाषी :- मिथ्या बोलने, मानने और करने वाले को इस जन्म और परजन्म 
में सुख व प्रतिष्ठा नहीं होती।”

- ऋषि दयानन्द पत्र विज्ञापन भाग-2

123

आपसी फूट का परिणाम

भारत भर में फैले अनेक मत-मतान्तरों से दयानन्द दुःखी हैं और वो इसका कारण बताते हैं –

“आर्यों की आपस की फूट और ब्राह्मणों ने अपने स्वार्थ के कारण दूसरे वर्ण के 
लोगों को वेद नहीं पढ़ाये, परिणाम स्वरूप हमारे धर्म के इतने खण्ड हो गए हैं कि 
अब यह जानना कठिन हो गया है कि उनमें से कौन-सा ठीक है।”

(म. दयानन्द जी. च. पृ. २९८)

चक्रवर्ती राज्य का नाश उस समय तक नहीं होता, जब तक कि आपस में फूट न हो।

- (पूना प्र. व (उपदेशमंजरी) पृ. ८३)

- दयानन्द उस समय की भारत की दुर्दशा का मुख्य कारण आपसी फूट, जातियों में 
बंटा होना ही मानते हैं और इतिहास में झांककर देखें तो एक सच्चाई ही है।

124

सृष्टि के आरम्भ में कौन पैदा हुए

सृष्टि उत्पत्ति का विषय दयानन्द का प्रिय विषय रहा, क्योंकि यही 
महाभ्रान्ति पढ़े-लिखों में फैली है, वे अधिकार से क्या लिखते हैं –

“आदि में मनुष्य युवा उत्पन्न हुए थे, यदि बालक वा वृद्ध उत्पन्न होते तो 
वे कुछ कार्य न कर सकते थे।”

- महर्षि दयानन्द चरित्र

125

अत्यधिक धन का परिणाम

दयानन्द प्राचीन गौरवकाल के स्थान पर से वर्तमान दुरावस्था से 
बहुत दुःखी थे, वे उसका कारण बताते हुए कहते हैं –

“आर्यों के पास असंख्य धन हो गया था, जिससे वे भोग विलास में पड़कर 
अन्याय करने लगे, अन्याय से ही राज्य में अवनति हुई और महाभारत 
का युद्ध हुआ जिससे सब कुछ नष्ट हो गया।”

- म. द. च. बा. दे. मु.

126

एकाग्रता की विधि

वे उन्नति के साधन को बेचने के पक्ष में नहीं हैं, चाहते तो ध्यान और धारणा आदि में उनकी जो गति थी, 
उसका प्रभाव दिखाकर वे सबसे बड़े गुरु बनकर करोडों कमाते, पर दयानन्द तो ईंट पत्थर और विष 
ही कमाते रहे। वे इतनी बड़ी विद्या सामान्य शब्दों में दे रहे हैं –

एकाग्रता की विधि :- किसी ने पूछा कि मन स्थिर नहीं होता। महाराज ने 
कहा कि उसे एक जगह ठहरा लो। बाबू जनकधारी लाल ने कहा कि 
नहीं ठहरता, क्या इसके लिए किसी वस्तु का ध्यान करने की आवश्यकता 
है? महाराज ने कहा कि नहीं, और यदि यह तुमसे नहीं हो सकता तो 
अपने भीतर किसी तल वा सुई की नोक के बराबर किसी वस्तु की 
कल्पना कर लो और उस पर ध्यान जमाओ। ऐसे ही टुकड़े करते चले 
जाओ यहां तक कि अन्त में अत्यन्त सूक्ष्म टुकड़ा रह जाए फिर उसे भी 
उड़ा दो तब तुम्हारी धारणा हो जाएगी।

- म. द. जी. च.

- ध्यान और एकाग्रता का अत्यन्त अभ्यासी ही इस बात को कहने की क्षमता रख सकता है।

127

देश की सामाजिक दुरावस्था

समाज का धार्मिक रूप से कितना पतन हो चुका था, जिन्होंने उपदेश देना था वो ही जब पतन 
के जिम्मेदार हों तो दयानन्द दोष किसको दें? ऐसी अवस्था में दयानन्द भूखे ही सो जाते हैं, 
महाराज कल रात आपने भोजन नहीं किया, पूछने पर दयानन्द अपने शिष्य से कहते हैं –

“महाशय! इस देश में इतना अधर्म और अज्ञान फैल रहा 
है कि गत दिन के मेले पर लोग अपनी लड़कियां तक पण्डों 
को दान कर रहे थे। देश की इस अधोगति को देखकर मेरा 
हृदय अतीव व्यथित हुआ। इसी शोक और चिन्ता में मग्न 
बैठे, एक तो गंगा पर ही से मैं बड़ी रात बीते यहां आया और 
दूसरे यहां आकर भी वही मानस वेदना व्याकुल करती रही। 
इसीलिए भूख और भोजन का ध्यान तक नहीं आया।”

- श्रीमद्दयानन्द प्रकाश

128

दूसरों के दोष कब देखने चाहिए?

गहराई से देखें तो इस वाक्य में समाज के विरोधाभास का समाधान छिपा है। सब अपने दोष देखें 
तो किसी को किसी के दोष निकालने का कारण ही नहीं रहेगा। प्रथम अपने दोष देखें :-

बहुत मनुष्य ऐसे हैं, जिनको अपने दोष तो नहीं दिखते 
किन्तु दूसरों के दोष देखने में अति उद्यत रहते हैं। यह 
न्याय की बात नहीं, क्योंकि प्रथम अपने दोष निकालने के 
पश्चात् दूसरे के दोषों में दृष्टि देके निकालें।

- (सत्यार्थप्रकाश अनुभूमिका पृ. ३७९)

129

धन का उपयोग क्या करें?

समाज में दान व धर्म के लिए दिए जाने वाला धन अन्यान्य कार्यों में खर्च होता था, इसलिए दयानन्द 
धन का सामजिक जीवन के उत्थान के लिए उपयोग करने की व्यवस्था देते हैं –

जो धन प्राप्त हो उसे तीन कार्यों मे व्यय करना। १. 
वेदों के सम्बन्ध में ज्ञान और पुस्तक प्रचार में। २. सदाचार 
की शिक्षा देने वाली सभाओं की सहायता में। ३. दीन दरिद्रों 
की सहायता में।

- ऋ. द. स. के. पत्र और विज्ञापन भाग- १

महर्षि के आने से पूर्व धर्म के नाम पर दिया गया दान केवल मन्दिरों के चढ़ावे में जाता था, 
महर्षि की प्रेरणा से ये धन विद्यालय, गुरूकुल, गौशाला, अनाथालय, अस्पताल 
और साहित्य, प्रचार में लगाने की क्रान्ति आरम्भ हुई।

130

पांच हजार साल पहले अमेरिका से भारत का सम्बन्ध था?

दयानन्द आधार के साथ कहते हैं कि 5000 वर्ष पूर्व हमारा शानदार वैभव था, दूर देशों में आने-जाने के 
साधन थे और सारे विश्व में हमारा सम्पर्क और सम्बन्ध था –

अर्जुन का विवाह :- जिस प्रकार के भाप के एंजिन आज चलने लगे हैं वैसे घूम्रयानों का प्रयोग पुराकाल में 
भी इस देश में होता था। आज हम समुद्रपारीय देशों की यात्राओं को धर्म से विरुद्ध कृत्य समझ बैठे हैं, किन्तु 
हमारे ही एक पूर्वज पाण्डव अर्जुन ने अमेरिका देश (पाताल) जाकर वहाँ की राजकन्या उलोपी से विवाह किया था। भला 
उस समय कलिवर्ज्य का पाखण्ड कहाँ था? यूरोपीय देशों को अमेरिका का पता चाहे सोलहवीं शताब्दी में ही लगा, 
परन्तु आर्यावर्त वासियों को तो उस महाद्वीप का ज्ञान बहुत पूर्व ही था।

- नव. जा. के. पु. म. द. स.

- सोचो कि धार्मिक अंधविश्वास के चलते समुद्र यात्राएं बन्द हुई, व्यापार नष्ट हो गया 
और हमारा सम्पर्क दुनिया से कटता चला गया और हम दरिद्र, गरीब और गुलाम हो गए।

131

वस्त्र क्यों पहनें?

महर्षि दयानन्द के अनुसार वस्त्र देश, काल एवं ऋतु के अनुकूल 
पहिने जाने चाहिए, किसी को छोटा और अपने को बड़ा दिखाने के लिए नहीं –

“वस्त्र पहनने के बाद वस्त्रों से छुटाई, बड़ाई का प्रदर्शन न हो अर्थात् गरीब 
और अमीर सबकी वेशभूषा में कोई विशेष अन्तर नहीं हो। क्योंकि भोजन तो 
घर में बैठकर किया जाता है। प्रायः भोजन के प्रदर्शन का कम अवसर 
आता है परन्तु वस्त्र से प्रदर्शन होता है।”

- स्वामी दयानन्द का आर्थिक चिन्तन

- क्या आज ऊंच-नीच, गरीब-अमीर की खाई खत्म करने में ये वाक्य मार्गदर्शक 
प्रतीत नहीं होता?

132

चिकित्सक के दो प्रकार

शायद ही कोई विषय होगा, जिस पर महर्षि की दृष्टि न गई हो, दयानन्द दो प्रकार के 
चिकित्सकों को जनसेवा के लिए आवश्यक बताते हैं –

“पहले शरीर के रोगों का हरण करने वाले, दूसरे जो मन के अविद्यादि रोगों 
के विनाशक अध्यापक, उपदेशक सामाजिक चिकित्सा करने वाले।”

- स्वामी दयानन्द का आर्थिक चिन्तन

- यानि महर्षि दयानन्द की दृष्टि में समाज को राह दिखाने वाले भी चिकित्सक ही हैं।

133

चिकित्सा

राजाओं को पत्र लिखते समय महर्षि सरकार द्वारा निःशुल्क 
चिकित्सालयों की स्थापना पर जोर देते हैं –

“राज्य को चाहिए कि वह प्रजा के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए निःशुल्क चिकित्सालयों 
की स्थापना करे। इन चिकित्सालयों में दो प्रकार के वैद्य रखे- पहला रोग चिकित्सक 
और दूसरा प्रदूषण नाशक अथवा पर्यावरण चिकित्सक। राजा को अपने राज्य में 
यह भी व्यवस्था करनी चाहिए कि अनाड़ी वैद्य, अप्रशिक्षित वैद्य और विरोधी वैद्य 
चिकित्सा न करने पावे।”

- स्वामी दयानन्द का आर्थिक चिन्तन

- आज निःशुल्क चिकित्सा सरकारों की जिम्मेदारी है और गैर मान्यताप्राप्त चिकित्सकों 
के लिए दण्ड की व्यवस्था भी है।

134

पशु, पेड़, पौधे, बाग-बगीचा एवं ललित कलाओं आदि की आवश्यकता

क्या 150 वर्ष पूर्व दयानन्द को आवश्यकता लग रही थी कि देश में चिड़ियाघर होने चाहिए, 
बड़े-बड़े उद्यान होने चाहिए और पौधशालाएं होनी चाहिए, बड़े-बड़े संगीत विद्यालयों 
की जरूरत को महसूस करते हुए वे लिखते हैं –

“प्रजा के लिए पेड़ पौधे, पशु, बाग-बगीचा आदि की प्राप्ति कराए। तथा राज्य में 
संगीत आदि के विद्यालय स्थापित कर, सबको संगीत आदि कलाओं की शिक्षा 
देकर उन्हें विभिन्न कलाओं से समृद्ध करें।”

(पूना प्र. (उपदेश मंजरी) पृ. १४)

पहला चिड़ियाघर 1875 में कोलकाता में खोला गया, आज भारत में 355 चिड़ियाघर 
हैं। आज ये सब कार्य कल्याणकारी सरकारों की जिम्मेदारियां हैं।

135

भीख मांगने वाले को सजा

राजा (सरकार) द्वारा गरीब को बेहतर और निःशुल्क शिक्षा देकर धनी बनाने की बात कहकर एक प्रकार से ‘फ्री’ 
की व्यवस्था को वे नकारते हैं। उसी क्रम में वे भिखारी को सजा देने के पक्ष में हैं। शायद वे जानते थे भीख मांगना 
अनेक अपराधों को जन्म देता है। आज भी हजारों बच्चे अपंग इसलिए कर दिए जाते हैं कि उनसे भीख मंगवाई
जा सके। भीख मांगना-मंगवाना एक बड़ी इंडस्ट्री का भयावह रूप ले चुका है- धन्य दयानन्द तेरी दृष्टि

“वही राजा और राजपुरुष उत्तम होते हैं कि जो सब प्रकार से रक्षा करके 
प्रजा को धनाढ्य करते हैं। राजादिपुरुषों को चाहिए कि दरिद्रों को धनाढ्‌यों 
से भी अच्छी शिक्षा दे के धनाढ्य करें। जो भीख मांगकर अपना जीवन निर्वाह 
करे राजा उसको दण्ड देवे। अर्थात् राजा जहां परिश्रमियों का सत्कार करे 
वहां निठल्ले और परिश्रमहीनों को दण्ड भी दें।”

- स्वामी दयानन्द का आर्थिक चिन्तन

- 1959 में भीख मांगने को कानूनी अपराध घोषित किया गया था। ‘बोम्बे प्रिनेंशन 
ऑफ बेगिंग एक्ट’ में भारत के 20 राज्यों में लागू है

136

व्यापारियों की सुरक्षा

महर्षि विदेश व्यापार को देश की उन्नति का मूल मानते हैं और 
व्यापारियों की समस्त व्यवस्था और सुरक्षा का दायित्व सरकारों को देते हैं

जो व्यापारी देश-देशान्तर और दीप-द्वीपान्तर में व्यापार करने जावे उनकी सुरक्षा का पूर्ण 
प्रबन्ध राज्य करे। राजा देश-देशान्तर में व्यापार करने वाले व्यापारियों को सुरक्षित 
स्थान प्रदान करे।

- स्वामी दयानन्द का आर्थिक चिन्तन

137

व्यापारी को सरकारें क्या दें?

राजमार्ग - सुरक्षा - सम्मान - पुरस्कार

व्यापार के लिए उपयुक्त व्यवस्थाएं करने हेतु राजाओं को व्यापार के लिए भयमुक्त राजमार्ग उपलब्ध करवाने 
का निर्देश देते हैं। जिस समय विमान आदि का अस्तित्व ही नहीं था, तब अपने पत्रों में ‘विमान’ शब्द का 
उपयोग करना प्राचीन भारत के विज्ञान और वैभव के प्रति ऋषि का कितना आत्मविश्वास प्रदर्शित करता है –

राज्य का यह कर्तव्य है कि वह व्यापारियों को देश-विदेश में पहुँचाने का प्रबन्ध करे। राजा ऐसे मार्गों को बनावे 
जिनमें व्यापारियों को चोर, डाकुओं से कोई भय न हो।

दुर्गम पर्वतों आदि पर भी राज्य सुव्यवस्थित मार्गों का निर्माण करे। समुद्र, भूमि, अन्तरिक्ष में रथ, नौका, विमानों 
के लिए सरल, दृढ, कण्टक, चोर, डाकू के भय आदि दोष से मुक्त मार्गों का सम्पादन राजा को करना चाहिए।
ताकि निर्भय होकर लोग आना-जाना कर सकें।

- स्वामी दयानन्द का आर्थिक चिन्तन

- आज की सरकारें दुर्गम स्थानों तक पहुंच बनाने के लिए सुरंगें, पुल, सड़कें आदि 
तैयार कर रही हैं - दयानन्द के उस समय की दृष्टि को विचारें तों एक बार।

138

गोदाम व्यवस्था - किसान कैसे उन्नति करेगा

दयानन्द उस समय कृषि की और कृषक की स्थिति को देखकर जो जरूरत महसूस करते हैं, उसको आप सूक्ष्म दृष्टि नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे –

“अन्नादि एवं उत्पादित वस्तुओं को सुव्यवस्थित रूप से रखने एवं भविष्य में 
सुरक्षित रखने के लिये भी वेदभाष्यादि ग्रन्थों में अनेक संकेत मिलते हैं।”

- स्वामी दयानन्द का आर्थिक चिन्तन

- आज कल्याणकारी सरकारें बड़े-बड़े गोदाम तैयार करने के लिए सरकारी 
सहायता (Subsidy) और लोन उपलब्ध करवाती है।

139

प्रजा के परोपकार हेतु उत्तम कर (टैक्स) व्यवस्था

दयानन्द बेहतर राष्ट्र निर्माण के लिए, कल्याणकारी व अनिवार्य कर 
के पक्ष में हैं, उनके तर्क और शब्दों को देखें –

राजा को व्यापारी से कर लेते समय व्यापारी की खरीद और बिक्री, उस पर लाभ और भरण-पोषण-व्यय को 
ध्यान में रखते हुए कर लेना चाहिए। राज्य में व्यापार से जीविका करने वाले प्रत्येक व्यक्ति से राजा को थोड़ा 
बहुत तो वार्षिक कर के नाम से कुछ न कुछ लेना ही चाहिए। राजा कर लेते समय लोभ न करे। अधिक लोभ 
करने से राजा और प्रजा दोनों के सुख मूल नष्ट होते हैं। जिस प्रकार राजा, प्रजा की आय-व्यय की स्थिति देखकर 
कर लेता है और उसके बदले में वह उसी धन को प्रजा के परोपकार में लगा देता है, उसी प्रकार प्रजा का भी कर्तव्य 
हो जाता है कि वह बहुत ही ईमानदारी से अपना कर्त्तव्य समझ कर राजा को बिना कर की चोरी किए कर देवे।

- स्वामी दयानन्द का आर्थिक चिन्तन

- टैक्स व्यवस्था के मूल की शानदार व्यवस्था दी है महर्षि ने।

140

क्या सरकार सारी सुविधाएं निःशुल्क दे?

रोड टैक्स - टोल टैक्स

राज्य सरकार सुविधाओं के बदले शुल्क प्राप्त करे ताकि राज्य व्यवस्था सुचारु रूप से संचालित हो सके, 
पर साथ ही अत्यन्त लम्बे महासागर की यात्राओं को शुल्क मुक्त करने की
बात भी कहते हैं दयानन्द –

“समुद्र, खाड़ी और छोटी-बड़ी नदियों में जहाज, नाव आदि से यात्रा करने पर 
मार्ग की लम्बाई इत्यादि को ध्यान में रखते हुए कर-शुल्क निर्धारित किया जाना 
चाहिए। परन्तु महासमुद्र की यात्रा को कर-शुल्क मुक्त रखा जाना चाहिए।”

- स्वामी दयानन्द का आर्थिक चिन्तन

- तर्क संगत (लॉजिकल) टैक्स के पक्षधर हैं दयानन्द

141

कृषि - बैल आदि को सब पुत्र-पितावत (माता-पिता समान) समझें

“जैसे अग्नि में होम किया द्रव्य तेज के साथ ही सूर्य को प्राप्त होता है और सूर्य 
जलादि को आकर्षित कर वर्षा करके सबकी रक्षा करता है। कृषिवलादि को सब 
राज्य के सुख का मूल कारण समझें और उनसे पुत्र-पितावत् वर्ते।”

शब्दार्थ : कृषिवलादि - कृषि और बैल आदि

142

गरीब व्यक्ति को भोजन बनाने के ईंधन पर कर न हो

अंग्रेजी साम्राज्य में जंगल कानून के अन्तर्गत पशुओं के चारे के लिए घास और स्वयं के चूल्हे के लिए 
लकड़ी इकट्ठी करने पर भी कर (टैक्स) लगा दिया था, जबकि उस समय लकड़ी ही एकमात्र भोजन पकाने 
का साधन था - दयानन्द गरीबी के इस साधन पर तो कम से कम कर लगाना उचित नहीं मानते।

“गरीब लोग घास छेदन करके ले जाएं या लकड़ी का भार ले जाएं तो उनके ऊपर 
कौड़ियों के लगने से उनको अवश्य क्लेश होता होगा। इससे नौन रोटी से जो कर 
स्थापन है सो हमारी समझ में अच्छा नहीं।”

- (स. प्र. प्रथम संस्करण,)

143

प्रबन्धन और कर्मचारी सम्बन्ध के विषय में निर्देश

“उद्योग के स्वामी अथवा प्रबन्धकों को चाहिए कि वह अपने नौकरों के वस्त्र और 
निवास की व्यवस्था करें।”

“मृत्यों और सेवकों को श्रेष्ठ भोजन आदि देकर आनन्दित करें।”

- स्वामी दयानन्द का आर्थिक चिन्तन

- आज अच्छी व्यापारिक ईकाइयां अपने कर्मचारियों के लिए वेशभूषा (यूनीफार्म), 
रहने के लिए कालोनी (आवास) और कैन्टीन (जलपान गृह) में निःशुल्क अथवा 
थोड़े शुल्क पर भोजन का प्रबन्ध करती हैं।

144

गलत दिशा में जाने वालों को भी समझाएं जरूर

गलत मत की ओर जाने वालों को समझाने की जरूरत समझाते हुए 
वे कहते हैं –

“अपने वा पराये राज्य में जहां तक शक्य हो किसी मतवाले की बहकावट से 
विद्यायुक्ति-विरुद्ध मत में किसी को न फसने देवें। यदि कोई समझाने पर न माने 
जो कूप में गिरना ही चाहे तो उसका अभाग्य समझना चाहिए।”

- पत्र व्यवहार

145

प्राचीन वैभवकाल में भारत में विमान

आर्यावर्त के प्राचीन वैभव को कहते हुए उनके वाक्य पर विचार करें –

दयानन्द प्राचीन काल के वैभव को बताते हुए इतने गौरवान्वित हैं, वही वैभव वापस 
लाने के लिए ही दयानन्द प्रेरित कर रहे हैं। बड़ी बात है - जब दुनिया में विमान न 
थे, न विमान विद्या तो दयानन्द आखिर किस आत्मविश्वास के साथ यह कह रहे हैं? 
ये विचारने की बात है। दयानन्द जी को अपने प्राचीन इतिहास पर पूर्ण विश्वास था,
अन्यथा वो ऐसे ही विमान का नाम न लेते –

“उस समय दरिद्रों के घर में भी विमान थे।”

(पूना प्र. (उपदेश मंजरी)

146

इतिहास में असत्य स्वीकार नहीं

एक जीवनी लेखक ने अति उत्साह में प्रशंसा करते समय कुछ अधिक लिख दिया, 
जो वास्तव में हुआ नहीं था। दयानन्द प्रसन्न नहीं दुःखी हैं, वे लेखक को लिखते हैं –

“किन्तु जब आपको मेरा इतिहास ठीक-ठीक विदित नहीं, तो उसके लिखने में 
कभी साहस मत करो। क्योंकि थोड़ा-सा भी असत्य हो जाने से सम्पूर्ण निर्दोष 
कृत्य बिगड़ जाता है।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-१)

147

महापुरुषों का स्वांग रचना उनका सम्मान नहीं अपमान है

वे महापुरुषों के स्वांग रचकर नाच आदि करने के पूर्ण विरोधी थे –

“तुम कैसे क्षत्रिय हो जब कि तुम्हारे सामने वे (रामलीला और रासलीला वाले) 
तुम्हारे पुरुषाओं को नचाते हैं। यदि तुम्हारी बहिन-बेटी को कोई नचाये, तो कैसा 
बुरा मानो।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-१)

- उनके वाक्य को जरा आंख बन्द करके सोचें जरुर।

148

अनावश्यक मौन भी अनुचित

एक दिन एक मौनी साधु उनकी सेवा में पहुँचे तो उसे 
अनावश्यक रूप से मौन धारण करने वाला जानकर महाराज बोले

“यदि तू मूर्ख है, तब तेरा मौन रहना उचित है, किन्तु यदि तू पठित है और 
समझदार है, तब तुझे बोलना ही चाहिए।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-१)

अनावश्यक रूप से मौन रखकर, एक पैर पर खड़ा रहकर, लम्बे बाल रखकर, 
तप करने-कराने, को दयानन्द केवल दिखावा मानते हैं।

149

वेद ही ईश्वर का दिया ज्ञन

महर्षि की वेद के प्रति अगाध आस्था है तथा वे उसी के प्रचार हेतु जीवन को समर्पित करना चाहते हैं

“वेद प्रतिपादित एक, अद्वितीय, निराकार परमात्मा की उपासना का प्रचार हो, यही मेरा अभीष्ट है। मैं इसी वेद प्रतिपादित धर्म के प्रचार हेतु यत्नशील हूँ।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-१)

150

मन्त्र की शक्ति क्या है?

मन्त्र शब्द को लेकर बड़ा अंधविश्वास है। स्वामी जी ने स्पष्ट किया मन्त्र नाम विचार का है, उसके बोलने मात्र से कभी कुछ भी होने वाला नहीं, उसका चिन्तन और उसके अनुसार किए गए कर्म का ही परिणाम होता है -

यदि “मन्त्र इस अभिप्राय से पढ़ते हैं कि इनसे भूत-प्रेतादि भाग जाते हैं। परन्तु केवल मन्त्र पढ़ने मात्र से कुछ नहीं होता। एक मक्खी भी मन्त्र बोलकर नहीं उड़ाई जा सकती, पुनः भूत-प्रेतादि की बात करना निरर्थक है।” इसी प्रकार वैष्णवों के कण्ठी-तिलक धारण करने के मिथ्या माहात्म्य की आलोचना करते हुए उन्होंने स्पष्ट कहा, “लोग कहते हैं कि इन वैष्णव चिन्हों के धारण करने से यमराज भयभीत हो जाता है, अरे, पुलिस के सिपाही तो कण्ठी तिलक से नहीं डरते, यमराज के दूत भला क्या डरेंगे?”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-१)

151

धर्मोपदेश में नींद क्यों आ जाती है

किसी भक्त के पूछने पर कि नृत्य आदि देखने पर नींद नहीं आती, जबकि गम्भीर एवं हितकारी धर्मोपदेश को सुनते ही उन्हें नींद आने लगती है। उत्तर में महर्षि ने बताया कि -

“विषयवासना के दूषित भावों से परिपूरित नृत्यगीतादि उत्तेजक होते हैं, अतः उनके देखने वालों को भला नींद कैसे आ सकती है? इसके विपरीत धर्मोपदेश अत्यन्त शान्तिप्रद, आह्लाद दायक तथा विश्रान्तिपूर्ण होता है। यही कारण है कि धर्म उपदेश के सुनने वालों की शारीरिक एवं मानसिक उत्तेजनाएँ एवं व्याकुलता समाप्त हो जाती है और वह सुखद नींद लेने लगते हैं।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-१)

152

सत्य की सबसे सरल परिभाषा

“जो पदार्थ जैसा है उसको वैसा ही कहना लिखना और मानना सत्य कहाता है।”

- सत्यार्थ प्रकाश एक अध्ययन

153

आत्मा का स्वरूप

“मनुष्य का आत्मा सत्यासत्य का जानने वाला है तथापि अपने प्रयोजन की सिद्धि, हठ, दुराग्रह और अविद्यादि दोषों से सत्य को छोड़ असत्य में झुक जाता है”

- सत्यार्थ प्रकाश भूमिका

154

ईश्वर का सर्वोत्तम नाम

“ओ३म् शब्द परमेश्वर का सर्वोत्तम नाम है।”

- सत्यार्थ प्रकाश समु० १

155

ग्रहदोष आदि अंधविश्वासों का खण्डन

मनुष्यों पर ग्रहों आदि के चढ़ने वाले अंधविश्वासों पर दयानन्द वैज्ञानिक चोट करते हैं -

“जैसी यह पृथिवी जड़ है वैसे ही सूर्यादि लोक हैं। वे ताप और प्रकाशादि से भिन्न कुछ भी नहीं कर सकते।”

- सत्यार्थ प्रकाश समु० २

156

ऋषियों द्वारा रचित आर्ष ग्रन्थ अमूल्य

ऋषियों के लिखे ग्रन्थों के स्थान पर मनुष्यों द्वारा रचित ग्रन्थों का प्रसिद्ध हो जाना। महर्षि बहुत हानिकारक मानते थे, वेद के पश्चात् वे ऋषियों द्वारा रचित वेदानुकूल आर्ष ग्रन्थों को ही प्रमाण स्वीकार करते है, क्यों?

“आर्ष ग्रन्थों का पढ़ना ऐसा है जैसा एक गोता लगाना और बहुमूल्य मोतियों का पाना।”

- सत्यार्थ प्रकाश समु० ३

“ऋषि प्रणीत ग्रन्थों को इसलिये पढ़ना चाहिये कि वे बड़े विद्वान् सब शास्त्रवित् और धर्मात्मा थे।”

- सत्यार्थ प्रकाश समु० ३

157

सबसे श्रेष्ठ दान कौन सा?

“संसार में जितने दान हैं अर्थात् जल, अन्न, गौ, पृथिवी, वस्त्र, तिल, सुवर्ण और घृतादि इन सब दानों से वेद-विद्या का दान अति श्रेष्ठ है।”

- सत्यार्थ प्रकाश समु० ३

158

वेद के बिना ज्ञान कहां से आता?

वेद विद्या के प्राचीनतम होने का प्रमाण देते हुए महर्षि दयानन्द लिखते हैं कि मनुष्य बिना ज्ञान दिए कुछ नहीं सीख सकता। इसी से सिद्ध होता है कि सृष्टि के प्रारम्भ में भी किसी ने तो ज्ञान दिया ही होगा। वो ज्ञान वेद है और उसका प्रदाता ईश्वर ही है -

“जैसे जंगली मनुष्य सृष्टि को देखकर भी विद्वान नहीं होते और जब उनको शिक्षक मिल जाय तो विद्वान् हो जाते हैं और अब भी किसी से पढ़े बिना कोई भी विद्वान् नहीं होता। इस प्रकार परमात्मा उन आदि सृष्टि के ऋषियों को वेद विद्या न पढ़ाता और वे अन्य को न पढ़ाते तो सब लोग अविद्वान् ही रह जाते।”

- सत्यार्थ प्रकाश समु० ७

159

सदाचार से ही कल्याण

एक अनपढ़ रूई धुनने वाला व्यक्ति धर्मोपदेश सुनने की इच्छा से आया और उसने महर्षि से पूछा -

“महाराज! मैं निर्धन व्यक्ति हूँ मेरा कल्याण कैसे होगा? स्वामीजी बोले- “सदाचारपूर्वक जीवन बिताओ। जितनी रुई किसी से लो, धुनकर उसे उतनी ही वापस दे दो। मन से सबका हित चिन्तन करो। इसी से तुम्हारा कल्याण हो जाएगा।”

महर्षि दयानन्द चरित

160

स्वदेश की एकता का मूलमन्त्र

उस समय की बिखरी रियासतों और भाषा आदि की अनेकता का समाधान वो एक भाषा और एक विचार को देते हैं -

“जब तक समस्त देशवासी एक ही धर्म के अनुयायी, एक ही भाषा बोलने वाले तथा एक ही प्रकार के आचार-विचार एवं व्यवहार को धारण कर एक ही लक्ष्य की पूर्ति हेतु सर्वात्मना कृत निश्चय नहीं हो जाते तब तक स्वदेश की एकता तथा उसकी सर्वांगीण समृद्धि स्वप्न मात्र ही रहेगी।”

- महर्षि दयानन्द चरित

161

स्वतन्त्रता की परिकल्पना करते दयानन्द

भारत की आजादी से 75 साल पहले दयानन्द भला इससे अधिक और क्या उद्घोष कर सकते थे -

“अन्य देशवासी राजा हमारे देश में कभी न हों तथा हम लोग पराधीन कभी न रहें।”

- आर्याभिविनय / भारत भाग्य विधाता दयानन्द

- काँग्रेस के प्रथम अधिवेशन के अध्यक्ष श्री व्योमेश चन्द्र बनर्जी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में अंग्रेजी राज्य को ‘अमूल्य वरदान’ बताया था? और काँग्रेस ने उसके 44 वर्ष बाद 31 दिसम्बर 1929 को पूर्ण स्वराज्य की प्राप्ति को अपना लक्ष्य निश्चित किया था।

162

आर्य भारत के मूल निवासी - कहीं बाहर से नहीं आए

आर्य ही इस देश के मूल निवासी थे, तिब्बत से वे ही सीधे यहां आकर बसे- तभी से इसका नाम आर्यावर्त चलता आया। हमें अपने ही देश में पराया बनाने लिए अंग्रेजों ने इस कपोल कल्पित इतिहास की रचना की, जिसको दयानन्द ने सर्वप्रथम सिरे से नकारने का दृढ़ साहस किया।

“किसी संस्कृत ग्रन्थ में वा इतिहास में नहीं लिखा कि आर्य लोग ईरान से आये और यहाँ के जंगलियों से लड़कर, जय पाके, उन्हें निकाल के इस देश के राजा हुए। पुनः विदेशियों का लेख माननीय कैसे हो सकता है? आर्य लोग सृष्टि के आदि में कुछ काल के पश्चात् तिब्बत से सीधे इसी देश में आकर बसे थे। इससे पूर्व इस देश का कोई नाम भी नहीं था और न कोई आर्यों से पूर्व इस देश में बसते थे।”

- सत्यार्थ प्रकाश अष्टम समुल्लास

163

भारत के गौरवमयी इतिहास पर गर्व न करने वाले लोगों से सावधान

आज तक इतिहास की ऐसी गवेषणा बड़े-बड़े इतिहास वेत्ता भी नहीं कर सके -

“इस्लाम के इतिहास से सभी भली-भाँति परिचित हैं। यह ठीक है कि भारत में रहने वाले प्रायः सभी मुसलमान मूलतः इसी देश के वासी हैं, किन्तु आठ सौ वर्ष से इस धरती के अन्न-जल से पोषण पाकर भी वे इस देश के नहीं बन सके। भारत के मुसलमानों ने कभी इस देश पर शासन नहीं किया। शासन करने वाले मुगल, पठान, खिलजी, लोदी, गोरी, आदि सभी आक्रमणकारी विदेशी मुसलमान थे, परन्तु जितना गर्व उन्हें इन विदेशी आक्रमणकारियों और इस देश के लोगों पर अत्याचार करने वालों पर है उतना इस देश में पैदा हुए राम, कृष्ण और ऋषि-मुनियों पर अथवा इस देश के लिए मर मिटने वाले राणा प्रताप, शिवाजी आदि पर नहीं है।”

- (भारत भाग्य विधाता दयानन्द)

164

चित्र की नहीं चरित्र की पूजा के पक्षधर थे दयानन्द

“नाना प्रकार की विरुद्धस्वरूप-नाम-चरित्रयुक्त मूर्तियों के पुजारियों का ऐक्यमत नष्ट होके विरुद्धमत में चलकर आपस में फूट बढ़ा के देश का नाश करते हैं। जो मूर्ति के भरोसे शत्रु का पराजय और अपना विजय मान के बैठे रहते हैं उनका पराजय होकर राज्य, स्वातंत्र्य और सुख उनके शत्रुओं के अधीन हो जाता है, क्यों पत्थर पूजकर सत्यानाश को प्राप्त हुए? देखो, जितनी मूर्तियाँ पूजी हैं उनके स्थान में शूरवीरों की पूजा करते तो कितनी रक्षा होती?”

- (भारत भाग्य विधाता दयानन्द)

165

एकता के बल को समझाते महर्षि

उस समय की परिस्थितियों का आकलन करने के पश्चात् देश के सुख के लिए भाषा और शिक्षा की एकता चाहते हैं- दयानन्द
जब तक एक मत, एक हानि-लाभ, एक सुख-दुःख आपस में समान समझते थे तभी तक सुख था, परन्तु दयानन्द के अनुसार -

भिन्न-भिन्न भाषा, पृथक् पृथक् शिक्षा, अलग-अलग व्यवहार के विरोध का छूटना अति दुष्कर है। बिना इसके छूटे परस्पर का उपकार और अभिप्राय सिद्ध होना कठिन है।

- (भारत भाग्य विधाता दयानन्द)

166

उन्नति का मूल एकता

“एक धर्म, एक भाषा और एक लक्ष्य बनाए बिना भारत का पूर्ण हित और जातीय उन्नति होना कठिन है। सब उन्नतियों का केन्द्रस्थान ऐक्य है। जहाँ भाषा, भाव और भावना में एकता आ जाए वहाँ सागर में नदियों की भाँति सारे सुख एक-एक करके प्रवेश करने लगते हैं। मैं चाहता हूँ कि देश के राजे-महाराजे अपने शासन में सुधार और संशोधन करें। अपने राज्य में धर्म, भाषा और भावों में एकता करें। फिर भारत में आप ही सुधार हो जाएगा।”

- भारत भाग्य विधाता दयानन्द

167

स्वदेशी सामान का उपयोग करने की प्रेरणा

स्वामी जी स्वदेशी के बेहद समर्थक थे। एक बार अपने शिष्य को विदेशी वस्त्र पहनते देख वे कहने से स्वयं को रोक नहीं पाए -

“देखो, कुछ सौ वर्ष से ऊपर इस देश में आर्य यूरोपियनों के हो गये और आज तक ये लोग वैसे ही मोटे कपड़े आदि पहनते हैं, जैसे कि स्वदेश में पहनते थे, परन्तु उन्होंने अपने देश का चलन नहीं छोड़ा। तुममें से बहुत से लोगों ने उनकी नकल कर ली। अनुकरण करना बुद्धिमानों का काम नहीं। इससे तुम निर्बुद्धि और वे बुद्धिमान् ठहरते हैं। वे अपने देश वालों को व्यापार में सहायता देते हैं, इत्यादि गुणों और अच्छे कर्मों से उनकी उन्नति है।”

- भारत भाग्य विधाता दयानन्द

एक शिष्य के पुत्र को विदेशी वस्त्र पहने देखकर स्वामीजी कहते हैं -

“क्या तुम विदेशी कपड़ों से बने इस नये वेश से विभूषित होकर अपने पिताजी से अधिक सुसंस्कृत हो गये हो?”

- भारत भाग्य विधाता दयानन्द

- इन दोनों वाक्यों से उनके अन्दर चल रहे स्वदेश भक्ति के भावों को पढ़ने का प्रयास करें। उस युग में जब हर व्यक्ति अपने को अंग्रेज भक्त दिखाने में ही प्रयासरत था तब स्वामी जी हमें स्वदेश भक्ति का और स्वदेश हित का कैसा उपदेश दे रहे हैं।

168

स्वयं की विचारधारा का मूल उद्देश्य

आर्यसमाज की स्थापना पर अपना मन्तव्य बताते दयानन्द

“मेरा कोई नवीन कल्पना वा मतमतान्तर चलाने का लेशमात्र भी अभिप्राय नहीं है किन्तु जो सत्य है उसको मानना, मनवाना और जो असत्य है उसको छोड़ना और छुड़वाना मुझको अभीष्ट है।”

- (सत्यार्थ प्रकाश विमर्श)

शब्दार्थ : अभीष्ट - इच्छा

169

सत्यार्थ प्रकाश लेखन का उद्देश्य

स्वामी जी सबको एक मत करना चाहते थे और सब अपने-अपने ग्रन्थों की अलग-अलग बातों को आराम से देख सकें, इसलिए सत्यार्थ प्रकाश की रचना का उद्देश्य बताया -

“सब मतवादियों, इनके चेलों और अन्य सबको परस्पर सत्याऽसत्य के विचार करने में अधिक परिश्रम न हो, इसलिये यह ग्रंथ बनाया है। जो-जो इसमें सत्य मत का मण्डन और असत्य का खण्डन लिखा है, वह सबको जनाना ही प्रयोजन समझा गया है। पक्षपात छोड़कर इसको देखने से सत्याऽसत्य मत सबको विदित हो जायगा। पश्चात् सबको अपनी-अपनी समझ के अनुसार सत्य मत का ग्रहण करना और असत्य मत को छोड़ना सहज होगा (अनुभूमिका १)”

- (सत्यार्थ प्रकाश)

170

सत्यार्थ प्रकाश का उद्देश्य

सत्यार्थ प्रकाश में अन्य मत-मतान्तरों की समीक्षा करते हुए इसे लिखने का आशय बता रहे हैं दयानन्द

“यह लेख केवल सत्य की वृद्धि और असत्य के हास होने के लिये है, न कि किसी को दुःख देने वा हानि करने अथवा मिथ्या दोष लगाने के अर्थ है। सब मनुष्यों को उचित है कि सबके मतविषयक पुस्तकों को देख-समझकर कुछ सम्मति वा असम्मति देवें वा लिखें, नहीं तो सुना करें। जो-जो सर्वमान्य सत्य विषय हैं वे तो सबमें एक से हैं झगड़ा झूठे विषयों में होता है।”

- अनुभूमिका- ३ - सत्यार्थ प्रकाश

निष्कर्ष - सत्य बातें तो सब ग्रन्थों में लगभग एक ही है। विवाद मिलावटी स्वार्थपूर्ण और झूठी बातों में ही हुआ करता है।

171

‘सत्यार्थ प्रकाश’ लिखने का उद्देश्य

अलग-अलग धर्मग्रन्थों में अगर विपरीत बातें लिखी हैं तो सामान्य व्यक्ति सही और गलत का कैसे पता लगा सकेगा। अतः महर्षि दयानन्द सब धर्म ग्रन्थों की समीक्षा को लिखने का कारण बताते हैं -

“यह लेख केवल मनुष्यों की उन्नति, सत्याऽसत्य के निर्णय के लिये है अर्थात् सब मतों के विषयों का थोड़ा-थोड़ा ज्ञान होवे, इससे मनुष्यों को परस्पर विचार करने का समय मिले और एक दूसरे के दोषों का खण्डन कर गुणों का ग्रहण करें। न कोई किसी पर झूठ चला सके और न सत्य को रोक सके”

- अनुभूमिका - ४ (सत्यार्थ प्रकाश)

172

विद्वानों का मुख्य काम क्या है?

“विद्वानों का यही काम है कि सत्याऽसत्य का निर्णय करके सत्य का ग्रहण, असत्य का त्याग करके परम आनन्दित होते हैं। वे ही गुण ग्राहक पुरुष विद्वान् होकर धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूप फलों को प्राप्त होकर प्रसन्न रहते हैं।”

- (सत्यार्थ प्रकाश)

173

इच्छा हो तो सत्य को जानना कठिन नहीं

“इसी मतमतांतर के विवाद से जगत् में जो-जो अनिष्ट फल हुए होते हैं और होंगे उनको पक्षपातरहित विद्वज्जन जान सकते हैं। जब तक इस मनुष्य जाति में परस्पर मिथ्या मतमतान्तर का विरुद्धवाद न छूटेगा तब तक अन्योऽन्य को आनंद न होगा। यदि हम सब मनुष्य और विशेष विद्वज्जन ईर्ष्या, द्वेष छोड़ सत्याऽसत्य का निर्णय करके सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग करना कराना चाहें तो हमारे लिये यह बात असाध्य नही है (अनुभूमिका- १)।”

- सत्यार्थ प्रकाश विमर्श

- विचार करें, आज जो दुनिया में विवाद, युद्ध, दुःख हैं, क्या उनके पीछे अलग-अलग मत-मतान्तर और विचारधाराओं का होना ही कारण नहीं है? महर्षि का कदम-कदम पर एक ही आह्वान है, सत्य और असत्य को जानने का प्रयत्न करो और असत्य को छोड़कर सत्य को ग्रहण करो, इसी में संसार का सुख है। पुनः इस भावना पर विचार करें हम सब।

174

श्रीकृष्ण को श्रेष्ठ पुरुष बताते दयानन्द -

महर्षि दयानन्द जी की श्रीकृष्ण जैसे योगी और विद्वान के प्रति गहरी आस्था और श्रद्धा थी, वे उन पर गलत आरोप लगाने वालों पर पूर्ण रूप से क्रोधित हैं। वे उनको निष्कलंक योगी और महाप्रतापी मानते हैं। उनका दुःख उन्हीं के शब्दों में देखें -

“देखो! श्रीकृष्ण का इतिहास महाभारत में अत्युत्तम है। उनका गुण, कर्म, स्वभाव और चरित्र आप्त पुरुषों के सदृश है। जिसमें कोई अधर्म का आचरण श्रीकृष्ण ने जन्म से मरणपर्यन्त बुरा काम किया हो, ऐसा नहीं लिखा। और भागवत में दूध, दही, मक्खन की चोरी, कुब्जा दासी से समागम, परस्त्रियों से रासमण्डल, क्रीड़ा आदि मिथ्या दोष श्रीकृष्ण में लगाये हैं। इसको पढ़-पढ़ा सुन-सुनाके अन्य मतवाले श्रीकृष्ण की बहुत सी निन्दा करते हैं। जो यह भागवत न होता तो श्रीकृष्णजी के सदृश महात्माओं की झूठी निन्दा क्योंकर होती?”

- सत्यार्थ प्रकाश

175

क्या पूर्व जन्म एवं पुनर्जन्म होता है?

दयानन्द पुनर्जन्म के प्रबल समर्थक हैं, वे लिखते हैं -

“पूर्वजन्म के पाप-पुण्य के अनुसार वर्तमान जन्म और वर्तमान तथा पूर्व जन्म के कर्मानुसार भविष्यत् जन्म होते हैं।”

- सत्यार्थ प्रकाश विमर्श

176

जीवात्मा (मनुष्य) कर्म करने में स्वतन्त्र है

“जीव आप ही आप स्वतन्त्र कर्मों को करता है ईश्वर कुछ नहीं कराता। ईश्वर जीवों के कर्मों को करने वा कराने वाला नहीं।”

- सत्यार्थ प्रकाश विमर्श

177

‘प्रार्थना’ क्या है?

दयानन्द बड़े विस्तार से प्रार्थना के फल को लिखते हैं, उनके अनुसार पुरुषार्थ के बिना प्रार्थना व्यर्थ है -

“अपने पूर्ण पुरुषार्थ के उपरान्त उत्तम कर्मों की सिद्धि के लिए परमेश्वर वा किसी सामर्थ्य वाले मनुष्य के सहाय लेने को प्रार्थना कहते हैं। अन्यत्र लिखा हैं- जितना अपने से प्रयत्न हो सके, उतना किया करे अर्थात् अपने पुरुषार्थ के उपरान्त प्रार्थना करनी योग्य है। जो परमेश्वर के भरोसे आलसी होकर बैठते हैं वे महामूर्ख हैं, क्योंकि जो परमेश्वर की पुरुषार्थ करने की आज्ञा है उसको जो कोई तोड़ेगा, वह सुख कभी न पावेगा।”

- सत्यार्थ प्रकाश विमर्श

178

मनुष्य की शानदार परिभाषा

“मनुष्य उसी को कहना कि जो मननशील होकर स्वात्मवत् अन्यों के सुख दुःख और हानि लाभ को समझे। अन्यायकारी बलवान् से भी न डरे और धर्मात्मा निर्बल से भी डरता रहे। इतना ही नहीं, किन्तु अपने सर्वसामर्थ्य से धर्मात्माओं- कि चाहे वे महा अनाथ, निर्बल और गुणरहित क्यों न हों उनकी रक्षा, उन्नति, प्रियाचरण और अधर्मी चाहे चक्रवर्ती सनाथ महाबलवान् और गुणवान् भी हो, तथापि उसका नाश, अवनति और अप्रियाचरण सदा किया करे अर्थात् जहां तक हो सके वहां तक अन्यायकारियों के बल की हानि और न्यायकारियों के बल की उन्नति सर्वथा किया करे। इस काम में चाहे उसको कितना ही दारूण दुःख प्राप्त हो, चाहे प्राण भी भले ही जावें, परन्तु इस मनुष्यरूप धर्म से पृथक् कभी न होवे।”

- सत्यार्थ प्रकाश विमर्श

179

छुआछूत के विरोधी दयानन्द

छुआछूत के विरोधी ब्राह्मण कुलोत्पन्न दयानन्द की इस सोच ने ही दलितोद्धार आन्दोलन को जन्म दिया -

“समाज के निम्न एवं दलित वर्ग के लोगों के प्रति विश्व को कुटुम्ब संन्यासी के हृदय में कैसा स्नेह भाव था, यह एक घटना से विदित होता है। एक कृषक मक्के की मोटी रोटियाँ बनाकर सेवा में उपस्थित हुआ और श्रद्धा विगलित स्वर में उन्हें स्वीकार करने का आग्रह करने लगा। महाराज ने निस्संकोच भाव से विपन्न भक्त के इस भक्तिपूरित अन्न को स्वीकार किया। कृषक ने गद्‌गद् कण्ठ से कृतज्ञता व्यक्त की।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-२)

180

गेहूँ की रोटी

एक बार एक गरीब व्यक्ति श्रद्धावश रोटी लेकर आया, उपस्थित लोगों ने जात्याभिनिवेश के वशवर्ती होकर महर्षि से पूछा- महाराज, यह तो नाई की रोटी है, क्या आप इसे स्वीकार कर लेंगे?

“इस पर महर्षि ने रोटी को उलट-पलट कर देखा, फिर विनोद भाव से कहा-” 
नाई की कहाँ, यह तो गेहूँ की रोटी है।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-२)

- जिस युग में खानपान विषयक कट्टरता अपनी चरम सीमा पर पहुँची हुई थी, उस समय तथाकथित निम्न वर्ग के लोगों के प्रति इस प्रकार की उदारता का प्रदर्शन अपने आप में एक नवीन अनुभव था।

181

न्यायकारी कौन ?

इसी प्रकार ‘न्यायकारी’ की परिभाषा की है-

“जो सदा विचारकर असत्य को छोड़ सत्य को ग्रहण करे अन्यायकारियों को हठावे और न्यायकारियों को बढ़ावे, अपने आत्मा के समान सबका सुख चाहे सो ‘न्यायकारी’ है। उनको मैं भी ठीक मानता हूं।”

- सत्यार्थ प्रकाश विमर्श

182

बिना परिश्रम कुछ नहीं

“जो परिश्रम बिना पदार्थ मिलता है उसमें प्रसन्नता भी नहीं होती बिना परिश्रम कुछ भी काम नहीं होता।”

- सत्यार्थ प्रकाश विमर्श

183

फलित ज्योतिष कल्पनामात्र है

एक ज्योतिषी उनके पास आया तो दयानन्द ने सामान्य व्यंग्य से बात कही -

“यदि आपके ज्योतिष ज्ञान ने आपको यह बताया है कि मैं आपको कुछ दूँगा, तो यह मिथ्या है, क्योंकि मैं आपको कुछ भी देने वाला नहीं हूँ। और यदि आपका शास्त्र आपको यह बता चुका है कि मुझसे कुछ मिलने वाला नहीं है, तो आपका यहाँ आना ही व्यर्थ हुआ।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग - २)

184

मृतक श्राद्ध व्यर्थ

मृतक की याद में श्राद्ध कर्म का दयानन्द स्पष्ट निषेध करते हैं -

“यदि वास्तव में मरे हुए को भोजन पहुँचता है और वही वस्तु मिलती है जो श्रद्ध में खिलाई जाती है तो जो लोग मांसभक्षी हैं, उन्हें थाल में मांस ही परोसना चाहिए। यदि वे नहीं खाते तो इससे स्पष्ट सिद्ध हो जाता है कि अपने कर्म से स्वर्ग-नरक मिलता है, मृतक श्राद्ध व्यर्थ है।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-२)

185

मृत्युभोज

“दाह-संस्कार के बाद मृतक के प्रति कोई कर्त्तव्य कर्म शेष नहीं रहता।”

यहाँ महर्षि ने धनी व्यक्तियों को सुझाव दिया है कि व्यर्थ के धार्मिक कर्मकाण्डों और रूढ़ि-रिवाजों पर धन का अपव्यय न करें अपितु उस धन से उद्योग, कला-कौशल का विस्तार करें ताकि देश आर्थिक समृद्धि प्राप्त कर सके।

186

असली शंखासुर कौन ?

पौराणिक जगत में प्रसिद्ध कर दिया गया था कि वेद तो शंखासुर नाम का राक्षस चुरा ले गया है ले गया है ताकि किसी को प्रमाण स्वरूप दिखाने न पड़े, किन्तु दयानन्द शंखासुर का अर्थ बता रहे हैं -

“आप लोगों का आलस्य एवं प्रमाद ही शंखासुर है, जिसके कारण भारत के शास्त्री गण वेद विद्या से हीन हो गये हैं। देखिये, मैंने वेद की इन पुस्तकों को आपके अज्ञान रूपी शंखासुर का वध करने के लिए ही यूरोप से मंगाया है।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग - २)

187

स्वदेशी पर मान का उपदेश

महर्षि अपने देशवासियों को स्वदेशी वस्तुओं को मान देने के लिए अंग्रेज का उदाहरण दे रहे हैं, उस समय जब -

“देखो, अपने देश के बने हुए जूते को कार्यालय और कचहरी में जाने देते हैं, इस देशी जूते को नहीं। इतने ही में समझ लेओ कि अपने देश के बने जूतों का भी कितना मान प्रतिष्ठा करते हैं, उतना अन्य देशस्थ मनुष्यों का भी नहीं करते।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-२)

- महर्षि समझाना चाहते हैं कि वे तो पराए व्यक्ति को भी उतना मान नहीं करते जितना अपने देश के बने जूते का। इसलिए भारतीयों से भी वो स्वदेश भक्ति का आचरण चाहते हैं।

188

मोक्ष की प्राप्ति का अंधविश्वास

झूठी तपस्या व्यर्थ 
अंधविश्वास फैलाने वालों पर वे व्यंग्य क्रोध मिश्रित दुःख व्यक्त करते हैं -

“यदि शरीर को तप्त करने से स्वर्ग मिलता है तो भड़भूंजे की भाड़ में कूदकर भस्म हो जाने से क्या मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो जायेगी?”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-२)

189

रत्न, रुद्राक्ष मुक्ति का साधन नहीं

वे हर प्रकार के अंधविश्वासों के विरुद्ध स्पष्ट वक्ता थे। वे बाह्य '‘आडम्बरों से न ज्ञान मिलता है न मोक्ष’ के प्रबल समर्थक थे -

“रुद्राक्ष को वे फल की गुठलियाँ कहते और जोर देकर बताते कि रुद्राक्ष धारण मुक्ति का साधन नहीं होता, मुक्ति ज्ञान से होती है।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

190

कर्मफल सिद्धान्त ही अकाट्य

पादरी महाशय ने इस प्रसंग में ईसाई मत की उत्कृष्टता को सिद्ध करते हुए बताया कि पापों की क्षमा हो सकती है। इसके उत्तर में स्वामीजी ने कहा कि 

“बिना फल भोगे पापों का प्रायश्चित नहीं होता।”
उन्होंने ईसा के व्यक्तित्व की प्रशंसा की, किन्तु साथ ही यह भी कहा कि “ईसा अथवा कोई भी व्यक्ति किसी अन्य के पापों को क्षमा करा सकता है, यह सम्भव नहीं है।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

191

अंधविश्वास को बढ़ावा भूलकर भी नही

एक गृहस्थी ने इस भाव से कि संन्यासी को भोजन करवाने से उनकी इच्छा पूरी हो सकती है, महाराज को घर पर आमन्त्रित किया। जब महाराज को उक्त गृहस्थ के मनोभाव का पता चला, तो उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि -

“स्वार्थ भावना से प्रेरित होकर तुमने मेरे लिए भोजन की व्यवस्था की है, परन्तु स्मरण रखो, पुत्र लाभ का वरदान देना किसी मनुष्य के लिए सम्भव नहीं है।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

192

कैसे भी हो - सत्य-असत्य का निर्णय होना चाहिए

दयानन्द से शास्त्रार्थ करने से अनेक विद्वान बचना चाहते थे, एक विद्वान ने भी ऐसा प्रयास किया, पर दयानन्द कहां बचने देते वे तो सत्य की स्थापना के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। उस विद्वान ने कहा कि -

“दयानन्द नास्तिक है, उसका मुख देखना भी पाप है।” जब यह बात स्वामीजी तक पहुँची तो उन्होंने पण्डित जगन्नाथ को कहलाया कि “बेशक, आप मेरा मुँह न देखें, पर्दे की ओट से ही शास्त्रार्थ करें।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

- किन्तु वो शास्त्रार्थ के लिए उद्यत न हुए।

193

केवल विद्वता ही छोटे-बड़े का पैमाना

शास्त्रार्थ में एक विद्वान बोले- हम बड़े विद्वान हैं हमारी कुर्सी दयानन्द से ऊपर होनी चाहिए, तो दयानन्द हास्य में कहते हैं -

“ऊपर बैठने से ही कोई व्यक्ति बड़ा नहीं होता। वृक्ष पर बैठा कौआ तो पण्डितजी से भी ऊँचा बैठा है।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

194

आलस्य त्याग हेतु प्रेरणा

एक बार एक व्यक्ति स्वामी जी की सेवा में रहा पर वो दिनभर कुछ भी नहीं करता था, भोजन यहीं पर करता था।

“भले आदमी ! इस प्रकार आलस्य पूर्ण जीवन व्यतीत करना और परान्न सेवी होकर व्यर्थ कालयापन करना उचित नहीं। और कुछ नहीं कर सकते तो मुझे अंग्रेजी समाचार पत्र ही सुना दिया करो।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-२)

शब्दार्थ : परान्नसेवी - पराए व्यक्ति के ऊपर अन्न के लिए निर्भर रहने वाला

195

न्यूनतम साझा कार्यक्रम

स्वदेश सुधार के लिए विद्वानों को परस्पर चर्चा करनी चाहिए, समाधान अवश्य निकलेगा

“भाई, स्वदेश सुधार की बात हमको साथ मिलकर करनी चाहिए। दो चार बातों में यदि हमारा मतभेद रहता है तो और बात हम मिलकर क्यों न करें? जिस बात में मतभेद हो वह भी जब हम प्रीति से साथ बैठकर विचार करेंगे तब निश्चय हो जाएगा। इस प्रकार कुछ बातों में मतभेद होनेसे आपस में लड़कर कर ही हम लोगों ने भारतवर्ष की दुर्दशा की है।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग - २)

196

रानियों के पतिव्रत धर्म की प्रशंसा

“राजाओं के दुराचार ने इन देशी रियासतों तथा इनके क्षत्रियमन्य राजाओं को कभी का नष्ट कर दिया होता, यह तो इनकी रानियों का पतिव्रत धर्म ही है, जिसके कारण इनकी सत्ता अवशिष्ट है, अन्यथा राजाओं के कुकर्मों से इनका बेड़ा कभी का गर्क हो गया होता।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-२)

197

राजाओं के अवगुण राज्य के लिए विनाशकारी

“वेश्या, मद्यपान, चौपड़, कनकौवे (पतंग) आदि में व्यर्थ काल खोना और खुशामदी लोगों का संग राजाओं के लिये महाविघ्नकारक, धन, आयु, कीर्ति और राज्य के नाश करने वाले होते हैं।”

(पत्र व्यवहार पृष्ठ ४६४)
- (नव जागरण के पुरोधा भाग-२)

198

संन्यासी के कर्तव्य

बहुत से संन्यासी लोग भी गृहस्थियों जैसा जीवन जी रहे थे, वे संन्यासियों को उनका धर्म बताना चाह रहे हैं -

“खेद की बात है कि संसार त्यागी परिव्राजक होकर भी तुम चौके चूल्हे के पचड़े में पड़े हो। संन्यासी का कर्त्तव्य आर्यावर्तीय समाज के चतुर्वर्णों में पारस्परिक मेल तथा सहयोग के भावों की अभिवृद्धि करना है, न कि खानपान विषयक मिथ्या बातों को लेकर उनमें विषमता तथा पार्थक्य के भाव पैदा करना।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-२)

199

धार्मिक पाखण्ड हर मत में फैला है -

मुसलमानों में सम्मानास्पद मानी जाने वाली अजमेर स्थित ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि-

“वहाँ के मुजाविर (पण्डे) श्रद्धालु मुसलमानों का वैसा ही शोषण करते हैं जैसा हरिद्वार के गंगापुत्र, हिन्दुओं का। वास्तव में धर्म के नाम पर व्यवसाय, दुकानदारी तथा धोखाधड़ी सब जगह एक-सी ही है।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-२)

200

महर्षि को स्वदेश सुधारने की चिन्ता

“आर्य समाज के ठीक नियमों को समझकर आपको वेदाज्ञानुसार सबके हित में अवश्य लग जाना चाहिये, विशेषता से आर्यावर्त देश के सुधारने में अत्यन्त श्रद्धा और भक्ति होनी चाहिए।”

- (स्वराज की भावना का उदबोधन)

201

परमेश्वर से स्वराज्य की प्रार्थना

“अर्थात्- हमको विद्या, शौर्य, धैर्य, बल, पराक्रम, चातुर्य, विविध धन, ऐश्वर्य, विनय, साम्राज्य, सम्मति, सम्प्रीति, स्वदेश-सुख सम्पादनादि गुणों से अधिक उत्तम करो।”

- (स्वराज की भावना का उदबोधन)

202

स्वदेश-स्वराज्य का चिन्तन

“अर्थात्- हे महाराजाधिराज! परमेश्वर! आप हमको कोमलत्वादि गुण-विशिष्ट, चक्रवर्ती राजाओं की नीति को कृपा-दृष्टि से प्राप्त करो हमको वरराज्य, वरविद्या, वरनीति देओ हमको भी सत्यविद्या से युक्त सुनीति देके साम्राज्याधिकारी सद्यः कीजिये। हे कृपा सिन्धो भगवन्! हम पर सहायता करो जिससे सुनीति युक्त होके हमारा स्वराज्य अत्यन्त बढ़े।”

- (स्वराज की भावना का उदबोधन)

203

अन्य देशवासी राजा हमारे देश में कभी न हों तथा हम लोग पराधीन कभी न हों

“अर्थात्- हे महाराजाधिराज पर ब्रह्मन् ‘क्षत्रीय’ अखण्ड चकवर्ती राज्य के लिये शौर्य, धैर्य, नीति, विनय, पराक्रम और बलादि उत्तम गुणयुक्त कृपा से हम लोगों को यथावत पुष्ट कर अन्य देशवासी राजा हमारे देश में कभी न हों तथा हम लोग पराधीन कभी न हों, हे स्वर्ग पृथिवीश, सर्वोत्कृष्ट, मोक्ष-सुख, संसार-सुख इन दोनों के लिये हमें समर्थ कर, हमारे लिये विद्या, पुरुषार्थ, हस्ति, अस्व, सुवर्ण हीरादि रत्न, उत्कृष्ट राज्य, उत्तम पुरुष और प्रीत्यादि पदार्थों को धारण करा जिससे हम किसी पदार्थ के बगैर दुःखी न हो।”

- (स्वराज की भावना का उदबोधन)

204

आर्यों के चक्रवर्ती राज्य के इतिहास का वर्णन

“सृष्टि से लेकर पांच सहस्र वर्षों के पूर्व समय पर्यन्त आर्यों का सार्वभौम चक्रवर्ती अर्थात् भूगोल में सर्वोपरि एक मात्र राज्य था, अन्य देशों में माण्डलिक अर्थात् छोटे-छोटे राजा रहते थे, क्योंकि कौरव-पाण्डव पर्यन्त यहां के राजा और राज्य शासनों में सब भूगोल के सब राजा और प्रजा चलते थे- स्वायम्भव मनु से पाण्डव पर्यन्त आर्यों का चक्रवर्ती राज्य रहा। तत्पश्चात् आपस के विरोध से लड़कर नष्ट हो गये।”

- (स्वराज की भावना का उदबोधन)

205

प्रवचन से पूर्व स्वयं आचरण करें

महर्षि उपदेश देने से पहले खुद के आचरण के प्रबल पक्षधर हैं -

जैसे कोई किसी को दुर्व्यसन छुड़ाने का उपदेश करता और आप उसी दुर्व्यसन में फंसा है, उसका उपदेश कोई भी न मानेगा।

- (ऋ. द. प. वि. भाग २)

206

शुद्ध और अर्थ परक नामों को रखने का उपदेश

उस समय बिना अर्थ के नामों की परम्परा काफी बढ़ गई थी, गैंडामल, कूडेमल, आदि। दयानन्द ने इस विषय को महत्वपूर्ण समझकर सुन्दर अर्थ वाले नामों को रखने के लिए मार्ग दिखाया-

“महर्षि दयानन्द में प्रत्युत्पन्न मतित्व उत्कृष्ट कोटि का था। इसी हाजिर जवाबी के बल पर वे अनेक गम्भीर बातें अनायास कह देते। पं. गयादीन नामक एक व्यक्ति उनसे मिलने आये। पूछने पर उन्होंने अपना नाम बता दिया। महर्षि ने चट कह दिया, जब दीन (धर्म) ही चला गया तो, बचा क्या? पुनः खेद प्रकट करते हुए कहा कि देश का कैसा दुर्भाग्य है, आज हम लोग अपने नाम रखने की पुरातन परिपाटी को भूल गये और घृणित, अर्थहीन, तथा निंदास्पद नाम रखने लगे हैं।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-१)

महर्षि की प्रेरणा से शानदार अर्थपूर्ण और सुंदर नामों को रखने की पंरपरा पुनः प्रांरभ हुई और लाखों लोगों ने अपने बच्चों के नाम बदले तथा अब अच्छे नामों को रखा जा रहा है

207

सत्य को स्वीकार करना ही सच्चा गुरुमन्त्र है

प्रचलित गुरु परम्परा में व्याप्त दोषों को दूर करने हेतु वे यत्नशील थे। भड़ौंच प्रवास काल में जब ठाकुर उमरावसिंह ने उनसे शिष्य बना लेने तथा गुरुमन्त्र देने का अनुरोध किया तो महर्षि ने स्पष्ट कर दिया कि-

“कान में फूँक मारकर मन्त्र देना और शिष्य बनाना उनके सिद्धान्तों के प्रतिकूल है। वेद तो मन्त्रों के भण्डार हैं, पुनः गुरू से मन्त्र लेने का क्या अभिप्राय है?”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-१)

- आज की स्थिति में ये वाक्य कितना सटीक बैठता है।

208

आर्यसमाज की नींव का पत्थर

जब लोगों ने महर्षि की विचारधारा को सहेजकर रखने और आगे प्रचारित करने हेतु एक नए समाज की स्थापना का सुझाव दिया तो महर्षि दयानन्द द्वारा दिया गया अत्यन्त मार्मिक वक्तव्य -

“आप यदि समाज से पुरुषार्थ कर परोपकार कर सकते हो, समाज कर लो (स्थापित कर लो)। इसमें मेरी कोई मनाई नहीं है। परन्तु इसमें यथोचित व्यवस्था न रखोगे तो आगे गड़बड़ाध्याय हो जाएगा। मैं तो जैसा अन्यों को उपदेश देता हूँ वैसा ही आपको भी करूँगा और इतना लक्ष्य में रखना कि मेरा कोई स्वतन्त्र मत नहीं है और मैं सर्वज्ञ भी नहीं हूँ। इससे यदि कोई मेरी गलती आगे पाई जाये, युक्ति पूर्वक परीक्षा करके इसको भी सुधार लेना। यदि ऐसा नहीं करोगे तो आगे यह भी एक मत हो जाएगा और इसी प्रकार से ‘बाबा वाक्यं प्रमाणम्’ करके इस भारत में नाना प्रकार के मत-मतान्तर प्रचलित होके भीतर भीतर दुराग्रह रख के, धर्मान्ध होके लड़के (लड़कर), नाना प्रकार की सद्विद्या का नाश करके यह भारतवर्ष दुर्दशा को प्राप्त हुआ है। इसमें यह भी एक मत बढ़ेगा। मेरा अभिप्राय तो है कि इस भारतवर्ष में नाना प्रकार के मत-मतान्तर प्रचलित हैं वे सब वेदों को मानते हैं इससे वेद शास्त्ररूपी समुद्र में यह सब नदी-नाव पुनः मिला देने से धर्म एक्यता होगी और धर्म एक्यता से सांसारिक और व्यावहारिक सुधारणा होगी और इससे कला, कौशल आदि सब अभीष्ट सुधार होके मनुष्यमात्र का जीवन सफल होके अन्त में अपने धर्म बल से अर्थ, काम और मोक्ष मिल सकता है।” 
- दयानन्द सरस्वती: आर्यसमाज की स्थापना के अवसर पर दिया वक्तव्य

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-१)

209

राजा और प्रजा एक दूसरे के पूरक

“जो प्रजा न हो तो राजा किसका और राजा न हो तो प्रजा किसकी कहावे।” इसलिए राजा-प्रजा दोनों को प्राण के तुल्य एक दूसरे की पुष्टि करनी चाहिए। एक दूसरे को निर्बल करने से क्षय-रोग की भाँति दोनों निर्बल होकर नष्ट हो जाते हैं। आपातकाल में राजा प्रजा की तथा प्रजा राजा की रक्षा कर परस्पर आनंदित हों।”

- (स्वामी दयानन्द का राजनीतिक दर्शन)

210

तानाशाह राजा के सामने प्रजा की स्थिति

“जैसे बाज के सामने छोटी-छोटी चिड़ियाओं की दुर्दशा होती है, वैसे ही राजा के सामने प्रजा की। जहाँ एक मनुष्य राजा होता है, वहाँ पर प्रजा ठगी जाती है.. जैसे मृग पशु पराए खेत में जोवों को खाकर आनंदित होते हैं वैसे ही स्वतंत्र एक पुरुष राजा होने से प्रजा के उत्तम पदार्थों को ग्रहण कर लेता है।”

- (स्वामी दयानन्द का राजनीतिक दर्शन)

211

राज्य अधिकारी का शपथ ग्रहण

“कुलीन विद्वानों को सभा में स्थित करें तथा स्थापन समय में शपथों से आप लोग अन्याय को कभी मत करो, ऐसा प्रलंभन करावें। शपथ ग्रहण करते समय सभासदगण ईश्वर से यह प्रार्थना करें कि, हे सभा के योग्य परमेश्वर आप हम लोगों की राजसभा की रक्षा कीजिए। हम लोग जो सभा के सभासद हैं, सो आपकी कृपा से सभ्यता युक्त होकर अच्छी प्रकार से सत्य न्याय की रक्षा करें।”

- (स्वामी दयानन्द का राजनीतिक दर्शन)

212

गणपूर्ति (Corum) की व्यवस्था

“दश विद्वानों के विराजे बिना परिषद सभा नहीं होती थी और न्यून से न्यून तीन विद्वानों के आए बिना तो सभा का काम चलता ही न था। स्पष्ट है कि सभा की पूर्ति हेतु तीन सभासदों की उपस्थिति अनिवार्य है।”

- (स्वामी दयानन्द का राजनीतिक दर्शन)

213

राजा और मन्त्री स्वदेश में जन्म लेने वाला ही हो

“स्वराज्य स्वदेश में उत्पन्न हुए वेदादि शास्त्रों को जानने वाले शूरवीर जिनका लक्ष्य अर्थात विचार निष्फल न हो और कुलीन अच्छे प्रकार सुपरीक्षित सात वा आठ उत्तम, धार्मिक, चतुर (सचिवान्) अर्थात् मंत्री करें।”

- (स्वामी दयानन्द का राजनीतिक दर्शन)

214

राजा का कर्त्तव्य न्याय दिलाना है -

एक राजा ने (जिसका व्यक्तिगत खान-पान चरित्र अच्छा नहीं था) पूछा कि मोक्ष कैसे प्राप्त होगा? स्वामी जी का उत्तर है

“काम तो तुम्हारे मोक्ष के नहीं हैं। परन्तु एक न्याय तुम्हारे हाथ में है यदि न्यायपूर्वक प्रजापालन करोगे तो तुम्हारा मोक्ष हो सकता है।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग - २)

215

न्याय ही शासन का कारण

“जिस सभा वा न्यायाधीश के सामने अन्याय हो... वह दोष सभाध्यक्ष, सभासद और न्यायाधीश ही का गिना जाता था... आर्यावर्त न्यायालय घर में कभी अन्याय नहीं होता था। और जहाँ होता था वहां उन्ही न्यायाधीशों को दोष देते थे... इन्हीं वेदादिशास्त्रों की रीति से आर्यों ने भूगोल में करोड़ों वर्ष राज्य किया है। यदि न्याय का दीपक अंधकार में विलीन हो जाए, तो वह अंधकार - अन्याय कितना दुखद और भयानक होगा।”

- (स्वामी दयानन्द का राजनीतिक दर्शन)

216

CBI - CID - RAW राज्य की गुप्तचर व्यवस्था

“जिसके राज्य में हज़ारों दूत, गुप्तचर और वैद्य जन् विचरते हैं, उसकी थोड़ी भी राज्यों की हानि नहीं होती।”

- (स्वामी दयानन्द का राजनीतिक दर्शन)

दयानन्द ने दूतों का प्रमुख कार्य फूट में मेल और मेल में फूट डालना बताया है।

217

पंचायती राज व्यवस्था

१) प्रत्येक ग्राम में एक पंचायत होनी चाहिए और कई ग्रामों के ऊपर एक न्याय सभा भी होनी चाहिए। 
२) दो, तीन, पाँच और सौ ग्रामों के बीच में एक राज-स्थान (सभा या पंचायत भवन) हो, जिससे यथायोग्य कर्मचारी आदि राजपुरुष को रखकर राज्य-कार्य संपादित किया जाए।
३) एक-एक ग्राम में एक-एक प्रधानपुरुष (अधिकारी) को रखना चाहिए।

- (स्वामी दयानन्द का राजनीतिक दर्शन)

आज ठीक ऐसी ही स्थानीय प्रशासन व्यवस्था भारत में है देखिए दयानन्द जी की दूर दृष्टि

218

तराजु - तुला-बाट की समय-समय पर परीक्षा लेने की व्यवस्थाएं

“पक्ष-पक्ष में, वा मास-मास में अथवा छठवें-छठवें मास तुला की राजा परीक्षा करे। तथा.. प्रतिमा अर्थात् छंठाक आदिक बटखरे ... जो तोड़ डाले या अधिक न्यून कर देवे, उनको उससे बनवा लेवे और जैसा जिसका ऐश्वर्य, उसके योग्य दंड करे।”

- (स्वामी दयानन्द का राजनीतिक दर्शन)

आज सरकारों में इसका एक विभाग है और सभी मशीनें (तोलने वाला/नापने वाली) वहीं से सर्टिफाई होती हैं -

219

युद्ध में स्त्रियों की सहभागिता - सेना में स्त्रियां

“देखो, आर्यावर्त के राज पुरुषों को स्त्रियां धनुर्वेद अर्थात् युद्ध विद्या भी अच्छी प्रकार जानती थी, क्योंकि जो न जानती होती तो कैकेई आदि दशरथ आदि के साथ युद्ध में क्यों कर जाती और युद्ध कर सकती। राजा को शूरवीर स्त्रियों को भी सेना में रखना चाहिए। क्योंकि अव्याभिचारिणी स्त्रियों की सेना शत्रुओं को वश में करने में सक्षम होती है।”

- (स्वामी दयानन्द का राजनीतिक दर्शन)

अब भारत में सशस्त्र सेना में भी स्त्रियां भी भर्ती की जाने लगी हैं

220

सैनिकों की देखभाल मिलिटरी बैंड, मिलिटरी कैंन्टीन एवं मिलिटरी राशन

राजा और प्रजा के पुरुषों को चाहिए कि योद्धा लोगों की सब प्रकार से रक्षा, सबके सुखदायी घर, खाने-पीने योग्य पदार्थ, प्रशंसित पुरुषों का संग, अत्युत्तम बाजे आदि दे के अपने अभीष्ट कार्यों को सिद्ध करें।

- (स्वामी दयानन्द का राजनीतिक दर्शन

आज सेना के अपने बैन्ड हैं - कैन्टीन हैं और मिलिट्री वालों के लिए कम रेट पर राशन की व्यवस्था भी है -

221

युद्ध में टेलिकॉम-यूनिकोड संचार व्यवस्था

“लड़ाई करने वाले जो राजपुरुष हैं उनके लिए यह तारविद्या अत्यंत हितकारी है...दुष्ट शत्रुओं की पराजय और श्रेष्ठ पुरुषों के विजय के लिए तार विद्या सिद्ध करनी चाहिए।”

- (स्वामी दयानन्द का राजनीतिक दर्शन)

जिन दिनों तार विद्या का बेहद प्रचलन नहीं था उस समय युद्ध आदि में तार विद्या आदि की बात करना महर्षि दयानन्द की दूर दर्शिता को दर्शाता है

222

भूगर्भ विद्या से धन की प्राप्ति

भूमि को माता कहा गया है ये हर प्रकार के सुख साधन को देने वाली है -

“भूगर्भ और अग्नि विद्या से पृथ्वी के पदार्थों की अच्छी प्रकार परीक्षा करके सुवर्ण आदि रत्नों को उत्साह के साथ प्राप्त करे।”

- यजुर्वेद भाष्य ११/१९

223

सेना का भोजन और चिकित्सा आर्मी हॉस्पीटल

जो राजा सेना के भोजन के उत्तम प्रबंध को और आरोग्य के लिए वैद्य को रखता है, वही प्रशंसित होकर राज्य बढ़ाता है।

- (स्वामी दयानन्द का राजनीतिक दर्शन)

आधुनिक सेना के जवानों के भोजन की पूरी व्यवस्था है और ARMY HOSPITAL आदि को भी इसी क्रम में देखें।

224

ऋषि दयानन्द की उद्देश्य पूर्ण साधना

ऋषियों के ऋणि दयानन्द चाहते तो मोक्ष मार्ग पर जा सकते थे पर मन में केवल एक ही पीड़ा थी - पुनः गौरवशाली भारत-

“मेरे लिये यह कार्य कोई टंटा बखेड़ा जैसा नहीं है। पूर्वज ऋषियों के ऋण से उऋण होने के लिए ही मैं यह कार्य कर रहा हूँ। स्वार्थी लोगों ने शताब्दियों से ऋषि सन्तानों को मिथ्याडम्बरों और रूढ़िजालों में फँसा रखा है। आर्यजाति के विलुप्त गौरव को पुनः प्राप्त कराना ही मेरे जीवन की एकमात्र साधना है।”

नव जागरण के पुरोधा भाग-1

225

संन्यासी का वास्तविक कर्त्तव्य

साधु समाज केवल मांगकर खाने और आश्रम आदि बनाने में ही रत था ये देखकर दयानन्द दुःखी थे उसी दुःख मिश्रित क्रोध में वे लिखते हैं-

“देखो! तुम्हारे सामने पाखण्ड-मत बढ़ते जाते हैं। ईसाई मुसलमान तक हो रहे हैं। तुमसे अपने घर की रक्षा और दूसरों को मिलाना नहीं बन सकता। बने तो तब, जब तुम करना भी चाहो। जब तक वर्तमान और भविष्यत् में संन्यासी उन्नतिशील नहीं होते, तब तक आर्यावर्त्त और अन्य देशस्थ मनुष्यों की वृद्धि नहीं होती। जब वृद्धि के कारण वेदादि शास्त्रों का पठन-पाठन, ब्रह्मचर्यादि आश्रमों के यथावत् अनुष्ठान, सत्योपदेश होते हैं, तभी देशोन्नति होती है।”

- सत्यार्थ० एकादश समु०

226

असत्य स्वीकार नहीं

किसी ने सुझाव दिया कि एक दानदाता की अमुक बात मान लेने से जोकि वैदिक सिद्धान्त के विरुद्ध थी, वो आर्यसमाज के निर्माण में पर्याप्त सहायता करेंगे, महर्षि दयानन्द जी ने अपना मत स्पष्ट करते हुए कहा -

“आर्यसमाज की नींव को असत्य पर स्थापित करना कदापि पसन्द नहीं करूँगा।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

227

दुनियादारी से दूर केवल वेद भाष्य ही जीवन का लक्ष्य

किसी महाराजा के यहां से विदा होते समय महाराजा ने स्वामी जी का यथेष्ट सम्मान किया तथा उन्हें एक शाल भेंट रूप में अर्पित किया। शाल को स्वीकार करने में महाराज ने अत्यन्त संकोच व्यक्त किया और कहा कि -

“यदि इसी प्रकार देश के राजा-महाराजा उन्हें शाल भेंट करते रहे तो शालों का ही एक बड़ा बोझ हो जाएगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि- ऐसे वस्त्र उन लोगों को दिये जाने चाहिए, जो शीतातुर हों।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

228

विज्ञानवेत्ता दयानन्द

महर्षि अपने बात की पुष्टि के लिए अक्सर वैज्ञानिक, तार्किक और अकाट्य प्रमाणों की सहायता लेते हैं -

“महर्षि उक्त संस्था के कार्यालय के कमरे में रखे हुए एक बिल्लौरी (स्फटिक) पत्थर को उठाकर लाये और अंग्रेजी शिक्षित उपस्थित समुदाय से पूछने लगे कि आप लोग तो पदार्थ विद्या (विज्ञान) के जानकार हैं, बताइये कि इस पत्थर को इस रूप में आने में कितना समय लगा होगा? उपस्थित पठित व्यक्तियों का कहना था कि लाखों वर्ष सामान्य पत्थर को स्फटिक का रूप लेने में लगते हैं। इस पर महर्षि ने कहा कि जब पत्थरों के ऐसे परिवर्तन में ही लाखों वर्ष लग जाते हैं, तो सृष्टि को मात्र ६ हजार वर्ष पुराना मानना कैसे उचित कहा जा सकता है?”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

229

सच्चे संन्यासी - दयानन्द

संन्यासी होने के कारण वे कभी लम्बे समय तक एक स्थान पर नहीं रहे -

“मैं सदा एक स्थान पर नहीं रहता हूं इसलिए उसी पते से पत्र भेजना अच्छा होगा। यद्यपि काम की अधिकता के कारण मुझे अवकाश नहीं मिलता है, तो भी आप जैसे सत्यधर्म की उन्नति के बढ़ाने में प्रवृत्त तन-मन-धन से सबकी भलाई में कमर बांधे हुए, सत्यधर्म की उन्नति, और सब मनुष्यों को प्रेम करने में दृढ़ उत्साह से युक्त सज्जनों की इच्छा को पूर्ण करने के लिए हमने अवश्य समय निकाल लिया है।”

- पत्र व्यवहार

- कभी कोई आश्रम न बनाया न बनाना चाहा, राजाओं ने देना चाहा तो लिया नही, अपना कोई स्थाई पता ही नहीं, अद्भुत है दयानन्द 

230

पूर्ण परहितकारी दयानन्द अपनी मृत देह की भस्म को खेतों में डालने का निर्देश

वे मृत्यु के बाद के क्रियाकर्म के आडम्बर से दुःखी थे, अतः वे उपदेश के साथ स्वयं के लिए व्यवस्था बना रहे हैं, ताकि आर्यजन उसको करें -

“जब मेरा देह छूटे तो न उसको गाड़ें, न जल में बहावें, न जंगल में फेंकने दें, केवल चन्दन की चिता बनावें। और जो यह सम्भव न हो तो दो मन चन्दन, चार मन घी, पांच सेर कर्पूर, ढाई सेर अगर तगर और दश मन काष्ठ लेकर वेदानुकूल जैसे कि संस्कार विधि में लिखा है वेदी बनाकर तदुक्त वेद मन्त्रों से होम करके भस्म खेत में डालें।”

231

मनुष्य मात्र को सत्य और असत्य में भेद करके सत्य को मानने का उपदेश करते दयानन्द

महर्षि अगर केवल एक मत की सत्य-असत्य बातों की चर्चा करते तो वह अन्याय होता उन्होंने जिस-जिस ग्रन्थ में जो-जो बातें अपूर्ण या सृष्टि नियम के विपरीत थी,
उस-उसका प्रकाश किया है, यानि वह मनुष्य मात्र को सत्य मार्ग पर ले चलाने की इच्छा रखते हैं-

“जैसा मैं इस्लाम मत का खण्डन करता हूं, ईसाई मत का खण्डन भी कदापि उससे कम नहीं करता। यहां तक कि मैं अपने हिन्दुओं की वर्तमान धार्मिक अवस्था पर भी सहमति प्रकट नहीं करता।”

- महर्षि दयानन्द के पत्र व्यवहार

232

आयुर्वेदाचार्य दयानन्द

राजा को लिखे एक पत्र में वे राज कुमार को उत्तम स्वास्थ्य के लिए आयुर्वेद का नुस्का बता रहे हैं

“आप अपने पुत्र जो कि महाराजकुमार हैं, उनको खाने-पीने आदि से संकोचित मत रखियेगा। सदा पाव भर गाय के दूध में मासा भर सोंठ को मिला छान थोड़ा सा गरम कर ठंडा करके ब्राह्मी औषधी के साथ पिलवाते रहिए, जिससे महाराजकुमार के बुद्धि, बल, पराकम, आयु और विद्या बढ़ती रहे।”

- पत्र व्यवहार

233

निर्भीक दयानन्द

एक राजा को उसके गलत आचरण को लेकर चेतावनी का पत्र लिखा, उसमें ये शब्द लिखना कोई सरल व्यक्ति नहीं कर सकता -

“एक वेश्या से जो कि नन्ही कहाती है, उससे प्रेम, उसका अधिक संग और अनेक पत्नियों से न्यून प्रेम रखना आप जैसे महाराजों को सर्वथा अयोग्य है।”

- पत्र व्यवहार

- जोधपुर में ‘नन्ही नाम की दो वेश्याएं थी। एक ‘नन्ही जान’ (मुसलमान) और दूसरी ‘नन्ही भगतन’ (हिन्दू) जोधपुराधीश की कृपा-पात्र नन्ही जान थी।

234

व्यावहारिक दयानन्द

दयानन्द बेहतर व्यावहारिक जीवन जीते हैं, वो चाहते हैं कि उनकी बातें आगे भी चलती रहें, वे रहे या न रहें -

“हमारा शरीर बहुत देर तक नहीं रहेगा। आप आजीवन हमारी पुस्तकों से उपदेश लेते रहना। जहां तक बन पड़े अपने भूले-भटके भाईयों को भी सन्मार्ग दिखलाते रहना।”

- श्रीमद्दयानन्द प्रकाश

235

निडर दयानन्द

स्वामी जी जब खुलकर असत्य बातों का खण्डन करते थे तो उनके शिष्य घबराकर लोगों के नाराज होने और निरर्थक हमला करने की बात कह देते थे, महर्षि दयानन्द इस विषय पर एक स्थान पर कहते हैं -

“आत्मा अमर हैः- आत्मा सत्य है। उसकी सत्ता को न कोई शस्त्र छेदन कर सकता है और न अग्नि जला सकती है। वह एक अजर-अमर और अविनाशी पदार्थ है। शरीर तो अवश्यमेव नाशवान है जिसका जी चाहे इसका नाश कर दे। परन्तु हम देह की रक्षा के लिए सनातन धर्म को नहीं त्यागेंगे, सत्य को नहीं छोड़ेंगे।”

- श्रीमद्दयानन्द प्रकाश

236

मृत्युन्जय दयानन्द

एक बार एक प्रशंसक जो सरकारी कर्मचारी भी थे, स्वामी जी को डरते-डरते खण्डन न करने का अनुरोध करते हैं, इस पर दयानन्द की प्रतिक्रिया देखिए -

“ठाकुर महाशय ! आप हमारे विषय में सर्वथा निश्चिन्त रहिए मैं विपत्ति और बाधाओं के कारण अपने उद्देश्य को नहीं छोड़ सकता। मुझे इन बातों का भय भी नहीं है। हां आप राजकर्मचारी हैं, इसलिए आपको भय भी हो सकता है। सो उससे बचने का सर्वोत्तम उपाय यह है कि श्रीमन्त मेरे समीप न आया करें परन्तु मैं तो किसी मनुष्य का नौकर नहीं हूं। मेरी आत्मा को कोई मनुष्य छीन नहीं सकता। शेष कौन-सा पदार्थ है जिसके छिन जाने का मुझे डर हो सकता है।”

- श्रीमद्दयानन्द प्रकाश

237

वेद ही अन्तिम - वेद के विरुद्ध हो तो मेरी भी न मानना

अकेले दयानन्द जी क्षितिज पर ऐसे दिखाई देते है जो अपने अनुयायियों से भी स्पष्ट कह रहे हैं कि मुझ पर आंख बन्द कर विश्वास न करें। इससे अधिक स्पष्टवादिता क्या होगी?

“मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि मैं यह नहीं चाहता हूँ कि जो कुछ मैं कहूँ आप उस पर आँखें मीचकर चलने लगे। आप उस पर विचार करें, उसे जाँचे और परखें, यदि वह आपको सत्य जान पड़े तो उस पर चलें और यदि वह असत्य जान पड़े तो उस पर कोई ध्यान न दें। अन्धविश्वास ही हमारे नाश का मूल है। संस्कृत पुस्तकों में ज्ञान का वृहत् कोष भरा हुआ है। उन्हें पढ़ो और देखो कि उनमें क्या है। ऐसा मत कहो कि कोई बात केवल इसलिए माननीय वा त्याज्य है क्योंकि दयानन्द सरस्वती ऐसा कहते हैं।”

(म. दयानन्द च. बा. दे. मु.)

- आज जो गुरुओं और बाबाओं के पाखण्ड चल रहे हैं क्या उनमें से किसी में भी ऐसा कहने की क्षमता है? विचार करने की बात है।

238

दयानन्द दुःखी क्यों हैं?

मठाधीशों की उदासीनता से दुःखी दयानन्द
वे भारतीय संस्कृति के पतन के लिए धर्माचार्यों और मठाधीशों को अपने कर्त्तव्य की प्रेरणा देते हैं -

“ईसाइयों की योजनाः- जब मैं आर्य जाति की सार्वत्रिक अधोगति और अवनति देखता हूँ। तो मेरी वेदना का पार नहीं रहता। आज विदेशी ईसाई प्रचारक हिन्दू समाज के दलित वर्ग की दरिद्रता, पराधीनता तथा दुर्दशा का लाभ उठाकर उन्हें धर्मच्युत करने पर तुले हुए हैं। आश्चर्य है कि संसार के इस सर्वाधिक प्राचीन धर्म के एक महत्त्वपूर्ण अंग की इस हीन दशा को देख कर भी धर्माचार्यों मठाधीशों तथा महन्तों का ध्यान इस ओर नहीं जा रहा है। यदि हमारे धर्माचार्य इसी प्रकार की उपेक्षा धारण किये रहेंगे, तो इस धर्म समाज का सर्वनाश अवश्यम्भावी है।”

(नव. जा. के. पु. म. द. स.)

239

एकता के लिए कटिबद्ध ईंट और पत्थर क्यों सहन करते हैं दयानन्द ?

विकट परिस्थियों में भी कर्म के प्रति संकल्पबद्ध हिन्दू समाज की विपरीत परिस्थितियों से दुःखी दयानन्द कहते हैं-

“आर्यजाति की यही दशा हुई और यदि इसे संभाला ना गया तो यह नष्ट हो जाएगी। धर्माचार्यों के प्रमाद के कारण करोड़ों मुसलमान हो गए और अब ईसाई हो रहे हैं। यदि जाति को कडुए उपदेशों के कोड़े से न जगाया गया तो इसकी मृत्यु में सन्देह ही क्या है? मैं यह काम किसी स्वार्थ से तो कर ही नहीं रहा हूं। इसके कारण मैं अनेक प्रकार के कष्ट सहता हूं, गालियां और ईंट-पत्थर खाता हूं विष तक भी मुझे दिया जा चुका है, परन्तु जाति और धर्म के लिए मैं सब कुछ सहन करता हूं।”

- (म. द. च. बा. दे. मु.)

240

गरीबों के हितचिन्तक दयानन्द

एक तरफ तो कहते हैं गौरवकाल में हमारे देश में हर ‘दरिद्र’ या गरीब के पास विमान भी थे - 
दूसरी और वे आज की गरीबी देखते हैं तो द्रवित हो उठते हैं-

“क्या आपने कभी उन बन्धुओं का भी चिन्तन किया? जो आपके देश में, लाखों की संख्या में भूख की चिता पर पड़े हुए रात दिन बारहों महीने, भीतर ही भीतर जलकर राख हो रहे हैं? सहस्रों मनुष्य आपके देश में ऐसे हैं जिन्हें आजीवन उदर भरकर खाने को अन्न नहीं जुड़ता उनके तन पर सड़े गले मैले, कुचैले चिथड़े लिपट रहे हैं।”

- श्रीमद्दयानन्द प्रकाश

- हमें आज भी उनके चिन्तन से कुछ सीखना होगा।

241

गरीबों के हमराह विनम्र दयानन्द

एक शोभायात्रा में उन्हें हाथी पर बैठकर चलने के निवेदन पर महर्षि बोले -

“मैं गरीब संन्यासी हूं। हाथी पर सवारी करना मुझे शोभा नहीं देता। राजपथ पर सैकड़ों लोग पैदल चलते हैं अतः मैं भी पैदल ही जाऊंगा।”

(दया. प. वि. भाग 5)

242

विधवाओं, अनाथों एवं गौ माता की दशा से दुःखी - दयानन्द गोवध और विधवा पीड़ा

एक बार महर्षि दयानन्द जी को उनके शिष्यों ने दुःखी देखा तो उनके दुःख का कारण जानना चाहा, तब उन्होंने कहा -

“भाई! इससे अधिक हृदय विदारक दारुण वेदना और क्या हो सकती है कि विधवाओं की दुःखभरी आहों से, अनाथों के निरन्तर आर्तनाद से और गो-वध से इस देश का सर्वनाश हो रहा है।”

- श्रीमद्दयानन्द प्रकाश

- क्या केवल दयानन्द को दिखाई दे रही है विधवाओं की वेदना और क्या दयानन्द को ही सुनाई दे रहा है गौ का क्रन्दन।
विधवा विवाहों का प्रचलन, गौशालाओं की स्थापना और अनाथालयों का खुलना-इसी सोच से आरम्भ हुआ, 
चिन्तन करना होगा।

243

दलितों की चिन्ता - विकल दयानन्द

150 साल पहले ये दृष्टि किसी और की थी क्या?

“ईसाई लोग दलितों को ईसाई बनाने के भरसक यत्न कर रहे हैं और रूपया पानी की तरह बहा रहे हैं। इधर हिन्दुओं के धर्म नेता हैं जो कुम्भकर्ण की नींद सो रहे हैं। यही चिन्ता मुझे विकल कर रही है।”

- (म. द. च. बा. दे. मु.)

- आज की स्थिति भी ज्यों की त्यों लगती है - हम सब चिन्तन करें।

244

देश की अनिष्टी के कारण - बाल विवाह, विधवा और गाय का श्राप

विधवाओं की असंख्य संख्या और उनके जीवन को देखकर दयानन्द दुःखी हो रहे हैं।

देश की अवनतिः- एक दिन स्वामी जी बैठे-बैठे लेट गए। अकस्मात् स्वामीजी ने उठकर और सांस भर कर यह कहा कि-

“विधवाओं और गायों के शाप से ही यह देश नष्ट हो गया।”

- (पं. लेखराम कृ. म. द. जी. च.)

245

भारत वर्ष की विद्याओं के नष्ट होने के कारण

महर्षि से पूछा - हमारी विद्याएं क्यों नष्ट हो गई? वे इसका कारण बताते हैं -

ग्रंथों का नाशः- पूर्वकाल में भिन्न-भिन्न विद्याएं भरतखण्ड में वेदों के कारण प्रसिद्ध थीं। जैसे विमान विद्या, अस्त्र विद्या। इन विद्याओं के पुस्तक नष्ट होने से वे विद्याएं भी नष्ट हो गईं। मुसलमानों ने लकड़ी जलाने की जगह पुस्तकों को जलाया। सन् १८५७ के साल के लगभग जब दंगा-फसाद हुआ था उस समय किसी एक यूरोपियन ने अमृतराव पेशवा के भारी पुस्तकालय में आग लगा दी थी।

- पूना प्र. (उपदेश मंजरी)

अपने महान ग्रन्थों को सुरक्षित रखने के लिए हमें बड़े-बड़े पुस्तकालय और डिजिटल लाइब्रेरी बनानी चाहिए।

246

शरीर केवल परोपकार के लिए

दयानन्द के उपर 44 बार जानलेवा हमले या अपमान की घटनाएं हुई, लोग कहते थे, आप सिपाही रखा करें। दयानन्द मना कर देते थे। अन्त तक न कोई सिपाही रखा न सरकार की सुरक्षा, किन्तु मारे जाने का डर बिल्कुल नहीं, पर दुःख है -

“मुझे इसका कुछ शोक नहीं कि मेरा शरीरपात हो जावे, परन्तु इस बात का शोक है कि मैं जिस परोपकार के लिए इस शरीर की रक्षा करता हूं वह उपकार रह जाएगा।”

- (पं. लेखराम कृ. म. द. जी. च.)

247

दोषों का स्वीकार करते दयानन्द

दयानन्द स्वयं को साधारण मनुष्य मानते हैं, देवता या ईश्वर नहीं।
इसलिए वे सरल स्वभाव से कहते हैं-

“हम सर्वज्ञ नहीं और सब बातें हमें उपस्थित (प्रत्यक्ष) भी नहीं। हमारे बोलने में अनन्त दोष होते होंगे। इसका हमें ज्ञान भी नहीं है। दोष बतलाने पर हम स्वीकार करेंगे। सत्य की छानबीन होनी चाहिए, वितण्डा नहीं होनी चाहिए। यही हमारी बुद्धि में आता है।”

- पूना प्रव. (उपदेश म.)

क्या इससे अधिक स्पष्ट वक्ता हो सकता हैं आज -

248

जो कहा - स्पष्ट कहा-सीधा कहा

लोग कहते थे, “स्वामी जी आप थोड़ा कम कड़ा बोला करें - 
लोग नाराज होंगे, परन्तु दयानन्द सत्य को छिपाना पाप मानते हैं -

“दोगलापन मुझमें नहीं हैः- मैं अमृत को विष में मिश्रित करके देना नहीं चाहता। सच्चाई को छिपाना महापाप है। अन्त में सत्य ही की जय हुआ करती है।”

- श्रीमद्दयानन्द प्रकाश

249

धन केवल परहित के लिए

दयानन्द ने कभी धन के साथ प्रीति नहीं रखी, लाखों की आमदनी वाले मठ-मन्दिरों की गद्दी ठुकराई, किन्तु जब समाज के हित के लिए जरुरत लगी तब की स्थिति का वर्णन दयानन्द स्वयं करते हैं -

मैं जब गंगा पर पर्यटन करता था तो उन दिनों मैं केवल कौपीनधारी दिगम्बर था। उस समय मुझे कौड़ी तक छूने की आवश्यकता न थी। परन्तु अब मैंने जनहित के कार्य में अधिक भाग लेना आरम्भ कर दिया है। इसलिए ‘कूप-मृत्तिका’ न्याय से लोगों से धन लेकर उन्हीं के हितकर कार्य में लगा देता हूं।

- श्रीमद्दयानन्द प्रकाश

250

धन का लोभ लेशमात्र भी नहीं

उदयपुर के महाराणा ने स्वामी जी को एकलिंग की लाखों की आयवाली गद्दी (System) का मठाधीश बनने का आग्रह किया, जिसको विनम्रतापूर्वक मना करने का साहस दयानन्द जैसे संन्यासी में ही हो सकता था -

“राणाजी! आप यह प्रस्ताव किस व्यक्ति के समक्ष रख रहे हैं? आपका राज्य तो इतना छोटा है कि मैं एक दौड़ लगाकर ही उसके बाहर जा सकता हूँ। परन्तु भला बताइये विश्वनियन्ता, परमात्मा के इस ब्रह्माण्डरूपी राज्य को छोड़कर मैं कहाँ जा सकता हूँ।”

- (नव. जा. के. पु. म. द.)

- दयानन्द को अनेक धनी-सामन्तों-राजाओं ने धन-सम्पत्ति देनी चाही, पर दयानन्द ने लेशमात्र भी रूचि न दिखाई।

251

धन वैभव के आग्रह को तिलांजलि देते सर्वत्यागी - दयानन्द

जब ओखी मठ के महन्त ने दयानन्द जी की योग्यता देख उन्हें मठ की सम्पत्ति का वारिस बनाना चाहा -

“यदि मुझे धन की लालसा होती तो मैं अपने पिता की सम्पत्ति को, जो तुम्हारे इस स्थल, धनधान्य से कहीं बढ़कर थी, न छोड़ता। किंच जिस उद्देश्य के लिए मैंने घर छोड़ा और सांसारिक ऐश्वर्य से मुँह मोड़ा, न तो मैं उसके लिए तुम्हें यत्न करते देखता हूँ और न तुम्हें उसका ज्ञान ही प्रतीत होता है। पुनः तुम्हारे पास मेरा रहना कैसे हो सकता है?”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

252

स्वाबलम्बी दयानन्द

कुम्भ के मेले पर प्रचार के दौरान एक दिन उन्होंने महसूस किया कि उनके पास जो सामान, वस्तु, धन आदि दक्षिणा और भेंट से एकत्र हो गया है, ये सत्य बात कहने में बाधक है। अतः अपनी आवश्यकता कम करनी होगी और किसी पर भी अपनी निर्भरता समाप्त करनी होगी। तब एकाएक उन्होंने अपना सब सामान बांटना शुरु कर दिया और जो लंगोटी पहनी थी, उसको छोड़ सब बांटकर आगे चल पड़े। तब एक शिष्य ने पूछा कि आप सारा सामान क्यों बांटते जाते हैं? तो दयानन्द बोले -

“जब तक हम अपनी आवश्यकताओं के लिए अन्यों पर निर्भर रहेंगे तब तक उनके सम्पूर्ण हित की बातें कहना हमारे लिए सम्भव नहीं होगा।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

253

मेरा तो कुछ भी नहीं

वे आगन्तुक लोगों को मिठाई आदि बांटा करते थे, कुछ लोग उन्हें संन्यासी कहकर उनसे लेने से संकोच करते थे, उनका उत्तर था -

“इस खाद्य सामग्री में मेरा अपना क्या है? सब तुम गृहस्थ लोगों के घर से आई हुई है। सम्प्रति भोज्यपदार्थ मेरी आवश्यकता से अधिक है। इस कारण तुमको कुछ संकोच न करना चाहिए। पर्णकुटियों में बैठे हुए वनस्थ साधुओं का भी रामचन्द्रादिकों ने भी अपने वनवास में स्वागत स्वीकार किया था। उनके दिये हुए कन्दमूल फलादि को राज्यश्री प्राप्त राजे तक ग्रहण करते थे।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-2)

254

परमार्थी देशभक्त दयानन्द

“हमने केवल परमार्थ और स्वदेशोन्नति के कारण अपने समाधि के आनन्द को छोड़कर यह कार्य ग्रहण किया है।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-2)

255

अनुचित प्रलोभन को अनुचित मानते दयानन्द

किसी शिष्य ने राजा से किसी काम की सिफारिश के बदले वेदभाष्य के लिए प्रचुर दान देने की बात कहनी चाही, तो सत्यानुरागी दयानन्द कहते हैं -

“हाँ, यदि उनके द्वारा की गई किसी निर्दोष सिफारिश से किसी स्वदेशवासी का हित होता है तो वे अवश्य करेंगे। परन्तु इसके बीच पैसे को लाना उत्कोच (रिश्वत) के तुल्य है। यह उल्लेखनीय है कि इसके पश्चात् महर्षि के कहने से सर माधवराव ने उचित हस्तक्षेप कर इस मामले का यथोचित समाधान कर दिया था।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

256

धन और सम्पत्ति परोपकार में लगे तो ही उत्तम

“वार्तालाप के प्रसंग में महर्षि ने कहा कि जिस जाति का ऐश्वर्य और वैभव जितना अधिक वृद्धिंगत होगा, वह जाति उतनी ही अधिक विलासमग्न होकर पतनोन्मुख होती जाएगी।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

- आज ये बात भारत में तो कई हद तक लागू दिखती है।

257

मितव्ययी दयानन्द

सार्वजनिक धन का अपव्यय बर्दाश्त नहीं -

वहाँ वे सामान्य लोकोपयोगी बातों की ओर भी पूरा ध्यान देते थे। जब एकदिन व्याख्यान स्थल पर ले जाने के लिए किराये की गाड़ी लाई गई, तो महाराज ने स्पष्ट कर दिया कि

“सार्वजनिक धन का व्यय कर किराये की गाड़ी लाना आवश्यक नहीं था।
वे गाड़ी में बैठने के शौकीन नहीं हैं। केवल समय की बचत की दृष्टि से वे तीव्रगामी वाहन का प्रयोग करते हैं।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-2)

258

धन प्रलोभन से मुक्त दयानन्द

महाराजा वेंकटगिरी ने जब महर्षि दयानन्द से मूर्ति पूजा का विरोध न करने तथा अपने कार्यक्रम में उसको अन्तिम स्थान पर रखने का निवेदन करते हुए समूचे वेदभाष्य का आर्थिक भार उठाने की बात कही तब उन्होंने अत्यन्त आवेश से कहा –

“क्या आपने मुझे दुकानदार समझ रक्खा है जो धन के प्रलोभन में अपने कर्त्तव्य से च्युत हो जाऊँ?”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-2)

259

लोकहित के लिए पतित होना भी स्वीकार

“महर्षि ने इस अवसर पर अपने हृदयोद्‌गारों को व्यक्त करते हुए ‘प्रेस’ स्थापना की पृष्ठभूमि बताई, किन्तु शीघ्र ही अत्यन्त मार्मिक स्वर में बोल उठे,

“आज हम पतित हो गये, आज हम गृहस्थ हो गये।”

महाराज के इन पीड़ापूर्ण उद्‌गारों से कौन-सी ध्वनि निकल रही है? लौकिक ऐषणाओं का सर्वथा त्याग करने वाले इस निवृत्ति मार्गी संन्यासी ने लोकहित को अपना सर्वोपरि लक्ष्य बनाया है। इसी महत् उद्देश्य की पूर्ति के लिये वह जगतीतल पर वेदादि शास्त्रों के सत्यार्थ को प्रकाशित करना चाहता है।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

शब्दार्थ - पतित होना - उच्च आश्रम यानि संन्यास आश्रम के कर्त्तव्यों से नीचे आकर गृहस्थ के कार्य को करना है। उनका दुःख है कि अब प्रेस लगाने और उसकी व्यवस्था देखने के लिए गृहस्थ जैसी जिम्मेदारी निभानी होगी।

260

परोपकारी हृदयी - दयानन्द

“मैं सत्य, योगविद्या और मोक्ष (जो बिना अपनी आत्मा की पवित्रता और सत्य, न्याय आचरणों के नहीं प्राप्त हो सकता) चाहता हूँ और जब तक यह अर्थ सिद्ध नहीं होगा तब तक बराबर अपने देशवालों का उपकार, जो मनुष्य का कर्त्तव्य है, करता रहूँगा।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

261

व्यक्तिपूजा के विरोधी दयानन्द

मानव का कल्याण ही इस देह का उद्देश्य रहे, यही कामना है दयानन्द की -

“मैं व्यक्ति पूजा का घोर विरोधी हूँ। मेरी तो इच्छा है कि मृत्यु के पश्चात् मेरी भस्म भी किसी खेत में डाल दी जाय, ताकि वह खाद बनकर किसी कृषक की फसल को सुधारे। विभिन्न प्रकार के जड़ स्मारकों से मूर्तिपूजा की प्रथा को ही प्रोत्साहन मिलता है।”

(नव. जा. के. पु. म. द.)

262

ऋषि परम्परा के प्रति श्रद्धावान दयानन्द

महर्षि के कुछ अन्यतम शिष्य भावनाओं में आकर कह देते थे - ‘स्वामी जी आप तो महाविद्वान हैं, कोई शास्त्र आप भी रच दें, 
किन्तु स्वामी जी विन्रमतापूर्वक मना करते हैं।’
कारण क्या है -

“जो शास्त्र बने हुए हैं उनमें कौन सी कमी है?
जिसको पूरा करने के लिए मैं अपना नया शास्त्र बनाऊँ और केवल नाम छोड़ने की आशा से पुस्तक बनाने में समय व्यर्थ गंवाऊँ?”

(पं. लेख. म. द. जी. च.)

आज विद्वान बाद में बनते हैं, ग्रन्थ पहले लिख देते हैं, ऋषिकृत ग्रन्थों की प्रतिष्ठा करने से ही होगा समाज में बदलाव।

263

सत्य पर अगाध निष्ठा

ये जगजाहिर है कि स्वामी जी कभी सत्य से चूके नहीं, ऐसे ही एक बार पादरी शूलब्रेड ने ईसाई धर्म पर किए गए प्रश्नों पर चिढ़कर कहा- ‘ऐसी बातों से आप कभी कारावास में चले जाएँगे।’
दयानन्द ने उत्तर दिया कि-

“आप यदि ऐसा कष्ट दिलाएँगे तो मुझे तनिक भी चिन्ता न होगी मैं कारावास जाने के भय से सत्य को नहीं छोड़ सकता।”

- (म. द. च.)

- अन्त में सत्य कथन के चलते ही उनका बलिदान हुआ।

264

जीवन पर्यन्त परोपकार करने को कृत संकल्पित दयानन्द

कभी-कभी ऋषि दयानन्द के शिष्य कार्यों में आलस्य करते थे तो स्वामी जी अपना दुःख और संकल्प दोनों प्रदर्शित करते हैं -

“यदि तुम लोग जैसा कि अब उदासीनता की बात लिखी है, लिखोगे या करोगे तो सब संसार की हानि का अपराध तुम्हारे ऊपर होगा और मैंने जो उपकार करना निश्चित किया है, जहाँ तक बन पड़ेगा आमरण करूंगा ही, जन्मान्तर में भी।”

(नव जा. के. पु. म. द. भाग 2)

- ऋषि ने अन्तिम क्षण तक ये वचन निभाया।

265

हास्य मिश्रित उपदेश करते दयानन्द-शुद्ध मनुष्यों का मिलना दुर्लभ है

दयानन्द, जिनको काम पर रखते थे, वे गलती भी करते थे, धोखा भी देते थे, तब दयानन्द दुःखी होकर एक सच्चाई को अपने हास्यमिश्रित शब्दो में कहते हैं -

“सब पदार्थ संसार में सुलभ हैं परन्तु शुद्ध मनुष्य का मिलना दुर्लभ है।”

“बड़े-बड़े तो बिगड़ कर तेल के बड़े (नमकीन खाद्य पदार्थ) बन जाते हैं और छोटे-छोटे सुधर कर बड़े (महान्) बन जाते हैं।”

(नव जा. के. पु. म. द. भाग 2)

266

सत्य को स्पष्ट कहने वाले दयानन्द

महर्षि जिन-जिन ग्रन्थों में जो मिथ्या-सृष्टिक्रम, विज्ञान विरुद्ध बाते हैं, उनका सबके समाने विचारार्थ प्रकाश करते हैं और आग्रह रहित मनन चिन्तन करने के लिए निवेदन करते है, वे विरोधियों को तलवार से मार डालेने के 
पक्षधर तो नहीं है -

लोग कहते हैं कि मैं इस्लाम की आलोचना से विरत हो जाऊँ, परन्तु सत्य को ओझल कर देना, मेरे लिए सम्भव नहीं है। जब मुसलमानों का शासन था, तो उन्होंने तलवार के बल पर आर्य धर्म एवं संस्कृति को नष्ट किया किन्तु अब जब वाणीमात्र से भी उनके मत की आलोचना की जाती है तो उन्हें आपत्ति होती है।

- (नव जा. के. पु. म. द.)

267

ज्ञान जिज्ञासु - दयानन्द

ग्रन्थों मे लिखे हुए की स्वयं परीक्षा करने पर ही निश्चय करते थे कि 
इनमें जो लिखा है, वो कितना सत्य है?

“एक दिन दैव संयोग से एक शव मुझे नदी में बहता हुआ मिला। तब सचमुच मुझे अवसर प्राप्त हुआ कि मैं उसकी परीक्षा करता। मैं नदी के भीतर गया और शव को पकड़ तट पर लाया। मैंने तीक्ष्ण चाकू से उसे यथायोग्य काटना आरम्भ किया और हृदय को उसमें से निकाल लिया और ध्यानपूर्वक देख परीक्षा की। अब पुस्तकोल्लिखित वर्णन की उससे तुलना करने लगा। यह निश्चय करके कि दोनों, अर्थात् पुस्तक और शव लेशमात्र भी परस्पर नहीं मिलते मैंने पुस्तकों को फाड़कर उनके टुकड़े-टुकड़े कर डाले और शव को फेंक, साथ ही पुस्तकों के टुकड़ों को भी फेंक दिया।”

- (महर्षि दयानन्द की आत्मकथा)

268

कृतज्ञ-दयानन्द

जिन्होंने पढ़ने के दौरान स्वामी जी के भोजन व्यवस्था की थी, 
दयानन्द उन्हें कभी भूले नहीं -

“मथुरा में एक भद्रपुरुष अमरलाल नाम का था। मेरे विद्याध्ययन काल में जो उपकार उसने मुझ पर किये हैं उन्हें मैं कभी न भूलूँगा। पुस्तक सामग्री और भोजन आदि का प्रबन्ध उसने अति उत्तम कर दिया। स्वयं उसे कहीं बाहर भोजन करने जाना होता तो प्रथम मुझको घर में बनाकर खिलाता पुनः आप बाहर जाता। इस प्रकार वह पुरुष बहुत उदारचित्त था।”

- (महर्षि दयानन्द की आत्मकथा)

269

गुरुभक्त दयानन्द

एक बार गुरु विरजानन्द जी ने किसी बात पर क्रुद्ध होकर जब दयानन्द की 
लाठी से पिटाई की तो दयानन्द ने कहा -

“महाराज, आप भी मुझे न मारा करें, मेरा शरीर तो वज्र के समान है, उस पर प्रहार करने से आपके कोमल हाथों को ही पीड़ा होगी।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

270

परोपकार हेतु मुक्ति का आनन्द भी त्यागने को उद्यत दयानन्द

महर्षि की योग विद्या और ब्रह्मचर्य ऐसा था कि वे मोक्ष प्राप्त करने की 
राह पर आगे बढ़ सकते थे।

“मैं अपनी मुक्ति के लिए उत्सुक नहीं हूँ। मैं तो उस दिन को देखना चाहता हूँ जब त्रिताप, सन्तप्त जनसमाज नाना क्लेशों और पीड़ाओं से मुक्त होकर श्रेयमार्ग का पथिक बनेगा।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

271

अटल ईश्वर विश्वासी दयानन्द

“आज तक मेरे प्राण हरण की अनेक चेष्टाएं हुईं किन्तु सर्वरक्षक परमात्मा के भरोसे मैं अपने कर्तव्य पालन में तत्पर रहा हूं और इसी प्रकार आगे भी रहूंगा।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

272

विरोधियों पर भी हमेशा दया रखने वाले दयानन्द

एक गंगापुत्र (गंगा किनारे रहकर निर्वाह करने वाला) रोजाना दयानन्द को अपशब्द कहता था, एक दिन वो क्षमा मांगने आया, दयानन्द ने तो 
कभी उसके विरोध में सोचा ही नहीं था - 
दयानन्द बोले-

“भाई, मैंने तुम्हारी गालियों को कभी अपने हृदय में स्थान दिया ही नहीं, अतः तुम्हारा दुःखी होना अकारण है?”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

273

सत्य के सामने कुछ नहीं

एक राजा ने मूर्ति पूजा के विरोध छोड़ने की शर्त पर काफी सम्पत्ति देनी चाही -

“यदि आप अपना सम्पूर्ण राज्य मुझे दे दें तो भी मैं मूर्तिपूजा के मिथ्यात्व तथा ईश्वरोपासना में उसकी अनुपयोगिता का प्रतिपादन करने से कभी विरत नहीं होऊँगा।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

274

दयावान दयानन्द

एक बार जब जहर देने वालों को कोतवाल पकड़कर स्वामी दयानन्द के समक्ष लाया तो दयानन्द ने उसे छोड़ने का निवेदन किया -

“मैं संसार के लोगों को कैद कराने नहीं, अपितु उन्हें अज्ञान, अविद्या तथा अन्धविश्वासों की कारागार से मुक्त कराने आया हूँ। यदि दुष्ट आदमी अपनी दुष्टता को नहीं छोड़ता, तो सज्जन अपनी सज्जनता क्यों छोड़े?”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

275

सच्चे संन्यासी दयानन्द

लोग चाहते थे स्वामी जी दीर्घ समय तक उनके यहां रहकर उपदेश करें पर दयानन्द संन्यासी थे, वे एक जगह अधिक रुकना उचित नहीं 
समझते थे और उन्होने कहा कि -

“सभी प्रकार के मोह और ममता को त्याग देने वाले परमहंस को इस प्रकार स्नेहपाश में बाँधना उचित नहीं है। यदि वे लोग उनके द्वारा प्रदत्त उपदेशों का पालन करते रहेंगे तो यह उनके सान्निध्य में रहने के तुल्य ही होगा।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

276

देशोन्नति एवं स्वराज्य का स्वप्न देखते दयानन्द

देश और समाज का हित ही प्रमुख है, अन्य कुछ नहीं

“मुझे अपनी मुक्ति की चिन्ता नहीं है। दयानन्द के नेत्र उस दिन को देखना चाहते हैं, जब देश के लाखों, करोड़ों निवासी अज्ञान, अविद्या तथा अन्धविश्वासों की कारागार (जेल) से मुक्त होंगे तथा दैन्य, दारिद्रय, शोषण, अभाव तथा पराधीनता के पाशों को छिन्न-भिन्न कर सच्चे स्वराज्य की प्राप्ति कर लेंगे।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

277

शिष्य के प्रति भी सेवाभावी दयानन्द

“एक दिन जब पं. कृष्णराम को ज्वर हो गया, तो महाराज स्वयं उनका सिर दबाने लगे। भक्त के आपत्ति करने पर उन्होंने कहा कि यदि बड़े छोटों के प्रति स्नेह तथा सेवा का प्रदर्शन नहीं करेंगे तो छोटों में ये भाव कहाँ से आयेंगे?”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

278

कृष्ण पर आरोप स्वीकार नहीं पहले स्वयं के घर देखें फिर ही पत्थर मारें

चर्च के पादरी और मौलवी पुराणों में लिखे कृष्ण के स्वरूप का हमेशा हास्य किया करते थे, दयानन्द सुन नहीं सके -

“जो लोग, कृष्ण के पुराण वर्णित चरित्र पर आक्षेप करते हैं, उनका स्वयं का धर्म भी बहुत युक्तिसंगत तथा बुद्धि के अनुकूल बातें नहीं कहता। जो लोग यह मानते हैं कि ईश्वर का आत्मा कबूतर के रूप में उतरता है, उन्हें कृष्ण के लोकोत्तर चरित्र पर आक्षेप करने का क्या अधिकार है?”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

दुःख होता है जब लोग महर्षि को कृष्ण को न मानने वाला बताते हैं

279

परमात्मा के अतिरिक्त और किसी की न चिन्ता, न डर

स्वामी जी को कश्मीर में प्रचारार्थ जाने की बात आने पर राज पण्डितों ने कुछ राजा के नाम से सिद्धान्तों को छोड़ने सम्बन्धी शर्तें रखीं तो महर्षि ने कहा -

“भला मैं, काश्मीर के राजा की प्रसन्नता की चिन्ता करूँ या ब्रह्माण्ड के अधिपति उस परमात्मा की, जिसकी आज्ञाओं पर चलना तथा अन्यों को चलने की प्रेरणा देना मैंने स्वजीवन का लक्ष्य बनाया है।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

280

स्पष्टवक्ता दयानन्द

केवल परमात्मा को साक्षी मानकर सत्य की प्रतिष्ठा करना-करवाना ही कर्त्तव्य है दयानन्द का - एक बार एक शिष्य ने स्वामी जी से कहा कि नबाब आदि के सामने कुछ कटु शब्द मत बोला करें, स्वामी जी ने निर्भीकता से उत्तर दिया -

“मेरा प्रयोजन किसी मत या समुदाय की अनावश्यक निन्दा या स्तुति करना नहीं है। और न मैं किसी से भयभीत होकर अपने कर्त्तव्य से विरत होता हूँ। वैदिक धर्म ही मेरा प्रतिपाद्य है और मेरी यह दृढ़ धारणा है कि यही सच्चा मानव धर्म है जिसके परिपालन में अशेष जगती का हित निहित है। इसी वेदोक्त धर्म का प्रचार मुझे अभीष्ट है। मैं स्वयं भी जानता था कि नवाब साहब मेरा भाषण सुन रहे हैं। अतः मैंने सकारण ही वैदिक धर्म की इन विशेषताओं को उन्हें कर्ण गोचर कराया है। परमात्मा के अतिरिक्त मुझे किसी का भय नहीं है।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

281

सहनशीनलता की प्रतिमूर्ति धर्मरक्षक दयानन्द जाति एवं 
धर्म के प्रति उनका समर्पण

“मैं यह काम किसी स्वार्थ से तो कर ही नहीं रहा हूँ अपितु इसके कारण मैं अनेक प्रकार के कष्ट सहता हूँ, गालियाँ और ईंट पत्थर खाता हूँ। विष तक भी मुझे दिया गया, परन्तु जाति और धर्म के लिये मैं सब कुछ सहन करता रहता हूं।”

- (महर्षि दयानन्द चरित)

282

महर्षि मनुष्यों के कल्याण के लिए कड़वी से कड़वी दवा देने के पक्षधर हैं

महर्षि दयानन्द से कुछ लोग विनयपूर्वक आग्रह करते थे कि आप कठोर शब्दों का उपयोग न किया करें, किन्तु दयानन्द का कहना था कि बड़ी 
बीमारी के लिए कडवी दवाई देनी पड़ती है -

“मैं बड़े-बड़े कँटीले वृक्षों को नहुरने से नहीं काटता उनके लिये तो अति तीक्ष्ण शस्त्रों की आवश्यकता होती है।”

- (महर्षि दयानन्द चरित)

नहुरने - नाखून काटने वाला यंत्र

283

गुणों को ग्रहण-दोषों का त्याग

सत्य को ग्रहण और असत्य को त्यागने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए -

“जैसा मैं पुराण, जैनियों के ग्रन्थ, बाइबिल और कुरान को प्रथम ही बुरी दृष्टि से न देखकर, उनमें से गुणों का ग्रहण और दोषों का त्याग तथा अन्य मनुष्य जाति की उन्नति के लिए प्रयत्न करता हूँ, वैसा सबको करना योग्य है। (भूमिका)”

- (सत्यार्थ प्रकाश विमर्श)

- हम अगर विचारपूर्वक सोचें तो आज तक किसने सत्य-असत्य का विचार करने के निमित्त सबके ग्रन्थों का किसने गहराई से अध्ययन किया था। बाहर वालों को तो छोड़ दें, स्वयं ग्रन्थ वालों ने भी ठीक से नहीं किया। ये मानव जाति के लिए अवश्य नहीं कि सत्य और असत्य को पहचान कर असत्य को छोड़ सत्य मार्ग को अपनाकर उन्नति को प्राप्त करे? ये दयानन्द की कृपा न कहें तो क्या कहें?

284

सबके मोक्ष की कामना करते लोकहितकारी दयानन्द

“मैं स्वयं के मोक्ष की तो कथश्चिंत् मात्र भी चिन्ता नहीं करता। मेरी हार्दिक अभिलाषा यही है कि अखिल मानव समाज अपवर्ग का अधिकारी बने।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-2)

285

ओरौं के दुःख को देखकर ही दुःखी दयानन्द

अपने कष्ट के लिए कभी भी दयानन्द ने दुख प्रकट नहीं किया। किन्तु आर्य जाति की अधोगति देखना बर्दाश्त नहीं–

“जब मैं आर्य जाति की सार्वत्रिक अधोगति और अवनति देखता हूँ तो मेरी वेदना का पार नहीं रहता।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-2)

286

स्वयं को विद्वान कहलाना अभीष्ट नहीं विनम्र दयानन्द -

महर्षि को प्रेम से लोग बड़े-बड़े विशेषण लगाकर सम्मान देते थे, परन्तु महर्षि अपने आपको साधारण विद्वान ही कहलाना पसन्द करते थे -

“भाई! पुराकालीन ऋषियों के अभाव में तुम मुझे कुछ भी कह लो, किन्तु यदि सांख्य एवं वैशेषिक दर्शनों के प्रवक्ता महर्षिवर्य कपिल और कणाद के युग में मैं होता, तो मेरी गणना साधारण विद्वान् के रूप में भी कथश्चिंत् ही हो पाती।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-2)

कथश्चित् - शायद

287

आर्यसमाज की उन्नति का स्वप्न देखते आशावादी दयानन्द

सम्पूर्ण विश्व में आर्यसमाज के प्रचार प्रसार की आशा को प्रकट कर रहे हैं -

“मैं जो कुछ वैदिक धर्मोपदेश कर चुका हूँ अथवा करूँगा उसका प्रायोगिक सुख अपने जीवनकाल में न देख सकूँगा। जो धर्म का बीज बोया गया है उसका अंकुर तो मेरे सम्मुख ही निकल आया है, वही भविष्य में वृक्ष रूप में फल लायेगा।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-2)

288

महान योगी होने पर भी अहंकार शून्य दयानन्द

खुद को योग का आचरण करने वाला तो कहते हैं, 
पर महान योगी कहने का तैयार नहीं -

“मैं प्रथम कोटि का योगी नहीं हूँ, मध्यम कोटि का हूँ। किन्तु मैं अपनी चेतना को शरीर के किसी एक भाग में केन्द्रित कर सकता हूँ। उस स्थिति में शरीर के उस भाग को छोड़कर अवशिष्ट अंश मृतवत् हो जायेंगे, चेतना का आधार वह अंग ही रहेगा।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-2)

289

शुद्धिकर्ता दयानन्द

शुद्धि कार्य के प्रणेता - दयानन्द

प्रश्न - अन्य मतों के मनुष्यों को शुद्ध करना चाहिए या नहीं?

उत्तर - अवश्य शुद्ध करना चाहिए।

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-2)

अपने जीवन में उन्होंने अनेक शुद्धि अपने हाथों से की तथा आर्य समाज ने इसे अपना प्रमुख आन्दोलन बना लिया -

290

विज्ञानवेत्ता दयानन्द

महर्षि वेद को विज्ञान की पुस्तक कहते थे तो कभी-कभी कुछ भक्त विज्ञान की बातें भी पूछ लेते थे। महर्षि भी गहराई से उत्तर देते थे -

३- विद्युत् क्या वस्तु है और किस प्रकार उत्पन्न होती है?

उत्तर- विद्युत् सर्वत्र है और रगड़ से उत्पन्न होती है। बादलों की विद्युत बादलों और वायु की रगड़ से उत्पन्न होती है।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-2)

291

मान-अपमान की चिन्ता नहीं - परोपकार ही लक्ष्य

महर्षि सोचते थे कि जो कार्य वो कर रहे हैं, वह ईश्वर की आज्ञा के अनुसार ही है। अतः वे अब व्यक्तिगत मान-अपमान को भी महत्व या ध्यान नहीं देते, 
लक्ष्य पूरा करना ही अब उनको अपेक्षित है।

“इसी महान लक्ष्य की पूर्ति के लिये मैं व्यक्तिगत मान-अपमान की चिन्ता किये बिना, समाज के प्रत्येक वर्ग को प्रेरणा तथा उ‌द्बोधन देता हुआ, देश में सर्वत्र भ्रमण कर रहा हूँ। मुझे अपने पथ से विचलित करने के अनेक प्रयत्न किये गये, यहाँ तक कि नाना प्रकार की शारीरिक यातनाएँ एवं विष देकर मुझे समाप्त करने तक की चेष्टाएँ की गईं, तथापि मैं अपने लक्ष्य की ओर निरन्तर बढ़ रहा हूँ, यह ईश्वर की महती कृपा है।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-2)

292

सत्य के लिए कोई भी बलिदान स्वीकार

जोधपुर जाते समय, लोगों ने चेताया कि वहां सत्य बोलने से बचिएगा, राजा क्रोधित हो सकता है, पर वे सत्य को कहां छोड़ने वाले थे -

“सत्य के प्रचारार्थ बड़े से बड़े कष्ट को सहन करने में भी मुझे कोई संकोच नहीं होगा। यदि वहाँ के लोग मेरे पथ्य युक्त सत्य कथन से चिढ़कर मेरी अंगुलियों को बत्तियों की भाँति जला दें, तब भी मैं सत्य को कहने तथा उसका प्रतिपादन करने से कभी पीछे नहीं हटूंगा।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-2)

- उपरोक्त कथन को सत्य की बलिवेदी पर बलिदान देना नहीं तो क्या कहेंगे?

293

लाग-लपेट के शब्द स्वीकार नहीं दयानन्द को

महाराज, आप हमारे महाराजा के चरित्र के सम्बन्ध में कुछ न कहा करें। इस पर सत्यनिष्ठ संन्यासी ने किंचित आवेशपूर्वक उत्तर दिया -

“मैं जो कुछ कहता हूँ सत्य कहता हूँ। यद्यपि मैं नाम निर्देशपूर्वक अथवा असभ्यतापूर्वक कथन नहीं करता, तथापि मुझसे लाग-लपेट तथा लल्लोचप्पो की बातें कहलवाने का प्रयास निरर्थक है।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-2)

294

अपने कठोर दुख में भी अन्यों को कष्ट देने को तैयार नहीं 
करुणानिधि दयानन्द

जोधपुर में जहर देने के पश्चात् किसी को भी सूचना नहीं दी गई। भक्त सोढा जी जब पता लेने पहुंचे और सूचना न देने का दुःख जताया तो दयानन्द बोले -

“सोढ़ाजी! यह तो शरीर का धर्म है। शरीर का दुःखी सुखी होना स्वाभाविक है। यदि मैं आप अथवा अन्यों को सूचित करता तो आपको दुःख के अतिरिक्त और क्या होता?”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-2)

295

आर्यावर्त की वर्तमान अवस्था से दुःखी दयानन्द 
पराधीनता से दुःखी दयानन्द

दयानन्द तो सारी दुनिया पर आर्यावर्त के अधिनत्व के गौरवकाल को देखकर और वर्तमान में अपने ऊपर ही विदेशी साम्राज्य होने के कारणों को 
बताते हुए विचलित से हैं -

“अब अभाग्योदय से और आर्यों के आलस्य, प्रमाद, परस्पर के विरोध से अन्य देशों के राज्य करने की कथा ही क्या कहना, किन्तु आर्यावर्त में भी आर्यों का अखण्ड, स्वतन्त्र, स्वाधीन, निर्भय राज्य इस समय नहीं है। जो कुछ है सो भी विदेशियों के पदाक्रान्त हो रहा है। थोड़े राजा स्वतन्त्र हैं।”

दुर्दिन जब आता है तब देशवासियों को अनेक प्रकार का दुःख भोगना पड़ता है।

- (स्वराज की भावना का उदबोधन)

- आप देखेंगे कि दयानन्द को कोई व्यक्तिगत पीड़ा या दुःख नहीं है जो है, देश की, गौ की, विधवा की और आर्य जाति की अवस्था को देखकर ही है।

296

गुणग्राही दयानन्द

“अंग्रेजों में हमारी अपेक्षा विशेष गुण नहीं हैं, ऐसा मेरा कहना नहीं है, किंतु उनमें भी बहुत से अच्छे गुण हैं, सो उनके गुणों को हम स्वीकार करें, यही हमें योग्य है।”

- (स्वराज की भावना का उदबोधन)

297

मृत्युंजयी एवं पुरुषार्थी दयानन्द

“जिस पहाड़ पर अलकापुरी थी उस पर भी मैं इस विचार से गया था कि एक बार ही अपना शरीर बर्फ में गलाकर संसार के धन्धों से निवृत हों जाउं, परन्तु वहां पहुंचकर विचार आया कि इस जगह मर जाना तो कोई पुरुषार्थ नहीं है, अपितु ज्ञान प्राप्त करके परोपकार करना ही पुरुषार्थ है।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

298

आशावादी दयानन्द

अनेकोनेक सामाजिक समस्याएं देखकर दयानन्द दुःखी हैं, पर वे उसके समाधान के लिए आशावादी हैं - वे कहते हैं

“यद्यपि रोग बहुत बढ़ा हुआ है, तथापि इसका उपाय हो सकता है। यदि परमात्मा की कृपा हुई तो रोग असाध्य नहीं है।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

299

निराभिमानी दयानन्द

दयानन्द सबका सहयोग पाने की इच्छा से कहते हैं -

“मेरे जैसे एक निर्बल मनुष्य के करने से यह काम कैसे हो सकेगा, इसलिए आप सब बुद्धिमान् लोगों से आशा करता हूं कि आप मुझे इस शुभ कार्य में सहयोग देवें।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

300

दृढ़निश्चयी दयानन्द

“आर्य धर्म की उन्नति के लिए मुझ जैसे बहुत से उपदेशक आपके देश में होने चाहिए। ऐसा काम अकेला आदमी भली प्रकार नहीं कर सकता, फिर भी यह दृढ़ निश्चय कर लिया है कि अपनी बुद्धि और शक्ति के अनुसार जो कुछ दीक्षा ली है, उसे चलाऊंगा।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

301

सत्य के प्रति अनुरागी दयानन्द

सायण वेद के भाष्यकार थे, जिनके भाष्य को दयानन्द स्वीकार नहीं करते। वे कहते हैं कि सायण का भाष्य वेद के सही स्वरूप को प्रदर्शित नहीं करता -

“यदि सायण ने भूल की है और अंग्रेजों ने उसको अपना मार्ग प्रदर्शक जानकर अंगीकार कर लिया तो भले ही करें, परन्तु मैं जानबूझ कर कभी भूल का काम नहीं कर सकता। मिथ्या मत बहुत काल तक नहीं ठहर सकता, केवल सत्य ही ठहरता है और असत्य सत्यता के सम्मुख शीघ्र धुमैला हो जाता है।”

(दयानन्द सरस्वती) - पत्र व्यवहार

302

आयुर्वेद ज्ञाता चिकित्सक दयानन्द

अपने शिष्य को लिखे पत्र के निम्न वाक्यों से महर्षि दयानन्द के आयुर्वेद के ज्ञाता होने का भी आभास है -

“माजूफल, मोरेठी, पपरिया कत्था, रूमी मस्तगी, नीला थोथा, ये पांच चीज बराबर अर्थात् आध-आध पाव से कम न हों। नीला थोथा को अग्नि पर फुला के थोड़ा सा जल कड़ाही में रख के बुझा ले और बुझा के शीघ्र निकाल के पांचों चीजें अलग-अलग पीस लें उन पांचों की बराबर आक के जड़ की छाल अर्थात् पृथिवी में से खोद के धो डाले जिससे मिट्टी कंकर न रहे। छाल को छोटी-छोटी काट के जिस जल में नीला थोथा बुझाया है उसमें छः ही चीजें डाल के लोहे की कड़ाही में लोहे की मुसली से कूटे जब महीन हो तब निर्वातस्थान में पीसे, जब तक अंजन के समान न हो जाए पीसता जाए पीछे किसी शीशी में भर रखे। दांतोन करके पीछे अंगुली से दांत और मसूरों में लगावे। इससे दांत पुष्ट रहेंगे न हिलेंगे न गिरेंगे न पीड़ा होगी। सबसे हमारा नमस्ते कह देना।”

(दयानन्द सरस्वती) - पत्र व्यवहार

303

निराभिमानता की पराकाष्ठा

निर्लेप दयानन्द की निराभिमानता किस कदर झलकती है, धन्य हो दयानन्द

“भाई, हमारा कोई स्वतन्त्र मत नहीं। मैं तो वेद के अधीन हूँ और हमारे भारत में पच्चीस कोटि आर्य हैं। कई-कई बात में किसी-किसी में कुछ-कुछ भेद है, सो विचार करने से आप ही छूट जायेगा। मैं संन्यासी हूँ और मेरा कर्त्तव्य यही है कि जो आप लोगों का अन्न खाता हूँ इसके बदले जो सत्य समझता हूँ उसका निर्भयता से उपदेश करता हूँ। मैं कुछ कीर्ति का रागी नहीं हूँ। चाहे कोई मेरी स्तुति करे वा निन्दा करे, मैं अपना कर्त्तव्य समझ के धर्म बोध कराता हूँ। कोई चाहे माने वा न माने, इसमें मेरी कोई हानि-लाभ नहीं है।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

304

दुर्वचन सुनने में भी प्रसन्नता का भाव है दयानन्द का

उनके तीव्र और कठोर खण्डनमण्डन से रुष्ट होकर जब लोग उनको दुर्वचन कहते, अथवा गालियाँ देते, तो महर्षि उपेक्षा भाव से यही कहकर रह जाते कि

“जैसे ससुराल में जामाता गालियाँ सुनकर प्रसन्नता अनुभव करता है, उसी प्रकार मैं भी यदि परमात्मदेव के वास्तविक स्वरूप तथा उनकी यथार्थ उपासना प्रणाली का प्रचार करते हुए इन अपशब्दों का पात्र बनता हूँ, तो यह मेरी प्रसन्नता का विषय होगा।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

305

सत्य के लिए कुछ भी स्वीकार

एक दिन किसी ने कहा कि आपके सत्य बोलने से लोग रूष्ट हो जाएगे, दुःश्मन बन जाएंगे। अतः आप इनसे बचने का प्रत्यन करें। महर्षि ने उसी दिन की सभा में प्रवचन देते हुए निम्न शब्द बोले - 

“लोग कहते हैं कि सत्य को प्रकट न करो, कलेक्टर क्रोधित होगा, कमिश्नर अप्रसन्न होगा, गवर्नर पीड़ा देगा। अरे, चक्रवर्ती राजा भी क्यों न अप्रसन्न हो, हम तो सत्य ही कहेंगे। इसके पीछे एक श्लोक पढ़कर आत्मा की स्तुति की। न शस्त्र उसे काट सके, न आग उसे जला सके, न पानी उसे गला सके, और न हवा उसे सुखा सके। वह नित्य, अमर है। फिर गरजते हुए शब्दों में बोले- यह शरीर तो अनित्य है, इसकी रक्षा में प्रवृत्त होकर अधर्म करना व्यर्थ है। इसे जिस मनुष्य का जी चाहे नाश कर दे। फिर चारों ओर तीक्ष्ण दृष्टि डालकर सिंहनाद करते हुए कहा- किन्तु वह शूरवीर पुरुष मुझे दिखलाओ, जो मेरे आत्मा का नाश करने का दावा करे। जब तक ऐसा वीर संसार में दिखाई नहीं देता, तब तक मैं यह सोचने के लिए भी तैयार नहीं कि मैं सत्य को दबाउँगा वा नहीं।” 
सारे हाल में सन्नाटा छा गया। रूमाल का गिरना भी सुनाई देता था। 

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-2)

- सत्य का महान पुजारी ही इन शब्दों का प्रयोग कर सकता है।

306

स्वदेशी के प्रबल समर्थक दयानन्द

विदेशी चाकू से सेव काटते हुए अपने एक भक्त को 
दयानन्द ने समझाते हुए कहा था -

“जब वो अपने देश का बना छः पैसे का चाकू यही काम कर सकता है, तो तुमने सवा रूपये का विदेशी चाकू लेकर क्यों अपने देश का धन नष्ट किया।”

- (स्वामी दयानन्द का राजनीतिक दर्शन)

307

स्त्रियों के लिए बाहरी बाबाओं को गुरु बनाने के बारे में

ऋषि दयानन्द तब तथाकथित बाबाओं के चरित्र को पहचान चुके थे, निरन्तर यात्राओं में, खासकर धार्मिक स्थानों में उन्होंने जो गड़बड़ देखी तो उन्होंने ये उपदेश दिया- गुरु मत बनाओ -

“एक दिन कुछ स्त्रियां दोपहर के समय विशेष आज्ञा प्राप्त करके स्वामीजी के पास उपदेश सुनने के अभिप्राय से गईं और स्वामीजी से पूछा कि ज्ञान और शान्ति किस प्रकार हो सकती है? स्वामीजी ने उनसे कहा कि तुम्हारे पति तुम्हारे गुरु हैं, उन्हीं की सेवा तुमको करनी चाहिए, किसी साधु को गुरु मत बनाओ और विद्या पढ़ो। तुम अपने पतियों को यहां भेजा करो और उनके द्वारा हमारे उपदेश से लाभ उठाया करो। उस दिन के पश्चात् स्वामीजी ने स्त्रियों का आना बन्द कर दिया।”

(श्रीमद्दयानन्द जी च. पृ. 326)

-आज के गुरुओं से आप क्या अपेक्षा रखते हैं?

308

छुआछूत और अंधविश्वासी परम्पराएं कैसी भी हों, 
स्वीकार नहीं दयानन्द को-

“ठाकुर प्रसाद नामक एक व्यक्ति जब महर्षि के लिए, भोजन लेकर आया, तो उसने पाँवों में जूते नहीं पहन रखे थे। महर्षि ने जब नंगे पैर आने का कारण पूछा, तो उसने बताया कि वह महाराज के लिए कच्चा भोजन (दाल, भात, रोटी आदि) लेकर आया है, और ऐसा भोजन जूते पहने नहीं लाया जाता। इस पर महर्षि ने उसकी इस मूर्खता के लिए भर्त्सना की और कहा कि वे इस बेकार की छुआछूत को नहीं मानते।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

309

आदित्य ब्रह्मचारी - संकल्पबद्ध ब्रह्मचारी स्वामी दयानन्द

महर्षि के अखंड ब्रह्मचर्य के अनेकों उदाहरण, 
उनके व्यवहार में परिलक्षित होते हैं -

“मोहनबाबा की शिष्याओं ने महर्षि के दर्शन की प्रबल इच्छा व्यक्त की। प्रथम, चतुर्थ आश्रम की मर्यादा रक्षा की दृष्टि से महर्षि ने महिला वर्ग के समक्ष जाने में संकोच किया, किन्तु अत्यधिक आग्रह करने पर वे उस कक्ष में गये, जहाँ महिलाएँ उपस्थित थीं। इस अवसर पर वे निरन्तर भूमि की ओर दृष्टि लगाये बैठे रहे।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

310

सत्य के महान अनुरागी - दयानन्द

एक भक्त ने अपना संस्मरण सुनाते हुए कहा कि -

मुझे उनका यह कथन स्मरण है कि जब मैंने उनसे कहा कि यदि आपको तोप के मुँह पर रखकर कहा जाए कि यदि मूर्ति को मस्तक नहीं नवाओगे तो तोप से उड़ा दिया जाएगा, ऐसी स्थिति में आप क्या करेंगे जी?

स्वामीजी ने उत्तर दिया था कि “मैं कहूंगा कि उड़ा दो।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

311

धर्मानुसार कर्म की प्रेरणा

सब काम धर्मानुसार अर्थात् सत्य और असत्य को विचार करके करने चाहिए।

आर्य समाज का नियम

312

मानवमात्र की उन्नति की कामना करते दयानन्द

प्रत्येक को अपनी ही उन्नति से संतुष्ट न रहना चाहिए, किन्तु सबकी उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिए।

आर्य समाज का नियम

313

मानव समाज कों विद्या की वृद्धि का मन्त्र देते दयानन्द

अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिए।

आर्य समाज का नियम

314

विज्ञानवेत्ता दयानन्द

महर्षि अपने बात की पुष्टि के लिए अक्सर वैज्ञानिक, तार्किक और 
अकाट्य प्रमाणों की सहायता लेते हैं -

“महर्षि उक्त संस्था के कार्यालय के कमरे में रखे हुए एक बिल्लौरी (स्फटिक) पत्थर को उठाकर लाये और अंग्रेजी शिक्षित उपस्थित समुदाय से पूछने लगे कि आप लोग तो पदार्थ विद्या (विज्ञान) के जानकार हैं, बताइये कि इस पत्थर को इस रूप में आने में कितना समय लगा होगा? उपस्थित पठित व्यक्तियों का कहना था कि लाखों वर्ष सामान्य पत्थर को स्फटिक का रूप लेने में लगते हैं। इस पर महर्षि ने कहा कि जब पत्थरों के ऐसे परिवर्तन में ही लाखों वर्ष लग जाते हैं, तो सृष्टि को मात्र ↓ हजार वर्ष पुराना मानना कैसे उचित कहा जा सकता है?"

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

315

‘नमस्ते’ शब्द के प्रचारक दयानन्द

“ज्यों ही हम लोगों ने अभिवादन किया, बड़े आहलाद से उत्तर में ‘नमस्ते’ शब्द कहकर सबकी कुशलक्षेम पूछते हुए कहने लगे- अब अभिवादन के स्थान पर ‘नमस्ते’ शब्द का प्रयोग किया करो। पुनः इन लोगों को आर्यसमाज स्थापित करने की प्रेरणा की”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

316

विरोधियों की बातों से अविचल दयानन्द

कुछ लोग सत्य चर्चा से बचने के लिए कहते हैं कि हमें दयानन्द का मुख भी देखने से पीड़ा होती है, तो दयानन्द धैर्य का उत्तर देते हैं -

“भाई, मेरे मुख में ऐसी कोई विशेषता नहीं है, जो तुम्हें पीड़ा पहुँचाती हो। यदि मुख न देखना चाहते तो मत देखो, कम-से-कम मेरे पीछे खड़े होकर मेरी बातों को सुनो, जो तुम्हारे हित के लिये कही जा रही हैं।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

317

सच्चा गुरुमन्त्र

“एक दिन जब लाला मुरलीधर नामक एक सज्जन ने उनसे गुरुमन्त्र देने की प्रार्थना की, तो किसी शास्त्रोक्त मन्त्र की दीक्षा देने की अपेक्षा उन्होंने सत्य के ग्रहण और असत्य के त्याग को ही गुरुमन्त्र बताया।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

318

लाहौर आर्यसमाज के अधिवेशन की घटना स्वयं के बनाए नियम का 
कभी उल्लंघन नहीं किया दयानन्द ने -

“इसी अधिवेशन में आर्यसमाज के उपनियमों को अन्तिम रूप से स्वीकार किया गया था। महाराज भी प्रेक्षक के रूप में सभा में उपस्थित थे। जब उनसे उपनियमों के निर्धारण में सम्मति देने के लिए कहा गया तो महर्षि ने स्पष्ट किया कि वे उनकी अन्तरंग सभा के सभासद नहीं हैं, अतः अपने को सम्मति देने का अधिकारी नहीं मानते। परन्तु सभासदों का अत्यन्त आग्रह था कि आर्यसमाज के संगठन एवं संचालन विषयक संविधान के निर्धारण में महर्षि दयानन्द की सम्मति अवश्य ली जानी चाहिए। अतः उन्हें तुरन्त आर्यसमाज लाहौर की अन्तरंग सभा का प्रतिष्ठित सदस्य मनोनीत किया गया। उसके पश्चात् ही उन्होंने अपनी सम्मति से सभासदों को अवगत कराया।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

319

अंधविश्वासों को कतई स्वीकार नहीं कर सकते दयानन्द

धर्म की विद्याओं द्वारा लोगों को मूर्ख बनाने के कार्यों की दयानन्द ने सर्वत्र आलोचना की, किसी साधु ने घोषणा की थी कि वो मन्त्र शक्ति से मनुष्य को वश में कर सकता है। जब महर्षि को इस बात का पता चला, 
तो उन्होंने साधुओं को कहलाया कि -

“मनुष्य की तो बात दूर की है, वे शीशे की नली में बन्द एक मक्खी को ही मन्त्र शक्ति के द्वारा मारकर दिखाएँ, तो उनके चमत्कार को स्वीकार कर लिया जाएगा।”

परन्तु साधुओं को करना-कराना तो कुछ था नहीं। वे छात्रों को यही कहकर रह गये कि, जाओ, जाओ, यहाँ कहाँ मन्त्र रक्खे हैं? क्या मन्त्रों का प्रदर्शन ऐसे ही कर दिया जाता है।

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-2)

- आजकल अखबारों में लगातार मन्त्र वशीकरण और तन्त्र-यन्त्र आदि न जाने कितने गुमराह करने वाले कार्य चल रहे हैं, हमें सबको सावधान करना चाहिए, ताकि धर्म के नाम पर चल रहे व्यापार और धोखेबाजी से बचा जा सके।

320

दूसरों की पीड़ा से दुखी दयानन्द

महर्षि हरदम प्रसन्नचित्त रहते थे। वे जहर देने वालों पर भी क्रोधित नहीं हुए। वे दुःखी हुए तो कवेल गौ की स्थिति और विधवाओं की दशा को देखकर। एक बार पूरी रात सो नहीं सके, केवल करवटें बदलते रहे। महर्षि से नींद न आने का कारण पूछने पर वे अपनी पीड़ा इन शब्दों में बयान कर रहे हैं -

“विधवाओं पर होने वाले भंयकर अत्याचारों तथा गौ जैसे मूक किन्तु लोकोपयोगी पशु के अविचारपूर्ण वध के कारण इस देश को नियतिकृत अभिशापों को झेलना पड़ रहा है। देश की दीनता, हीनता एवं पराधीनता का प्रमुख कारण से अत्याचार हैं और ये ही बातें उन्हें पीड़ित कर रही हैं।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-2)

321

शिष्टाचार किसे कहते हैं?

दयानन्द शिष्ट-अशिष्ट का पूर्ण विचार करते हैं- एक सभा अभी समाप्त ही हुई थी कि बाबू कालीप्रसन्न वकील किसी से अंग्रेजी में बातचीत करने लगे। महर्षि ने उन्हें टोककर कहा कि -

“यह अशिष्टता है। हमें किसी सभा या गोष्ठी में उसी भाषा में बोलना चाहिए जिसे सर्वसामान्य समझते हों।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-2)

322

मेरे लिए जन्म एवं मृत्यु समान

किसी ने किसी की मृत्यु पर शोक व्यक्त करने के लिए जाने हेतु 
निवेदन किया तो दयानन्द कहते हैं -

“भाई, मैंने तो संसार से सब प्रकार के सम्बन्ध तोड़ दिये हैं। मेरे लिये जीवन एवं मृत्यु समान हैं। अतः किसी के प्रति शोक या प्रसन्नता प्रकट करना मुझे अभीष्ट नहीं है। मेरा सम्बन्ध धर्मोपदेश तथा जनहित के कार्यों से है।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-2)

323

क्षत्रिय हो, क्षत्रिय धर्म का पालन करो

एक बार राव कर्ण सिंह उनके धर्मप्रचार में आया और चर्चा से क्रोधित होकर म्यान से तलवार निकालनी चाही, तभी -

“तुम अभी अनुभव शून्य हो। तलवार पर हाथ धरना जानते हो परन्तु उसे म्यान से बाहर निकालना दुष्कर कार्य है। पुनः अपने अदम्य व्यक्तित्व तथा निर्भीक वृत्ति का परिचय देते हुए कहा मैं ऐसी धमकियों में आने वाला नहीं हूँ। यदि प्राणों की चिन्ता से मैं धर्मोपदेश करने तथा पाखण्डखण्डन के कार्य से विरत हो गया होता, तो उस महत् अनुष्ठान की पूर्ति के लिए कुछ भी करना मेरे लिए असम्भव था, जिसके लिए मैं प्राणपण से यत्नशील हूँ।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-2)

324

दयानन्द का प्रभाव

“ज्येष्ठ कृष्णा 4, 1941 वि० को महाराज प्रतापसिंह ने एक आदेश जारी किया जिसके अनुसार राजकर्मचारियों के लिये खादी पहनना अनिवार्य कर दिया गया था। नागौर जिले के मारोठ ग्राम में बनाई जानेवाली मोटी खादी, जिसे वहाँ ‘रेजा’ कहा जाता है, सैनिकों की पोशाक के काम में लाई जाने लगी।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-2)

325

जीवन की विशेषताएं दर्शाती घटनाएं

“ठाकुर गोपालसिंह के यह पूछने पर कि घोर शीत काल में, जब साधारण लोगों के लिए रजाई और कम्बल से बाहर निकलना भी दुष्कर होता है, उनका शरीर शीत से प्रभावित क्यों नहीं होता? उत्तर में महर्षि ने बताया कि ब्रह्मचर्य और योगाभ्यास इसका कारण है। ठाकुर ने पुनः पूछा कि हम आपके योगबल को कैसे जान सकते हैं। इस पर महाराज ने हाथों के अंगूठों को घुटनों पर रखकर दबाया तो तत्काल उनके शरीर से पसीना चूने लगा। यह देखकर दर्शकगण आश्चर्य चकित रह गये।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

326

जो जैसा है, वैसा ही माना

“महर्षि दयानन्द कभी-कभी साधारण विनोदवार्ता के माध्यम से ही अपने अभिप्राय को व्यक्त कर देते थे। एक दिन एक व्यक्ति ने पूछा-‘आप गंगा को क्या मानते हैं?’ महर्षि का उत्तर था- ‘वही जो दिखाई देती है।’ आगन्तुक ने पूछा- ‘आपको क्या दिखाई देता है?’ प्रत्युत्तर में महर्षि ने उससे पूछ लिया- ‘तुम्हें क्या दिखाई देता है?’ उसने कहा-‘मुझे तो जल दिखाई देता है।’ महाराज ने विनोदभाव से कहा- ‘मुझे भी यही दिखाई देता है।’ इस साधारण वार्तालाप से ही उन्होंने गंगादि नदियों के दैवत्व या अलौकिकत्व का खण्डन कर दिया।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

327

ढोंगी साधुओं के चंगुल में नहीं जाना चाहिए

“इस प्रसंग में उन्होंने नारी जाति को पति सेवा का उपदेश करते हुए स्पष्ट कह दिया कि स्त्रियों को स्वपतियों से ही स्वकर्त्तव्यों की शिक्षा लेनी चाहिए। यत्र तत्र ढोंगी गुरुओं और पाखण्डी साधुओं के दर्शनार्थ भटकने को उन्होंने अत्यन्त अनुचित बताया। भारतीय नारी के विलुप्त गौरव को पुनः प्रतिष्ठित करने के लिए महर्षि सदा सचेष्ट रहते थे।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

328

बाह्य आडम्बर धर्म का भाग नहीं हो सकते

“एक दिन वे क्षौर करा रहे थे, तो एक ब्राह्मण ने आकर व्यंग्यभाव से कहा ‘संन्यासियों का धर्म त्याग है। आप शरीर संस्कार में क्यों लगे हैं?’ स्वामीजी ने सहज भाव से उत्तर किया, ‘यदि बाल बढ़ाना ही त्याग का चिन्ह है, तब तो रीछ को सबसे बड़ा त्यागी मानना पड़ेगा।’ उत्तर तो हो गया। परन्तु इसके पश्चात् उन्होंने प्रश्नकर्ता को प्रबोध देते हुए कहा कि शरीर ही धर्म का प्रमुख साधन है।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

329

सच्चे संन्यास धर्म के निर्वाह की पराकाष्ठा व्यक्तिगत भेंट पूजा में 
एक पैसा भी स्वीकार नहीं दयानन्द को

“इस स्थिति में धन की आवश्यकता को अनुभव करते हुए भी महर्षि जो कुछ धन सहायता रूप में स्वीकार करते थे, वह न्याय तथा औचित्य की सीमा में होता था। इसके विपरीत, व्यक्तिगत भेंट पूजा के रूप में एक पैसा भी वे स्वीकार नहीं करते थे। इसीलिए बड़ौदा राज्य के दीवान सर माधवराव ने विदाई के समय स्वगृह पर आमन्त्रित कर उन्हें एक सहस्त्र रूपये भेंट करने चाहे, तो महाराज ने उसे अस्वीकार करते हुए कहा कि हम वल्लभाचार्य मत के गुसाइयों की भाँति धर्म की बिक्री नहीं करते।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

330

सरल बात से सीधा उपदेश - साथ ही व्यर्थ की परम्पराओं का खण्डन

“एक दिन मथुरा के चतुर्वेदी उपाधिवाले चौबेजी ‘जयराधा-कृष्ण’ का घोष करते हुए महर्षि की सेवा में उपस्थित हुए। वे अपने साथ ब्रज की मिट्टी भी लाये थे। उन्होंने उस मृत्तिका का स्वल्पांश महर्षि को भेंटस्वरूप देना चाहा। महर्षि ने जिज्ञासा करते हुए पूछा कि यह कैसी मिट्टी है? इस पर चौबेजी गर्वपूर्वक बोले कि इसी मिट्टी को कृष्णजी ने बचपन में खाया। स्वामीजी ने विदग्धतापूर्वक उत्तर देते हुए कहा-‘खाई होगी, बच्चे तो मिट्टी खाया ही करते हैं। इसका यह अर्थ नहीं कि हम खायें।’ महर्षि के इस कथन से चौबेजी हतप्रभ हो गये।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

331

अंधविश्वास को हराने के लिए विज्ञान का सहारा

“इसी दृष्टि से उन्होंने एक दिन दर्शकों को एक विचित्र प्रयोग दिखाकर भूत-प्रेतादि की मिथ्या धारणाओं का खण्डन किया। एक कमरे के दोनों ओर के दो ताकों में दीपक जलवाकर रख दिये गये। स्वामीजी ने पहले एक ताक का दीपक बुझा दिया, फिर दूसरे का भी बुझा दिया। जब दूसरे ताक पर रखा दीपक बुझ गया तो पहले ताक का दीपक स्वयमेव जल उठा और जब प्रथम को बुझाया गया तो दूसरे ताक का दीपक जलने लगा। यह आश्चर्ययुक्त प्रयोग दिखाकर स्वामीजी ने बताया कि पदार्थविद्या के नाना रहस्यों को न समझकर हम भूत-प्रेतों की मिथ्या कल्पना कर बैठते हैं। इसी प्रसंग में उन्होंने अनेक मानसिक तथा काम सम्बन्धित जटिलताओं से उत्पन्न उन्मादादि रोगों को प्रेत बाधा समझ लेने का खण्डन किया।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-1)

332

उनका हर पल उपदेश ही था। हर वाक्य, हर हास्य, हर व्यवहार जो समझे, जीवन बदल लिया, जो न समझ सके उन्होंने रास्ता बदल लिया -

“महर्षि उस समय भोजन से निवृत्त हुए ही थे। अब वे एक पका तरबूज काटकर सब उपस्थित लोगों में वितीर्ण करने लगे। जब चक्रांकित वैष्णव को तरबूज देने लगे, तो उसने कहा कि बिना तुलसी पत्र का प्रसाद ग्रहण किये वे कोई वस्तु नहीं खाते। इस पर महर्षि ने विनोद भाव से कहा कि तुम्हारा बकरी का स्वभाव नहीं जाता। जब वैष्णव ने तुलसी पत्र की आयुर्वेद सिद्ध उपयोगिता का उल्लेख किया, तो महर्षि ने इसे स्वीकार करते हुए कहा कि निश्चय ही तुलसी के पत्ते ज्वरादि में लाभदायक होते हैं, परन्तु सब समय उन्हें चबाते रहना निरी पशुता है। साधारण-सी बात को भी बुद्धि तथा विचार की कसौटी पर कसना दयानन्द की सहज जीवन मीमांसा थी।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-2)

333

कठिन बात को सरलता से समझाना

“आकाश भी व्यापक है और ब्रह्म भी। दो व्यापक किस प्रकार इकट्ठे रह सकते हैं? मुझसे इसका कुछ उत्तर न बन पाया। मैंने यही प्रश्न स्वामीजी से पूछा। उन्होंने एक पत्थर उठाकर कहा कि इसमें अग्नि व्यापक है या नहीं? मैंने कहा कि व्यापक है। फिर पूछा कि मिट्टी? मैंने कहा कि व्यापक है। फिर पूछा कि जल? मैंने कहा कि व्यापक है। फिर पूछा कि आकाश और वायु? मैंने कहा कि व्यापक है। फिर पूछा कि परमात्मा? मैंने कहा कि वह भी व्यापक है। कहा कि देखा, कितनी चीजें हैं, किन्तु सभी इसमें व्यापक हैं। वास्तव में बात यह है कि जो जिससे सूक्ष्म होती है वह उसमें व्यापक हो सकती है। ब्रह्म चूँकि सबसे अति सूक्ष्म है, इसलिए वह सर्वव्यापक है। जिससे मेरी शान्ति हो गई।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-2)

334

सभी से मधुर सम्बन्ध थे दयानन्द के

“सभी प्रकार की साम्प्रदायिक कट्टरता से महर्षि दयानन्द ऊपर उठे हुए थे। इसका एक रोचक उदाहरण अजमेर में उस समय देखने को मिला जबकि उनकी उपस्थिति में ख्वाजा साहब की दरगाह के दीवान के चाचा मीर शफीहुसैन तथा गवर्नमेंट कॉलेज, अजमेर के हैड पण्डित शालिग्राम शास्त्री किसी वादविवाद में उलझ गये। जब महर्षि ने अनुभव किया कि वादी और प्रतिवादी दोनों साम्प्रदायिक आवेश के वशीभूत हो गये हैं तो उन्होंने हँसते हुए मीरसाहब से कहा, यदि आप गलत बात कहेंगे तो आपकी दाढ़ी पकड़ी जाएगी। पुनः शास्त्रीजी की ओर अभिमुख होकर बोले और आपकी चोटी पकड़कर आपकी गलतबयानी को स्वीकार कराया जाएगा। और मैं तो संन्यासी हूँ। मैं दाढ़ी और चोटी के विवाद से उपर उठकर सत्य और न्याय की ही बात कहूँगा।”
 
- (नव जागरण के पुरोधा भाग-2)

335

छुआछूत कैसी भी मंजूर नहीं

“हिन्दुओं में उस समय दाढ़ी रखने का आम रिवाज नहीं था। जब आगन्तुक ने महाराज के डेरे पर पीने के लिए पानी माँगा तो महर्षि के एक गुजराती शिष्य ने उसे मुसलमान समझकर दोने में पानी दिया। जब वह चला गया तब महर्षि ने अपने इस शिष्य को फटकारा और कहा कि उसने इस संभ्रान्त पुरुष को गिलास में जल क्यों नहीं दिया। उत्तर में जब शिष्य ने यह कहा कि भला, मैं एक मुसलमान को धातु के पात्र में पानी क्यों पिलाता, तो महर्षि ने कहा कि प्रथम तो उक्त व्यक्ति बंगीय हिन्दू था, मुसलमान नहीं था। परन्तु मुझसे मिलने तो ईसाई, मुसलमान आदि सभी आते हैं। अतः बिना किसी भेद-भाव के, सभी का समानरूप से गिलास में जल देकर सत्कार करना चाहिए।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-2)

336

जैसी घटना-वैसा उपदेश

“एक दिन दानविषयक किसी ऐसी ही पुस्तक का प्रसंग उधृत कर महर्षि ने महाराणा को बताया कि इस ग्रन्थ के अनुसार यदि किसी ब्राह्मण को एक जोड़ा जूता दान किया जावे तो दाता को सम्पूर्ण पृथ्वी दान कर देने के तुल्य फल प्राप्त होगा। इस प्रकार की अतिरंजनापूर्ण उक्तियों को मिथ्या बताते हुए महाराज ने कहा कि यदि बात सत्य है तब तो आपको अपने राज्य के ब्राह्मणों को प्रदत्त सहस्रों रूपयों की जागीर उनसे लेकर बदले में उन्हें एक जोड़ी जूता दे देना चाहिए। इससे भी उन्हें समस्त भूमिदान के पुण्य की अनायास प्राप्ति हो जाएगी।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-2)

337

नाम जाप से नहीं गुणों के धारण करने से ही कल्याण

“उन्हीं दिनों रामस्नेही सम्प्रदाय का ‘फूल डोल’ नामक बृहत् सम्मेलन शाहपुरा में सम्पन्न हुआ। इसमें भाग लेने के लिये ब्यावर के अनेक वैश्यगण आये थे। वार्तालाप के प्रसंग में महर्षि ने उनसे पूछा कि केवल ‘राम’ नाम जप से क्या लाभ होता है? सम्प्रदायनिष्ठ वैश्यों ने उत्तर दिया, ‘नाम के पीछे जैसे नामी का ज्ञान होता है, उसी प्रकार ‘राम’ नाम के निरन्तर जप से उसके वाच्य परमात्मा को जानना कठिन नहीं है।’ महर्षि ने इस पर आपत्ति करते हुए कहा कि जिस प्रकार लड्डू लड्डू कहने मात्र से लड्डू की उपलब्धि नहीं होती, उसी प्रकार ईश्वर का केवल नामोच्चारण पर्याप्त नहीं है। अपितु नाम स्मरण के साथ-साथ परमात्मा के नाम से सम्बद्ध अर्थ की भावना करते हुए योगमार्ग से उसे प्राप्त करने के लिये सचेष्ट भी होना चाहिए।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-2)

338

उदयपुर (राजस्थान) में प्रवास के समय महर्षि की दिनचर्या

“वे प्रातः काल बहुत जल्दी उठकर गोवर्धनविलास पर्वतक भ्रमणार्थ चले जाते। पुनः लौटकर उद्यान स्थित चबूतरे की चौकी पर दीर्घकाल तक परमतत्त्व का ध्यान करते। इस प्रकार उपासना, ध्यान एवं समाधि से निवृत्त होकर वे ब्राह्मी बूटी युक्त दुग्ध का सेवन करते। इसके पश्चात् वेदभाष्य लेखन का कार्य आरम्भ हो जाता। मध्याह्न में भोजन आदि से निवृत्त होकर पत्रव्यवहार तथा प्रूफ शोधन का कार्य देखते। मध्याहोन्तर चार बजे सत्संगी लोगों का आगमन होने लगता। रात्रि होने तक जिज्ञासु लोगों की शंकाओं का समाधान तथा प्रश्नोत्तर का कार्यकम चलता। स्वयं महाराणा भी श्रोतृमण्डली में बैठकर महाराज के उपदेशामृत का पान करते।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग - २)

339

शाहपुरा (राजस्थान) में प्रवास के समय महर्षि की दिनचर्या

“शाहपुरा में भी महर्षि की दिनचर्या सर्वथा नियमित रही। मध्याह्न पर्यन्त वे वेदभाष्य लेखन में लगे रहते। तत्पश्चात् भोजन करते और केवल १४.१५ मिनट के लिये विश्राम करते। निद्रा इतनी वशवर्तिनी थी कि विश्राम का नियत समय समाप्त होते ही वे उठ जाते और मुख, हाथ धोकर पुनः कार्यमग्न हो जाते। जितेन्द्रिय योगी-जनों की भाँति उन्हें निद्रा वृत्ति पर पूर्ण वशीकारत्व प्राप्त था। वेदभाष्य लेखन के सुगम्भीर तथा परिश्रमसाध्य कार्य में रत रहते हुए भी वे जिज्ञासुओं के प्रश्नों का उत्तर देने को सदा तत्पर रहते।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग - २)

340

बम्बई में प्रवास के समय महर्षि की दिनचर्या

“बम्बई में महर्षि की दिनचर्या पर्याप्त व्यस्त रहती थी। वे प्रातःकालीन दैनन्दिन कार्यों से निवृत्त होकर लेखन कार्य में व्यस्त हो जाते। सायंकाल चार बजे से दस बजे तक आगन्तुकों से वार्तालाप, शास्त्रचर्चा, व्याख्यान, शंका समाधान आदि का कार्यकम चलता। रात्रि को दस बजे वे सो जाते। निद्रा-वृत्ति इतनी वशवर्तिनी थी कि शय्या पर जाते ही सो जाते। जिस दिन कोई महत्त्वपूर्ण शास्त्रार्थ करना होता, उस दिन तीन बजे उठ पड़ते और शौच, स्नान से निवृत्त होकर दीर्घकाल तक ध्यानावस्थित हो, परमात्मा का चिन्तन करते। सामान्य दिनों की अपेक्षा इस दिन ध्यान की अवधि बढ़ जाती”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग-१)

341
भाव अभिव्यक्ति

“वेदोद्वार का जो महत्तम कार्य स्वामी दयानन्द ने किया वह पूर्वकाल के कुमारिल और शंकर के काम से कहीं अधिक क्लिष्ट और दुरुह था। इन दोनों आचार्यों ने जिन चारवाक, जैन और बौद्ध मतों का खण्डन किया वे मूलतः वैदिक और भारतीय थे। स्वामी दयानन्द के काल में पूर्वोक्त अवैदिक मतों के अतिरिक्त कुकुरमुत्तों की भाँति अनेक मत-मतान्तर उत्पन्न हो गये थे, जो अपने को वैदिक मतानुयायी कहते हुए भी वास्तव में अवैदिक थे। स्वयं शंकराचार्य द्वारा प्रवर्तित अद्वैतवाद भी उन्हीं में से एक था।”

- (स्वामी विद्यानन्द सरस्वती)

342

महर्षि दयानन्द और आर्यसमाज के सम्बन्ध में 
महाराज सर प्रताप की विचारधारा

“देशी राज्यों की ओर उनका विशेष ध्यान था। वे कहा करते थे कि एक मनुष्य को सुधारने से सिर्फ एक मनुष्य ही सुधरता है, परन्तु एक राजा को सुधारने से हजारों, लाखों मनुष्यों का कल्याण हो जाता है। महर्षि को राजपुताने से बहुत आशाएँ थीं। इसी कारण से अपने जीवन के अन्तिम वर्ष उन्होंने राजपुताना में लगाये।”

- (नव जागरण के पुरोधा भाग - २) 
आर्य मार्तण्ड, २७ अक्तूबर, १९४० में प्रकाशित

343

हर पल दयानन्द मार्गदर्शक दिखेंगे

“जिस क्षण देह में दुर्बलता प्रतीत हो, उसी क्षण एक महान् विशालकाय संन्यासी का स्मरण करो। जिस क्षण तुम्हारे मन में शिथिलता या कायरता का प्रवेश हो, उसी क्षण जीवन और उत्साह से ओतप्रोत उस देशभक्त का स्मरण करो। जिस क्षण तुम्हारे हृदय में मोह और विलास का साम्राज्य प्रवर्तित हो, उसी क्षण धन को ठोकर मारने वाले उस नैष्ठिक ब्रह्मचारी की ओर दृष्टिपात करो। अपमान से आहत होकर जिस क्षण तुम नजर ऊची न उठा सको, उसी क्षण हिमालय के समान अडिग और उन्नत व्यक्ति के ओजस्वी मुख को अपनी कल्पना में उपस्थित करो। मृत्यु वरण करते हुए डर लगे तो इस निर्भयता की मूर्ति का ध्यान करो। द्वेष भाव से उत्तप्त होकर जब तुम्हें अपने विरोधी को क्षमा करने में हिचकिचाहट हो, तो रागद्वेष विमुक्त संन्यासी को याद करो। यह गौरवशाली पुरुष भारतीय महापुरुषों में अग्रस्थान पर विराजमान स्वामी दयानन्द है।”

- रमणलाल वसन्तलाल देसाई
- (नव जागरण के पुरोधा भाग-१)

344

वेदवादी दयानन्द

मैंने गंगा के किनारे उस साधु (दयानन्द) से भेंट की जिसकी विद्वत्ता तथा पवित्राचरण के विषय में मैंने बाजारों में सुना था। वह मात्र कौपीन धारण किये (नग्नप्राय) था। वार्तालाप से उसकी उच्च मानसिक स्थिति तथा हिन्दुओं के शास्त्रीय साहित्य पर उसके अधिकार का ज्ञान हुआ। वह केवल संस्कृत बोलता था तथा वेदान्ती (वेदवादी) था। अतः हमारा वार्तालाप एक दुभाषिए द्वारा ही हुआ।

- रेवरेण्ड डॉ. टी.जे. (टामस जेफरसन) स्कॉट
- (नव जागरण के पुरोधा भाग-१)

345
भाव स्मरण

“जाके जीह जोर तें प्रपंच फिलासफिन को भारत सो समस्त आर्य मण्डल में मान्यो मैं। वेद के विरुद्धी मत-मत के कुबुद्धी मन्द, भद्र मंद्र आदिन पै सिंह अनुमान्यो मैं। ज्ञता खट ग्रन्थन को वेद को प्रणेता जेता, आर्य विद्या अर्कहू को अस्ताचल जान्यो मैं। स्वामी दयानन्द जू के विष्णुपद प्राप्त हू तें, 
पारिजात को सो आज पतन प्रमान्यो मैं॥

अर्थ- जिनकी ओजस्विनी वाणी ने भारतदेश में समस्त दर्शनों की व्याख्या कर उनके रहस्यों को प्रकाशित किया, जो वेदविरुद्ध दुष्ट बुद्धि रखने वाले विभिन्न मत-सम्प्रदाय रूपी हाथियों ('भद्र, मंद्र' हाथियों की विशिष्ट श्रेणी) के दलन में सिंह तुल्य था, जो षट् शास्त्रों (सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, वेदान्त तथा मीमांसा) का ज्ञाता तथा वेदभाष्य का रचयिता था, उस आर्य विद्याओं के प्रकाशक दयानन्द का परलोक प्रस्थान ज्ञानरूपी सूर्य का अस्ताचल की ओर जाना था। वस्तुतः महर्षि दयानन्द का ब्रह्मलोकगमन स्वर्ग के पारिजातरूपी दिव्य वृक्ष का पतन माना जाएगा।"

- महाराणा सज्जनसिंह, उदयपुर

346

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के मुख्य शिष्य एवं प्रेरणा प्राप्त महान व्यक्तित्व



स्वामी श्रद्धानन्द

महात्मा हंसराज

श्याम जी कृष्ण वर्मा

पं- गुरुदत्त विद्यार्थी

लाला लाजपत राय

पं-लेखराम

मुंशी प्रेमचन्द

शिवकर बापू तलपडे

राम प्रसाद बिस्मिल

शहीद भगत सिंह

एवं उनके दादा जी

सरदार अर्जुन सिंह

भाई बालमुकुंद

भाई परमानन्द

ठाकुर रोशन सिंह

करतार सिंह सराभा

वीर सावरकर

राजगुरु

सुखदेव

मदन लाल ढींगरा

राजा महेंद्र प्रताप सिंह

बटुकेश्वर दत्त

गणेश शंकर विद्यार्थी

सरदार स्वर्ण सिंह

विष्णु गणेश पिंगले

इत्यादि लाखों राष्ट्रभक्त एवं अमर बलिदानी


347

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के प्रमुख कार्य



• स्वराज्य एवं स्वदेशी की प्रथम उ‌द्घोषणा

• 1875 में मुम्बई में आर्यसमाज की स्थापना 

• वेदों का सही भाष्य करना

• सत्यार्थ प्रकाश की रचना

• लाखों क्रान्तिकारियों को देशभक्ति की प्रेरणा देना

• बाल विवाह का विरोध करना

• विधवा विवाह को प्रचलित करवाना

• नमस्ते का अभिवादन देना

• प्रथम गौशाला का निर्माण कराना

• प्रथम अनाथालय की स्थापना कराना

• गुरुकुल शिक्षा का पुनरुद्धार कराना

• स्त्री को शिक्षा और सम्मान दिलवाना

• हिन्दी भाषा को राष्ट्र भाषा घोषित करना

• छुआछूत, ऊंच-नीच का भेदभाव मिटाना

• जातिविहीन समाज की स्थापना करना

• भारत एवं भारतवासियों के सोए हुए स्वाभिमान को जागृत करना

• भारत भारतीयो का है।


348

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी द्वारा लिखित प्रमुख ग्रंथों की सूचि

सत्यार्थ प्रकाश : सत्य और असत्य को जानने का प्रमाणित निर्णायक अमर ग्रंथ

ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका : व्यक्ति, परिवार, समाज, राजा-प्रजा, धर्म और वैदिक ज्ञान-विज्ञान एवं ग्रंथों के पठन पाठन की विधि

पंचमहायज्ञविधि : प्रत्येक मनुष्य के लिए अनिवार्य एवं पाँच करणीय प्रमुख कर्तव्य

संस्कारविधि : मानव कल्याण हेतु जन्म से लेकर मृत्यु तक 16 संस्कारों का विधि-विधान

आर्याभिविनय : ईश्वर का सत्य स्वरूप, भक्ति, प्रार्थना, धर्म, निष्ठा और व्यवहार शुद्धि के लिए अनुकरणीय ग्रंथ

व्यवहार भानु : धर्म युक्त आचरण एवं व्यवहार की शिक्षा

स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश : मानव कल्याण के लिए अत्यंत करणीय तथा अकरणीय तथ्यों की कुंजी

आर्यो‌द्देश्यरत्नमा : मानव मात्र के लिए जानने और मानने योग्य 51 अमृत बिंदु

गोकरुणानिधि : गोसेवा, संरक्षण, संवर्धन तथा गौकृषि आधारित आर्थिक एवं परोपकार के प्रमाणित मूल्यांकन को सिद्ध करने वाला ग्रंथ

349

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के स्मृति स्थल



1. महर्षि दयानन्द जन्मस्थली, टंकारा, गुजरात
2. महर्षि दयानन्द बोध स्थली, टंकारा का शिव मंदिर, गुजरात
3. गुरू विरजानन्द कुटी, मथुरा
4. पाखण्ड खंडिनी पताका स्थल, हरिद्वार
5. देश में फैली दरिद्रता के दर्शन, प्रयागराज
6. विश्व की प्रथम गौशाला, रेवाड़ी
7. काशी शास्त्रार्थ स्थली, बनारसे
8. प्रथम आर्य समाज, मुम्बई
9. आर्य अनाथालय, फिरोजपुर
10. संस्कृत एवं वेद पाठशाला, फर्रुखाबाद
11. कासगंज शास्त्रार्थ स्थली
12. ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका लेखन स्थली, अयोध्या
13. नवलखा महल, उदयपुर सत्यार्थ प्रकाश लेखन स्थली
14. वैदिक यन्त्रालय, अजमेर
15. फैजुल्ला खां की कोठी, जोधपुर जहाँ विष दिया गया
16. भिनाय की कोठी, अजमेर
17. मलूसर शमशान भूमि, अजमेर
18. ऋषि उद्यान, अजमेर जहाँ अस्थियां बिखेरी गई


350

महर्षि दयानन्द सरस्वती की देश व्यापी यात्रा का वर्णन

टंकारा 12 फरवरी 1824 जन्म से लेकर 30 अक्टूबर 1883 तक



कोटगंगारा 1846  1846
सिद्धपुर 1846  1846
अहमदाबाद 1846  1846
बड़ौदा 1846  1847
चाणोद कन्याली 1847  1847
व्यासाश्रम 1847  1848
सीनूर 1848  1849
चाणोद 1849  1850
अहमदाबाद 1850  1851
आबू 1852  1854
हरिद्वार 1855  1855
ऋषिकेश 1855  1855
टिहरी 1855  1855
श्रीनगर 1855  1855
केदारघाट 1855  1855
रुद्रप्रयाग 1855  1855
अगस्त्य मुनि 1855  1855
शिवपुरी 1855  1855
गुप्त काशी 1855  1855
त्रियुगी नारायण 1855  1855
गौरी कुंड 1855  1855
भीम गुफा 1855  1855
तुंगनाथ शिखर 1855  1855
ओखी मठ 1855  1855
जोशीमठ 1855  1855
बद्रीनारायण 1855  1855
वसुधारा 1855  1855
माना ग्राम 1855  1855
चिल्किया पाटी 1855  1855
रामपुर 1855  1855
काशीपुर 1855  1856
द्रोण सागर 1856  1856
मुरादाबाद 1856  1856
संभल 1856  1856
गढ़मुक्तेश्वर 1856  1856
फरूखाबाद 1856  1856
कानपुर 1856  1856
इलाहाबाद 1856  1856
मिर्जापुर 1856  1856
विध्याचल 1856  1856
बनारस 1856  1856
चुनार 1856  1857
नर्मदा तट 1857  1859
हाथरस 1860  1860
मुरसान 1860  1860
मथुरा 1860  1863
आगरा 1863  1864
ग्वालियर 1865  1865
करावली 1865  1865
कुशलगढ़ (गंगापुर) 1865  1865
जयपुर 1865  1866
बागडू 1866  1866
बागडू 1866  1866
दूदू 1866  1866
मथुरा 1866  1866
किशनगढ़ 1866  1866
अजमेर 1866  1866
अजमेर 1866  1866
पुष्कर 1866  1866
आगरा 1866  1866
हरिद्वार 1867  1867
कनखल 1867  1867
लंढौरा 1867  1867
गढ़मुक्तेश्वर 1867  1867
मुहम्मदपुर देवमल (बिजनौर) 1867  1867
परीक्षितगढ़ 1867  1867
कर्णवास (तीन बार) 1867  1867
मिर्जापुर 1867  1867
अनूपशहर 1867  1867
चासी 1867  1867
ताहरपुर 1867  1867
रामघाट 1867  1867
अहर 1867  1867
वेलौन 1867  1867
कर्णवास 1868  1868
गढ़ियाघाट 1868  1868
अंवागढ़ (सोते) 1868  1868
सोरों 1868  1868

351

सारडोल 1868  1868
शहवाजपुर 1868  1868
कादर गंज 1868  1868
नरदौली 1868  1868
काकोदर 1868  1868
कायम गंज 1868  1868
कम्पिल 1868  1868
शकरुल्ला पुर 1868  1868
श्रृंगीरामपुर 1869  1869
जलालाबाद 1869  1869
कन्नौज 1869  1869
विदूर 1869  1869
मदारपुर 1869  1869
कानपुर 1869  1869
रामनगर 1869  1869
बनारस 1869  1869
मिर्जापुर 1869  1870
इलाहाबाद 1870  1870
मिर्जापुर 1870  1870
बनारस 1870  1870
सोरों 1870  1870
कासगंज 1870  1870
बलराम 1870  1870
चकेरी 1870  1870
हनोत 1870  1870
अनूप शहर 1870  1870
जलेसर 1870  1871
रामघाट 1871  1871
फर्रुखाबाद 1871  1872
बनारस 1872  1872
मुगल सराय 1872  1872
डुमराओं 1872  1872
आरद 1872  1872
पटना 1872  1872
मुंगेर 1872  1872
भागलपुर 1872  1872
कलकत्ता 1872  1873
हुगली 1872  1873
वर्धवान 1873  1873
भागलपुर 1873  1873
पटना 1873  1873
छपरा 1873  1873
आरा 1873  1873
डुमराऊ 1873  1873
मिर्जापुर 1873  1873
इलाहाबाद 1873  1873
कानपुर 1873  1873
लखनऊ 1873  1873
फर्रुखाबाद 1873  1873
कासगंज 1873  1873
जलेसर 1873  1873
अलीगढ 1873  1874
हाथरस 1874  1874
वृन्दावन 1874  1874
मथुरा 1874  1874
मुरसान 1874  1874
इलाहाबाद 1874  1874
बनारस 1874  1874
इलाहाबाद 1874  1874
जबलपुर 1874  1874
नासिक 1874  1874
बम्बई 1874  1874
सूरत 1874  1874
भड़ौच 1874  1874
अहमदाबाद 1874  1874
नडियाड 1874  1874
राजकोट 1874  1875
वाधवान 1875  1875
अहमदाबाद 1875  1875
बम्बई 1875  1875
पूना 1875  1875
सतारा 1875  1875
पूना 1875  1875
बम्बई 1875  1875
बड़ौदा 1875  1876
अहमदाबाद 1876  1876
भड़ौच 1876  1876
सूरत 1876  1876
बलसाड 1876  1876
वसीन रोड 1876  1876
बम्बई 1876  1876
इन्दौर 1876  1876
फर्रुखाबाद 1876  1876
बनारस 1876  1876
जौनपुर 1876  1876
अयोध्या 1876  1876
लखनऊ 1876  1876
शाहजहापुर 1876  1876
बरेली 1876  1876
मुरादाबाद 1876  1876
कर्णवास 1876  1876
जलेसर 1876  1876
अलीगढ़ 1876  1876
दिल्ली 1876  1877
मेरठ 1877  1877
सहारनपुर 1877  1877
शाहजहाँपुर 1877  1877
चांदापुर 1877  1877
सहारनपुर 1877  1877

352

लुधियाना 1877  1877
लाहौर 1877  1877
अमृतसर 1877  1877
गुरदासपुर 1877  1877
अमृतसर 1877  1877
जालन्धर 1877  1877
लाहौर 1877  1877
रावलपिंडी 1877  1877
झेलम 1877  1878
गुजरात 1878  1878
वजीराबाद 1878  1878
गुजरांवाला 1878  1878
लाहौर 1878  1878
मुलतान 1878  1878
लाहौर 1878  1878
अमृतसर 1878  1878
जालन्धर 1878  1878
लुधियाना 1878  1878
रुड़की 1878  1878
अलीगढ 1878  1878
मेरठ 1878  1878
दिल्ली 1878  1878
अजमेर 1878  1878
पुष्कर 1878  1878
अजमेर 1878  1878
मसूदा 1878  1878
नसीराबाद छावनी 1878  1878
जयपुर 1878  1878
रिवाड़ी 1878  1879
दिल्ली 1879  1879
मेरठ 1879  1879
सहारनपुर 1879  1879
रुड़की 1879  1879
ज्वालापुर 1879  1879
हरिद्वार 1879  1879
देहरादून 1879  1879
सहारनपुर 1879  1879
मेरठ 1879  1879
अलीगढ़ 1879  1879
छलेसर 1879  1879
मुरादाबाद 1879  1879
बदायू 1879  1879
बरेली 1879  1879
शाहजहांपुर 1879  1879
लखनऊ 1879  1879
कानपुर 1879  1879
फर्रुखाबाद 1879  1879
कानपुर 1879  1879
इलाहाबाद 1879  1879
मिर्जापुर 1879  1879
दानापुर 1879  1879
बनारस 1879  1880
लखनऊ 1880  1880
फर्रुखाबाद 1880  1880
मैनपुरी 1880  1880
भारोल 1880  1880
मेरठ 1880  1880
मुजफ्फरनगर 1880  1880
मेरठ 1880  1880
देहरादून 1880  1880
मेरठ 1880  1880
आगरा 1880  1881
भरतपुर 1881  1881
जयपुर 1881  1881
अजमेर 1881  1881
नसीराबाद छावनी 1881  1881
मसूदा 1881  1881
ब्यावर 1881  1881 
हरिपुर स्टेट 1881  1881
रामपुर 1881  1881
व्यावर 1881  1881
मसूदा 1881  1881
हर्दा 1881  1881
रूपाहेली 1881  1881
रटेरा 1881  1881
बनेड़ा 1881  1881
चित्तौड़गढ़ 1881  1881
इन्दौर 1881  1881
बम्बई 1881  1882
खंडवा 1881  1882
इन्दौर 1882  1882
रतलाम 1882  1882
जवारा 1882  1882
चित्तौढ 1882  1882
निम्बहड़ा 1882  1882
उदयपुर 1882  1883
निम्बहड़ा 1883  1883
चित्तौड़ 1883  1883
रूपाहेली 1883  1883
शाहपुरा 1883  1883
अजमेर 1883  1883
पाली 1883  1883
रोपट 1883  1883
जोधपुर 1883  1883
रोपट 1883  1883
पाली 1883  1883
आबू 1883  1883
अजमेर 1883  1883


353

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के वास्तविक उपलब्ध चित्र
354

अनुक्रमणिका 



1. वेद पढ़ने का सबका अधिकार
2. 'स्वदेशी' राज्य सर्वोपरि और उत्तम
3. 'स्वदेशी' और स्वराज्य
4. मनुष्य सबसे विद्या ग्रहण करे
5. मानव देह ही सबसे उत्तम है
6. विवाह में जन्म कुंडली मिलाना हानिकारक
7. जन्मपत्री/कुण्डली अनुचित है
8. विवाह करने का निमय
9. कन्या का विवाह कहां करे?
10. विवाह के लिए लड़का-लड़की की प्रसन्नता आवश्यक
11. सबसे उत्तम आश्रम कौन सा?
12. गृहस्थों के लिए उपदेश
13. पैसे का सदुपयोग किसमें
14. गृहस्थी कभी निराश न हों
15. गृहस्थ कैसे सफल हों?
16. पति पत्नी को दुःख कब होता है?
17. समान गोत्र में विवाह करना उचित नहीं?
18. बाल विवाह का प्रबल विरोध
19. स्त्री-पुरुष विवाह किससे और कैसे करें?
20. बालविवाह से हानि
21. विवाह में स्त्री की पसन्द सर्वोपरी
22. जन्मपत्री का कोई आधार नहीं है
23. जन्मपत्री है या शोकपत्री 
24. एक विवाह करना ही उत्तम
25. विधवा विवाह का समर्थन एवं बहुपत्नी का विरोध
26. पुनर्विवाह क्या स्त्री भी करे?
27. पर्दा प्रथा के सर्वथा विरोधी दयानन्द
28. स्त्री सम्मान से कल्याण
29. यज्ञ क्या है?
30. पर्यावरण शुद्धि हेतु यज्ञ
31. पर्यावरण शुद्धि हेतु यज्ञ का विज्ञान….
32. यज्ञ से वर्षा होने के विज्ञान
33. बलिप्रथा के निवारण हेतु राजा से निवेदन
34. समुद्र व अन्तरिक्षय वायुयान निर्माण प्रेरणा
35. समुद्र यात्रा के निषेध का खंडन
36. अन्त्येष्टि कर्म
37. देश का राजा कैसा हो?
38. महर्षि की दो टूक
39. नवीन विज्ञान मनुष्य का धर्म
40. अंग्रेजी शासन में लोकतन्त्र का उदघोष-
41. अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार से स्वदेश की उन्नति
42. पशु धन के द्वारा राज्य की उन्नति
43. भारत में पशु गणना सर्वप्रथम
44. गौरक्षा अभियान के जनक दयानन्द
45. कृषि और किसानों का देश की उन्नति में महत्व
46. निर्यातकों की रक्षा करना राजा का कर्तव्य 
47. निर्यातक देश-देशन्तर की भाषा सीखकर
48. सरकार कर (टैक्स) व्यवस्था
49. राजा (सरकार) के लिए गुप्तचरी आवश्यक
50. राजा शत्रु पर विजय कैसे प्राप्त करे?
51. राजा डाकुओं से कैसे बचाए प्रजा को ?
52. राष्ट्र की उन्नति के लिए अर्थ संग्रह
53. ब्रिटिश सरकार द्वारा लगाये नमक कर का विरोध
54. प्राचीन राष्ट्रीय गौरव को बताते महर्षि
55. सब भाषाओं की जननी संस्कृत
56. एक भाषा हिन्दी के प्रबल समर्थक दयानन्द
57. स्वभाषा का विदेश में प्रचार के विषय में
58. हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए प्रयासरत दयानन्द -
59. न्याय हर किसी के लिए होना चाहिए
60. महर्षि द्वारा देश प्रेम की शिक्षा
61. शासन में एकाधिकार (तानाशाही) घातक
62. महाभियोग की व्यवस्था
63. आर्यावर्त की (भारत की प्राचीन सीमा)
64. विदेशियों के राज्य के कारण दुःखी दयानन्द
65. विश्वगुरु भारत क्यों?
66. भाग्य बड़ा या कर्म
67. दुख का मूल पाप
68. तीथों में पाप-पुण्य किसी का नहीं छूटता
69. कर्मशीलता ही मनुष्यत्व
70. कर्म फल व्यवस्था अमिट है

71. आत्महत्या पापों से मुक्ति का समाधान नहीं
72. ज्ञान का महत्व आयु का नहीं
73. वासना पर नियन्त्रण
74. वासना कैसे मिटेगी
75. क्या खाने योग्य है, क्या नहीं?
76. मांसाहार का विरोध
77. मनुष्य की आदर्श दिनचर्या
78. व्यायाम की शिक्षा
79. सत्य-असत्य के निर्णय के लिए क्या करना चाहिए?
80. आर्यवर्त देश का नाम
81. स्त्री शिक्षा के प्रबल समर्थक दयानन्द
82. माता-पिता-आचार्य की महिमा
83. सन्तानों में उत्तम संस्कारों हेतु
84. कन्या शिक्षा अनिवार्य
85. स्त्रियों को शिक्षा का अधिकार
86. सन्तान को अशिक्षित रखने वाले
87. गर्भपात-महापाप
88. माता-पिता और अध्यापक का बालक से व्यवहार
89. क्या सन्तानों का ताड़न (फटकारना) जरूरी है?
90. माता-पिता आदि का सन्तानों के प्रति धर्म
91. सबको एक समान शिक्षा के समर्थक दयानन्द
92. पुत्रों के समान ही कन्याओं की शिक्षा
93. कन्याओं को यज्ञोपवीत पहनने का अधिकार
94. अन्य दशवासियों से सम्बन्ध के पक्षधर महर्षि
95. कौशल विकास-शिल्प कला सीखने के प्रति प्रतिबद्ध दयानन्द
96. स्किल (कौशल) विकास देश की उन्नति का साधन
97. विधवाओं की अवस्था को देख दयानन्द बहुत दुखी थे
98. श्राद्ध वास्तविकता में क्या है?@
99. अधिकारियों (आफिसरों) पर सीधी नजर रखें
100. कर्मचारियों को पुरस्कार और दण्ड का निर्देश
101. राज्य के अधिकारियों में कार्य वितरण के आधार
102. राज कर्मचारियों की पेन्शन व्यवस्था
103. स्वदेशी व्यापारियों को सहयोग करने का आह्वान
104. राजा की जिम्मेदारी
105. अपने राज्य की सीमाओं की रक्षा करें
106. शत्रु के साथ बर्ताव का निर्देश
107. राजपुरुषों को सामान्य से अधिक दण्ड
108. राज्य के लिए आवश्यक
109. न्यायाधीश को हटाने के लिए महाभियोग
110. परमेश्वर के पश्चात् राजाज्ञा सर्वोपरि
111. भाई-भतीजावाद का स्पष्ट खण्डन
112. प्रजा, राजा के आचरण का अनुसरण करती है
113. "नमस्ते" का प्रचार
114. परमात्मा की शक्ति कब मिलती है?
115. राजा की प्रथम जिम्मेदारी क्या है?
116. राज्य संचालन में दण्ड और पुरस्कार दोनों आवश्यक
117. बलि प्रथा का विरोध
118. न्याय में लोभ कभी न करें
119. शानदार न्याय प्रणाली
120. राज्य के अधिकारी की योग्यता
121. अन्न का अपमान सहन नहीं
122. सत्य ग्रहण करने का उपदेश
123. असत्य बोलने वाले की स्थिति
124. आपसी फूट का परिणाम
125. सृष्टि के आरम्भ में कौन पैदा हुए
126. अत्यधिक धन का परिणाम
127. एकाग्रता की विधि
128. देश की सामाजिक दुरावस्था
129. दूसरों के दोष कब देखने चाहिए?
130. धन का उपयोग क्या करें?
131. पांच हजार साल पहले अमेरिका से सम्बन्ध
132. वस्त्र क्यों पहनें ?
133. चिकित्सक के दो प्रकार
134. चिकित्सा
135. पशु, पेड़, पौधे, बाग-बगीचा एवं ललित कलाओं आदि की आवश्यकता
136. भीख मांगने वाले को सजा
137. व्यापारियों की सुरक्षा
138. व्यापारी को सरकारें क्या दें?
139. गोदाम व्यवस्था - किसान कैसे उन्नति करेगा
140. प्रजा के परोपकार हेतु उत्तम कर (टैक्स) व्यवस्था
141. क्या सरकार सारी सुविधाएं निःशुल्क दें?
142. कृषि - बैल आदि को सब पुत्र-पितावत (माता-पिता समान) समझें
143. गरीब व्यक्ति को भोजन बनाने के ईंधन पर कर न हो
144. प्रबन्धन और कर्मचारी सम्बन्ध के विषय में निर्देश

145. गलत दिशा में जाने वालों को भी समझाएं जरूर
146. प्राचीन वैभवकाल में भारत में विमान
147. इतिहास में असत्य स्वीकार नहीं
148. महापुरुषों का स्वांग रचना उनका सम्मान नहीं अपमान
149. अनावश्यक मौन भी अनुचित
150. वेद ही ईश्वर का दिया ज्ञान
151. मन्त्र की शक्ति क्या है?
152. धर्मोपदेश में नींद क्यों आ जाती है
153. सत्य की सबसे सरल परिभाषा
154. आत्मा का स्वरुप
155. ईश्वर का सर्वोत्तम नाम
156. ग्रहदोष आदि अंधविश्वासों का खण्डन
157. ऋषियों द्वारा रचित आर्ष ग्रन्थ अमूल्य
158. सबसे श्रेष्ठ दान कौन सा?
159. वेद के बिना ज्ञान कहां से आता?
160. सदाचार से ही कल्याण
161. स्वदेश की एकता का मूलमन्त्र
162. स्वतन्त्रता की परिकल्पना करते दयानन्द
163. आर्य भारत के मूल निवासी - कहीं बाहर से नहीं आए
164. भारत के गौरवमयी इतिहास पर गर्व न करने वाले लोगों से सावधान
165. चित्र की नहीं चरित्र की पूजा के पक्षधर थे दयानन्द
166. एकता के बल को समझाते महर्षि
167. उन्नति का मूल एकता
168. स्वदेशी सामान का उपयोग
169. स्वयं की विचारधारा का मूल उद्देश्य
170. सत्यार्थ प्रकाश लेखन का उद्देश्य
171. सत्यार्थ प्रकाश का उद्देश्य
172. 'सत्यार्थ प्रकाश' लिखने का उद्देश्य
173. विद्वानों का मुख्य काम क्या है?
174. इच्छा हो तो सत्य को जानना कठिन नहीं
175. श्रीकृष्ण को श्रेष्ठ पुरुष बताते दयानन्द –
176. क्या पूर्व जन्म एवं पुनर्जन्म
177. जीवात्मा (मनुष्य) कर्म करने में स्वतन्त्र है
178. 'प्रार्थना' क्या है?
179. मनुष्य की शानदार परिभाषा 
180. छुआछूत के विरोधी दयानन्द
181. गेहूँ की रोटी
182. न्यायकारी कौन ?
183. बिना परिश्रम कुछ नहीं
184. फलित ज्योतिष कल्पनामात्र है
185. मृतक श्राद्ध व्यर्थ
186. मृत्युभोज
187. असली शंखासुर कौन?
188. स्वदेशी पर मान का उपदेश
189. मोक्ष की प्राप्ति का अंधविश्वास
190. रत्न, रुद्राक्ष मुक्ति का साधन नहीं
191. कर्मफल सिद्धान्त ही अकाट्य
192. अंधविश्वास को बढ़ावा भूलकर भी नही
193. कैसे भी हो-सत्य-असत्य का निर्णय होना चाहिए
194. केवल विद्वता ही छोटे-बड़े का पैमाना
195. आलस्य त्याग हेतु प्रेरणा
196. न्यूनतम साझा कार्यक्रम
197. रानियों के पतिव्रत धर्म की पशंसा
198. राजाओं के अवगुण राज्य के लिए विनाशकारी
199. संन्यासी के कर्तव्य
200. धार्मिक पाखण्ड हर मत में फैला है -
201. महर्षि को स्वदेश सुधारने की चिन्ता
202. परमेश्वर से स्वराज्य की प्रार्थना
203. स्वदेश-स्वराज्य का चिन्तन
204. अन्य देशवासी राजा हमारे देश में कभी न हों तथा हम लोग पराधीन कभी न हों
205. आर्यों के चक्रवर्ती राज्य के इतिहास का वर्णन
206. प्रवचन से पूर्व स्वयं आचरण करें
207. शुद्ध और अर्थ परक नामों को रखने का उपदेश
208. सत्य को स्वीकार करना ही सच्चा गुरुमन्त्र है
209. आर्यसमाज की नींव का पत्थर
210. राजा और प्रजा एक दूसरे के पूरक 
211. तानाशाह राजा के सामने प्रजा की स्थिति
212. राज्य अधिकारी का शपथ ग्रहण
213. गणपूर्ति (Corum) की व्यवस्था
214. राजा और मन्त्री स्वदेश में जन्म लेने वाला ही हो
215. राजा का कर्त्तव्य न्याय दिलाना है -
216. न्याय ही शासन का कारण
217. CBI - CID - RAW राज्य की गुप्तचर व्यवस्था
218. पंचायती राज व्यवस्था
219. तराजु - तुला-बाट की समय-समय पर परीक्षा
220. युद्ध में स्त्रियों की सहभागिता - सेना में स्त्रियां

221. सैनिकों की देखभाल मिलिटरी बैंड, आदि
222. युद्ध में टेलिकॉम-यूनिकोड संचार व्यवस्था
223. भूगर्भ विद्या से धन की प्राप्ति
224. सेना का भोजन और चिकित्सा आर्मी हॉस्पीटल
225. ऋषि दयानन्द की उद्देश्य पूर्ण साधना
226. संन्यासी का वास्तविक कर्त्तव्य
227. असत्य स्वीकार नहीं
228. दुनियादारी से दूर केवल वेद भाष्य ही जीवन का लक्ष्य
229. विज्ञानवेत्ता दयानन्द
230. सच्चे संन्यासी दयानन्द
231. पूर्ण परहितकारी दयानन्द
232. मनुष्य मात्र को सत्य और असत्य में भेद का उपदेश
233. आयुर्वेदाचार्य दयानन्द
234. निर्भीक दयानन्द
235. व्यावहारिक दयानन्द
236. निडर दयानन्द
237. मृत्युन्जय दयानन्द
238. वेद ही अन्तिम - वेद के विरुद्ध हो तो मेरी भी न मानना
239. दयानन्द दुःखी क्यों हैं?
240. एकता के लिए कटिबद्ध ईंट और पत्थर क्यों सहन करते हैं दयानन्द?
241. गरीबों के हितचिन्तक दयानन्द
242. गरीबों के हमराह विनम्र दयानन्द
243. विधवाओं, अनाथों एवं गौ माता की दशा से दुःखी - दयानन्द
244. दलितों की चिन्ता - विकल दयानन्द
245. देश की अनिष्टी के कारण
246. भारत वर्ष की विद्याओं के नष्ट होने के कारण
247. शरीर केवल परोपकार के लिए
248. दोषों को स्वीकार करते दयानन्द
249 जो कहा - स्पष्ट कहा-सीधा कहा
250. धन केवल परहित के लिए
251. धन का लोभ लेशमात्र भी नहीं
252. धन वैभव के आग्रह को तिलांजलि
253. स्वाबलम्बी दयानन्द
254. मेरा तो कुछ भी नहीं
255. परमार्थी देशभक्त दयानन्द
256. अनुचित प्रलोभन को अनुचित मानते दयानन्द
257. धन और सम्पत्ति परोपकार में लगे तो ही उत्तम
258. मितव्ययी दयानन्द
259. धन प्रलोभन से मुक्त दयानन्द
260. लोकहित के लिए पतित होना भी स्वीकार
261. परोपकारी हृदयी - दयानन्द
262. व्यक्तिपूजा के विरोधी दयानन्द
263. ऋषि परम्परा के प्रति श्रद्धावान दयानन्द
264. सत्य पर अगाध निष्ठा
265. जीवन पर्यन्त परोपकार
266. हास्य मिश्रित उपदेश
267. सत्य को स्पष्ट कहने वाले दयानन्द
268. ज्ञान जिज्ञासु-दयानन्द
269. कृतज्ञ - दयानन्द
270. गुरुभक्त दयानन्द
271. परोपकार हेतु मुक्ति का आनन्द भी त्याग
272. अटल ईश्वर विश्वासी दयानन्द
273. विरोधियों पर भी हमेशा दया रखने वाले दयानन्द
274. सत्य के सामने कुछ नहीं
275. दयावान दयानन्द
276. सच्चे संन्यासी दयानन्द
277. देशोन्नति एवं स्वराज्य का स्वप्न देखते दयानन्द
278. शिष्य के प्रति भी सेवाभावी दयानन्द
279. कृष्ण पर आरोप स्वीकार नहीं
280. परमात्मा के अतिरिक्त और किसी की न चिन्ता, न डर
281. स्पष्टवक्ता दयानन्द
282. सहनशीलता की प्रतिमूर्ति धर्मरक्षक दयानन्द 
283. महर्षि मनुष्यों के कल्याण के लिए कड़वी दवा देने के पक्षधर
284. गुणों को ग्रहण-दोषों का त्याग
285. सबके मोक्ष की कामना करते लोकहितकारी दयानन्द
286. ओरौं के दुःख को देखकर ही दुःखी दयानन्द
287. स्वयं को विद्वान कहलाना अभीष्ट नहीं विनम्र दयानन्द
288. आर्यसमाज की उन्नति का स्वप्न देखते आशावादी दयानन्द
289. महान योगी होने पर भी अहंकार शून्य दयानन्द
290. शुद्धिकर्ता दयानन्द
291. विज्ञानवेत्ता दयानन्द ?
292. मान-अपमान की चिन्ता नहीं - परोपकार ही लक्ष्य

293. सत्य के लिए कोई भी बलिदान स्वीकार
294. लाग-लपेट के शब्द स्वीकार नहीं दयानन्द को
295. अपने कठोर दुख में भी अन्यों को कष्ट देने को तैयार नहीं
296. आर्यावर्त की वर्तमान अवस्था से दुःखी दयानन्द
297. गुणग्राही दयानन्द
298. मृत्युंजयी एवं पुरुषार्थी दयानन्द
299. आशावादी दयानन्द
300. निराभिमानी दयानन्द
301. दृढ़निश्चयी दयानन्द
302. सत्य के प्रति अनुरागी दयानन्द
303. आयुर्वेद ज्ञाता चिकित्सक दयानन्द
304. निराभिमानता की पराकाष्ठा
305. दुर्वचन सुनने में भी प्रसन्नता का भाव
306. सत्य के लिए कुछ भी स्वीकार
307. स्वदेशी के प्रबल समर्थक दयानन्द
308. स्त्रियों के लिए बाहरी बाबाओं को गुरु बनाने के बारे में
309. छुआछूत और अंधविश्वासी परम्पराएं, स्वीकार नहीं -
310. आदित्य ब्रह्मचारी - संकल्पबद्ध ब्रह्मचारी स्वामी दयानन्द
311. सत्य के महान अनुरागी - दयानन्द
312. धर्मानुसार कर्म की प्रेरणा
313. मानवमात्र की उन्नति का नियम
314. मानव समाज को विद्या की वृद्धि का मन्त्र देते दयानन्द
315. विज्ञानवेत्ता दयानन्द
316. 'नमस्ते' शब्द के प्रचारक दयानन्द
317. विरोधियों की बातों से अविचल दयानन्द
318. सच्चा गुरुमन्त्र
319. लाहौर आर्य समाज के अधिवेशन की घटना
320. अंधविश्वासों को कतई स्वीकार नहीं कर सकते दयानन्द
321. दूसरों की पीड़ा से दुखी दयानन्द
322. शिष्टाचार किसे कहते हैं?
323. मेरे लिए जन्म एवं मृत्यु समान
324. क्षत्रिय हो, क्षत्रिय धर्म का पालन करो
325. दयानन्द का प्रभाव
326. जीवन की विशेषताएं दर्शाती घटनाएं
327. जो जैसा है, वैसा ही माना
328. ढोंगी साधुओं के चंगुल में नहीं जाना चाहिए
329. बाह्य आडम्बर धर्म का भाग नहीं हो सकते
330. सच्चे संन्यास धर्म के निर्वाह की पराकाष्ठा
331. सरल बात से सीधा उपदेश -
332. अंधविश्वास को हराने के लिए विज्ञान का सहारा
333. उनका हर पल उपदेश ही था
334. कठिन बात को सरलता से समझाना
335. सभी से मधुर सम्बन्ध थे दयानन्द के
336. छुआछूत कैसा भी मंजूर नहीं
337. जैसी घटना-वैसा उपदेश
338. नाम जाप से नहीं गुणों के धारण करने से ही कल्याण
339. उदयपुर (राजस्थान) में प्रवास के समय महर्षि की दिनचर्या
340. शाहपुरा (राजस्थान) में प्रवास के समय महर्षि की दिनचर्या
341. बम्बई में प्रवास के समय महर्षि की दिनचर्या
342. भाव अभिव्यक्ति
343. महर्षि दयानन्द और आर्यसमाज के सम्बन्ध महाराज सर प्रताप की विचारधारा
344. हर पल दयानन्द मार्गदर्शक दिखेंगे
345. वेदवादी दयानन्द
346. भाव स्मरण
347. महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के मुख्य शिष्य
348. महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के प्रमुख कार्य
349. महर्षि दयानन्द सरस्वती जी द्वारा लिखित प्रमुख ग्रंथों की सूची
350. महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के स्मृति स्थल
351-353. महर्षि दयानन्द सरस्वती की देश व्यापी यात्रा का वर्णन
354. महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के वास्तविक उपलब्ध चित्र
355. अनुक्रमणिका

200वीं 

महर्षि दयानन्द जयन्ती सरस्वती 
1824 2024

9788196036799

₹1500/-

Printed at: Radha Press

विनय आर्य, महामंत्री, दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा, 15 हनुमान रोड़ नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित


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